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बड़े डिफॉल्टरों पर आरबीआई इतना मेहरबान क्यों?

रवीश कुमार 

भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल को उन लोगों के नाम बताने में क्या परेशानी है जिन्होंने 50 करोड़ से लेकर 1 लाख करोड़ तक के लोन नहीं चुकाए हैं. भारतीय रिज़र्व बैंक कौन होता है उनकी इज्ज़त या साख की चिन्ता करने वाला वो भी जो बैंक का लोन नहीं चुका रहे हैं. क्या रिज़र्व बैंक आम किसानों की सामाजिक इज़्ज़त का भी ख़्याल करता है. क्या यह अच्छा है कि सूचना आयुक्त रिज़र्व बैंक के गवर्नर को याद दिलाएं कि दाम न मिलने के कारण कर्ज़दार किसान मौत को गले लगा लेता है और आप हैं कि बड़े कर्ज़दारों के नाम तक ज़ाहिर नहीं करते हैं.

14 मार्च को भारत सरकार सभी बैंकों को निर्देश दे चुकी है कि जिन्होंने 50 करोड़ से अधिक लोन लिए हैं और नहीं चुकाएं हैं उनके नाम और अन्य जानकारियां अखबारों में छापी जाएं. उन्हें नेम और शेम किया जाए यानी शर्मिंदा किया जाए. फिर रिज़र्व बैंक क्यों नहीं नाम बता रहा है. दिसंबर 2017 तक के आंकड़े के अनुसार 9063 बकायेदारों पर करीब 11 लाख करोड़ रुपया बाकी है जिसे हम एनपीए कहते हैं. क्या गवर्नर ने सरकारी बैंकों से पूछा, या सरकार ने सरकारी बैंकों से पूछा कि हमारे आदेश के बाद भी आपकी वेबसाइट पर लोन न देने वालों की लिस्ट क्यों नहीं है.

यह आदेश तब आया था जब नीरव मोदी, मेहुल चौकसी कई हज़ार के लोन की हेराफेरी के बाद लापता हो गए यानी विदेश भाग गए. मार्च से नवंबर आ गया. अब हंगामा है कि केंदीय सूचना आयुक्त श्रीधर अचार्युलु ने भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर को नोटिस भेज कर 16 नवंबर तक जवाब देने के लिए कहा है. पूछा है कि बड़े डिफॉल्टरों के नाम न उजागर करने के कारण आप पर अधिकतम जुर्माना क्यों न लगाया जाए. आपके मातहत सूचना अधिकारी को दंडित करने का कोई मतलब नहीं क्योंकि रिज़र्व बैंक के प्रधान सूचना अधिकारी गवर्नर ही होते हैं. सूचना आयुक्त ने गवर्नर उर्जित पटेल की ही एक बात को याद दिलाते हुए फटकार लगाई है.

20 सितंबर को केंद्रीय सतर्कता आयोग के एक कार्यक्रम में बोलते हुए उर्जित पटेल ने कहा था कि सतर्कता आयोग के दिशानिर्देशों का मकसद सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता, ईमानदारी और शुचिता की संस्कृति को बढ़ावा देना है. तब सूचना आयुक्त श्रीधर अचार्युलु ने पूछा है कि आयोग का मानना है कि रिज़र्व बैंक के गवर्नर और डिप्टी गवर्नर जो बात कहते हैं और जो उनकी वेबसाइट पर सूचना के अधिकार की जो नीति है, दोनों में कोई समानता नहीं है. सतर्कता रिपोर्ट को दबाया जा रहा है. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने सूचना आयोग के आदेश को सही माना है. सूचना न देने के लिए सूचना अधिकारी को दंडित करने से कुछ नहीं होगा क्योंकि वह तो शीर्ष अधिकारियों के निर्देश पर काम करता है.

गवर्नर ही नहीं प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय से भी पूछा गया है कि 4 फरवरी 2015 को पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने आपको जिन बकायेदारों की लिस्ट दी थी और जिनके खिलाफ कई एजेंसियों से जांच कराने की बात कही थी, उनके नाम सार्वजनिक कीजिए. आप जानते हैं कि 6 सितंबर 2018 को रघुराम राजन ने संसद की आंकलन समिति को 17 पन्नों के एक नोट्स में यह सब बातें लिखी थीं. क्या प्रधानमंत्री कार्यालय रघुराम राजन की दी गई सूची को सार्वजनिक करेगा, जिनमें लोन न चुका कर और दस्तावेज़ों में हेराफेरी कर लोन के पैसे को एडजस्ट करने की बात लिखी है. जब सरकार का आदेश है बैंकों को तब नाम सार्वजनिक क्यों नहीं हो रहे हैं. सब निर्गुण भाव से बात क्यों कर रहे हैं, रिपोर्ट क्यों नहीं दे रहे हैं.

Ndtv के शुक्रिए के साथ

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