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कश्मीर में सरकार मजबूर क्यों

हिसाम सिद्दीकी

‘अगर पाकिस्तान सुधर जाए तो जम्मू कश्मीर में सूरतेहाल फौरन मामूल पर आ जाएगी।’ ‘जम्मू-कश्मीर मे पाबंदियां कब तक जारी रहेगी इसका इंहिसार (निर्भरता) पाकिस्तान पर है।’ यह बयान किसी और ने नहीं बल्कि नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर (एनएसए) अजित डोभाल ने दिए हैं। अजित डोभाल से पूछा जाना चाहिए कि आखिर सरकार की क्या मजबूरी है कि कश्मीर के हालात ठीक करने के लिए वह पाकिस्तान को सुधरने की बात कर रहे है। क्या उन्हें नहीं मालूम है कि हिंदुस्तान के खिलाफ मुसलसल दुश्मनी पर उतरा पाकिस्तान हिंदुस्तान के मामले में कभी भी सुधर नहीं सकता। तो क्या डोभाल यह कहना चाह रहे हैं कि जब तक पाकिस्तान सुधरेगा नहीं उस वक्त तक कश्मीर में कर्फ्यू लगा रहेगा?

कश्मीर में पाबंदियों के दौरान हिंसा होने की खबरें बीबीसी समेत दुनिया के कई टीवी चैनलों पर आती रही है। लेकिन हर बार भारत सरकार की तरफ से उन खबरों की तरदीद (खण्डन) की गई। सरकार और सरकार की खुशामद में लगे टीवी चैनल यही दावा करते रहे कि कश्मीर में पूरी तरह अम्न है। आखिर तीस अगस्त को कश्मीर पुलिस ने ही यह माना कि कश्मीर में पाबंदियां लगने के बाद से वादी के दस जिलों में नज्म व नस्क (कानून व्यवस्था) और हिंसा के 280 (दो सौ अस्सी) मामलात पेश आए। इनमें एक सौ साठ से ज्यादा सिर्फ श्रीनगर में हुए। पुलिस के मुताबिक इस दौरान अस्सी (80) शहरी पीलेट गन से जख्मी हुए। आठ सौ (800) से ज्यादा गिरफ्तारियां हुई है। लेकिन गिरफ्तारियों का जिक्र पुलिस रिपोर्ट में नहीं है। दफा-370 हटाना पूरी तरह सियासी फैसला है इसपर वजीर-ए-आजम मोदी या होम मिनिस्टर अमित शाह को बोलना चाहिए। एनएसए है तो नौकरशाह ही वह सियासी बयान क्यों दे रहे हैं?

नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजित डोभाल का दावा है कि जम्मू कश्मीर मे दफा-370 हटाए जाने के बाद पूरी तरफ अम्न ओ अमान है। अगर डोभाल का दावा सच है तो मीडिया और अपोजीशन लीडरान को कश्मीर जाने क्यों नहीं दिया जा रहा है। इंटरनेट मोबाइल और बेश्तर (अधिकांश) लैण्डलाइन फोन क्यों बंद है। महबूबा मुफ्ती की बेटी इल्तिजा दिल्ली युनिवर्सिटी का तालिब इल्म मोहम्मद अलीम सेयद को अपने वाल्दैन और सीपीएम जनरल सेक्रेटरी सीताराम येचुरी को अपनी पार्टी के लीडर और साबिक मेम्बर असम्बली सख्त बीमार यूसुफ तारिगामी की अयादत करने श्रीनगर जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से इजाजत लेनी पडे और अजित डोभाल यह दावा करें कि कश्मीर में अम्न ओ अमान है दोनों बातों में जबरदस्त तजाद (विरोधाभास) है। डोभाल ने यह भी कहा कि पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में दो सौ तीस (230) ट्रेनिंग शुदा दहशतगर्द भारत में घुसने के लिए जमा है। जिनमें से कुछ सरहद पार करने में कामयाब भी हो गए है। अगर उनकी बात सच है तो बार्डर पर तैनात जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए कि कश्मीर में इतनी सख्त चौकसी के बावजूद पाकिस्तानी दहशतगर्द भारत की सरहद में घुसने में कामयाब कैसे हो गए।

अगर मान लिया जाए कि कश्मीर में अम्न ओ अमान है तो श्रीनगर की जामा मस्जिद हजरत बल दरगाह की मस्जिद और दीगर बडी मसाजिद में जुमे की नमाज की इजाजत क्यों नहीं है? ईद उल अजहा (बकरीद) तक की नमाज लोगों ने अपने मोहल्ले की छोटी मस्जिदों में अदा की दस सितम्बर को यौमे आशूरा (मोहर्रम) का जुलूस श्रीनगर और 98 फीसद शिया आबादी वाले करगिल मे भी नहीं निकलने दिए गए कुछ लोगों ने जुलूस निकालने की कोशिश की तो उनपर लाठी चार्ज हुआ और आंसू गैस के गोले फेंक कर उन्हें वापस जाने के लिए मजबूर कर दिया गया।

असल में अमरीकी फारेन मिनिस्ट्री ने जम्मू कश्मीर में बडे पैमाने पर शहरियों पर लगी पाबंदी पर चंद दिन पहले गहरी तशवीश का इजहार करते हुए हिंदुस्तान की सरकार से इंसानी हुकूक का एहतराम करने की अपील की थी। नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर ने बिलवास्ता तौर पर अमरीका के इजहार तशवीश पर ही यह कहा कि कश्मीर घाटी में आयद की गई पाबंदियों को हटाने का दारोमदार पाकिस्तान के रवैए पर है। उन्होंने कहा कि हम तो खुद चाहते हैं कि सभी पाबंदियां खत्म कर दी जाएं लेकिन पाकिस्तान की जानिब से बार-बार उकसावे की कार्रवाई हो रही है और उसका मकसद किसी भी सूरत में जम्मू कश्मीर में अम्न व अमान को नुक्सान पहुचाना है। पाकिस्तान नहीं चाहता कि जम्मू कश्मीर में लोग अम्न व चैन से रहें। उन्होंने कहा कि मकबूजा कश्मीर में 230 तर्बियत याफ्ता दहशतगर्द हिंदुस्तान की सरहद पर जमा हैं और उनमें से कुछ सरहद पार करने में कामयाब भी हो गए हैं। उन्होंने यह नहीं बताया कि आखिर इतनी कडी निगरानी और चौकसी के बावजूद पाकिस्तान से दहशतगर्द किस तरह सरहद पार कर जाते हैं।

15 अगस्त को आर्टिकल-370 और 35ए खत्म कर देने के मोदी सरकार के फैसले के बाद से कश्मीर मे न सिर्फ मोबाइल ओैर इंटरनेट बंद हैं बल्कि अमली तौर पर कर्फ्यू लगा हुआ है। इस इकदाम के बाद अजित डोभाल की यह पहली कांफ्रेंस है जिसमें उन्होने यह भी दावा किया कि जम्मू कश्मीर में ज्यादातर  लोग आर्टिकल-370 हटाए जाने से काफी खुश हैं और वहां हालात मेरी उम्मीद से कहीं ज्यादा बेहतरी की तरफ हैं। वजीर-ए-आजम दफतर में अजित डोभाल की प्रेस कांफ्रेस में एक दर्जन जर्नलिस्टों को बुलाया गया था जिनमें से आधे गैर मुल्की जर्नलिस्ट थे। इस सवाल पर कि तीन साबिक वुजरा-ए-आला समेत बहुत से सियासी लीडरों को आखिर क्यों जेरे हिरासत रखा गया है डोभाल ने कहा कि उन्हें महज एहतियात के तौर पर नजरबंद किया गया है। उनके खिलाफ कोई चार्ज शीट नहीं लगाई गई है। असल में इस मरहले पर हम सियासी लीडरों को इसकी इजाजत नहीं दे सकते कि वह अवाम के बडे मजमे को खिताब करें। क्योंकि इसका दहशतगर्द फायदा उठा सकते है। इसके अलावा यह रियासती सरकार को तय करना है कि उन्हें हालात मामूल पर आने के बाद कब रिहा करना है।

नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजित डोभाल ने चुनिंदा जर्नलिस्टों के बीच ही जिनमें आधे से ज्यादा गैर मुल्की जर्नलिस्ट थे प्रेस कांफ्रेंस को खिताब किया। साफ जाहिर है कि इसका मकसद किसी भी तरह अमरीका को मुतमइन करना था। इस मौके पर वह वाजेह तौर पर कुछ कहने से बचते हुए नजर आए और यह बता कर नहीं दिया कि जम्मू कश्मीर से पाबंदियां आखिर कब खत्म होगी। उन्होने दावा किया कि नकल व हमल पर पाबंदी तकरीबन 92 फीसद हटा ली गई है और अगर पाकिस्तान अपनी हरकतें जारी रखता है तो सियासी लीडरों की रिहाई और फोन और इंटरनेट की बहाली में मजीद देरी होगी। सिक्योरिटी एडवाइजर से ऊपर उठकर बीजेपी के एक जिम्मेदार की तरह उन्होने कहा कि आर्टिकल 370 को खत्म करना लम्बे अर्से से बीजेपी के इंतखाबी मंशूर में शामिल रहा है।

इस दरम्यान खबरों के मुताबिक गुजिश्ता 6 सितम्बर को लोगों की आमदो रफ्त में दी गई थोडी बहुत ढील जुमे की नमाज के बाद पत्थरबाजी के अंदेशे को देखते हुए वापस ले ली गई। सूरा में एक हजार लोग नमाज के लिए जमा हुए लेकिन श्रीनगर की जामा मस्जिद मे जुमे की नमाज पढने की इजाजत नहीं दी गई। एक अफसर ने बताया कि तशद्दुद के वाक्यात ज्यादातर श्रीनगर में इसलिए हो रहे हैं कि वहां साढे सत्रह लाख की आबादी है जो पूरी घाटी का तीस फीसद है। इसलिए श्रीनगर के बारे में कुछ कहना मुश्किल है लेकिन दूसरे जिलों में अफसरों को अच्छी तरह मालूम है कि शोरिश किन-किन  जगहों पर हो सकती है इसलिए वहां हालात काबू में हैं। हमारी कोशिश यह है कि जान का नुक्सान न होने पाए। हम अगर कुछ लोगों को पकडते भी तो उनमें से ज्यादातर को छोड देते हैं।

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