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इन दो युवाओं ने टीशर्ट बेचकर बनाए 20 करोड़ रुपये

बिहार के रहने वाले प्रवीण कुमार और हैदराबाद की रहने वाली सिंधुजा चेन्नई स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन डिजाइनिंग में पढ़ाई कर रहे थे। दोनों के भीतर खुद का बिजनेस शुरू करने का सपना था। 2015 की बात है उन दिनों भारत में ई-कॉमर्स बाजार ग्रोथ कर रहा था। इन दोनों ने सोचा कि यही सही मौका है नई शुरुआत कर देने का। उन्होंने कहीं से 10 लाख रुपये का इंतजाम करके अपनी डिजाइन की टीशर्ट बेचने लगे। ऑनलाइन मार्केट प्लेस जैसे, फ्लिपकार्ट, अमेजन और पेटीएम जैसी साइट्स पर अपने कपड़े बेचने शुरू कर दिए। उन्होंने ‘यंग ट्रेंड्ज’ नाम से अपना खुद का ब्रैंड बना लिया और खुद की ई-कॉमर्स वेबसाइट भी बना ली।

इस स्टार्टअप की ग्रोथ उम्मीद से बेहतर काफी तेज हुई। ध्यान देने वाली बात है कि जब ये सारा काम शुरू हो रहा था तो दोनों कॉलेज में ही थे और उनका सेमेस्टर खत्म होने वाला था। वे कॉलेज में होने वाले इवेंट्स में मुफ्त में अपनी डिजाइन की हुई टीशर्ट्स बांटते थे। इसके अलावा उन्होंने आईआईटी और आईआईएम को मिलाकर लगभग 100 इंस्टीट्यूट के साथ सहभागिता की। सिंधुजा बताती हैं कि धीरे-धीरे उन्हें हर रोज 1,000 ऑर्डर मिलने लगे और उनकी ग्रॉस मर्चेंडाइज वैल्यू बढ़कर 20 करोड़ हो गई। अभी दो साल पहले ही एक समय ऐसा था जब उनके पास एक भी रुपये की फंडिंग नहीं थी।

ग्रॉस मर्चेंडाइज वैल्यू का मतलब ऑनलाइन शॉपिंग में हुई कुल बिक्री होती है। कॉलेज खत्म होने के बाद दोनों ने तिरुपुर में अपना ठिकाना बनाने की सोच ली। क्योंकि यंग ट्रेंड्स उनका सपना था और वे इसी काम को आगे बढ़ाना चाहते थे। तिरुपुर तमिलनाडु और दक्षिण भारत में कपड़ों की मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा हब है। उन्हें लगता था कि तिरुपुर शिफ्ट हो जाने से उन्हें कपड़े बनाने के लिए अच्छा कच्चा माल मिल सकेगा। वे पहले भी अक्सर कॉलेज के प्रॉजेक्ट्स के सिलसिले में तिरुपुर जाया करते थे। लेकिन एक मुश्किल भी थी। प्रवीण और सिंधुजा में से किसी को तमिल नहीं आती थी। लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने काम चलाऊ तमिल भी सीख ली।

प्रवीण बताते हैं, ‘तिरुपुर में हमें गारमेंट स्किल में पारंगत सबसे अच्छे लोगों से मुलाकात हुई। जिससे हमें प्रॉडक्ट डेवलपमेंट में फायदा हुआ। हमें कोयंबटूर से अच्छे आईटी प्रोफेशनल भी मिल गए जो हमारी वेबसाइट का काम देख रहे हैं।’ इसके अलावा कोरियर की समस्या तो थी ही नहीं क्योंकि कोरियर कंपनी कहीं से भी सामान पिकअप कर सकती थीं। वे बताते हैं कि उनके ब्रैंड का नाम यंग ट्रेंड्ज इसलिए रखा क्योंकि वे युवा पीढ़ी को ध्यान में रखकर कपड़े बनाना चाहते थे। इसलिए उनकी टैगलाइन भी ‘स्टे यंग, लिव ट्रेंडी’ है। उनके टार्गेट में 18 से 28 साल के लोग हैं।

सिंधुजा कहती हैं, ‘हम सोशल मीडिया पर देखते रहते हैं कि रोजमर्रा की जिंदगी में क्या चल रहा है और कौन सी चीज इन दिनों ट्रेंड में है। हम वहां से प्रेरणा लेकर अपने ग्राफिक डिजाइन करवाते हैं। हम मार्केटप्लेस में लगभग 1.5 लाख प्रॉडक्ट से सीधे मुकाबला करते हैं। जहां अधिकतर विदेशी ब्रैंड ही भरे होते हैं।’ अभी इन दोनों युवाओं की टीम में 30 लोग काम कर रहे हैं। इनके वेयरहाउस तेलंगाना, कर्नाटक, हरियाणा, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में हैं। वे जल्द ही पश्चिम बंगाल में भी अपना वेयरहाउस बनाने की सोच रहे हैं। वे बताते हैं कि सबसे ज्यादा डिमांड दिल्ली से आती है उसके बाद उत्तर भारतीय राज्यों से भी ऑर्डर सबसे ज्यादा रहते हैं।

वे काफी संजीदगी से काम करते हैं और यही वजह से है कि ग्राहक को 90 प्रतिशत मामलों में तय तिथि के पहले ही प्रॉडक्ट मिल जाता है। हालांकि यंग ट्रेंड्ज पहले चीन और कोरिया में पॉप्युलर हुआ था जहां कपल के लिए कपड़े डिजाइन किए जाते थे। सिंधु और प्रवीण ने इस स्ट्रैटिजी को पिछले साल वैलंटाइन डे पर आजमाने की कोशिश की थी, इससे उनकी सेल में लगभग 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखने को मिली। वे बताते हैं कि ग्राफिक, वायरल हो रहे ट्रेंड को समझना और जल्दी से जल्दी डिलिवरी ही उनकी सफलता का मूल मंत्र है। अब उनके पास तीन डिजाइनर हैं और फोटोशूट करने के लिए फोटोग्राफर भी हैं।

सिंधुजा बताती हैं कि यंग ट्रेंड्ज के कपड़ों की क्वॉलिटी इस दाम में मिलना मुश्किल है। क्योंकि वे सिर्फ 250 रुपये से 600 रुपये तक के सामान बेचते हैं। कॉलेज जाने वाले युवाओं के लिए ये काफी अफोर्डेबल होता है। उन्होंने सभी ई-कॉमर्स वेबसाइट पर मिलाकर लगभग 3,500 प्रॉडक्ट की रेंज पेश की है। जिससे उन्हें 70 प्रतिशत तक रेवेन्यू मिल जाता है। दो महीनों में कलेक्शन को रिवाइज कर दिया जाता है। समय-समय पर ग्राहकों को आकर्षक छूट भी दी जाती है। हाल ही में उन्हें फ्लिपकार्ट की ओर से टॉप ब्रैंड्स इन परफोर्मेंस का अवॉड मिला है। बिग बिलियन डेज के दौरान उनके प्रॉडक्ट्स ने अच्छी सेलिंग की थी। सिर्फ़ 5 दिनों में ही लगभग 25,000 यूनिट्स की बिक्री हुई थी।

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