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जब धरतीपुत्र पेशाब से लेकर ज़हर पीने लगे……

अलीमुल्लाह खान

राजधानी में सत्ता के बहरे गलियारों तक आवाज़ पहुंचाने के लिए जिस देश में धरतीपुत्र को पेशाब पीना पड़े, मरे हुए चूहे खाने पड़ें, मल खाना पड़े, निवस्त्र सड़कों पर उतरना पड़े, उस देश को कृषि प्रधान देश कहने को तो जी नहीं चाहता है। हालांकि यह सब करना ज़हर पीने से आसान है। इस देश में आए दिन धरतीपुत्र तो जहर भी पी रहा है। पंजाब, विदर्भ, बुंदेलखंड, आंध्र प्रदेश के हजारों किसानों की कहानियां इसकी गवाह हैं।

मोदी शासन आने के बाद किसान आत्महत्याओं में 42 फीसदी का इज़ाफा हुआ है। आंकड़े सरकार की पोल खोल रहे हैं। यह दावा एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015 की रिपोर्ट में किया गया है। खेत मजदूरों के हालात इससे भी ज्यादा खराब हैं। किसान घर से खेत जाने के लिए निकलता है लेकिन अपने आर्थिक और पारिवारिक हालात इस कद्र बेकाबू हुए देखता है कि घर उसका मृत शरीर आता है। सरकारों और सरकारी नीतियों के बाद रही कसर मौसम पूरी कर देता है। क्योंकि आज भी यहां खेती मौसम भरोसे है। खेती करना इतना मंहगा हो चुका है कि किसान बुरी तरह से कर्ज के बोझ तले दबता चला जा रहा है। अकेले पंजाब में किसानों के सिर 81 हज़ार करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज है। जिसे माफ करवाने के लिए आए दिन पंजाब में किसान या तो आत्महत्या कर रहा है या सड़कों पर है।

खेती इस कद्र घाटे का सौदा बन चुकी है कि लगातार किसान खेती से किनारा कर रहा है। जो कर रहे हैं वे मजबूरी में कर रहे हैं क्योंकि कुछ और करना जानते नहीं हैं। सरकारें जो कर रही हैं वह बीमारी का इलाज नहीं बल्कि बस समस्या टालने की कोशिश है। पहले तो विदर्भ या बुंदेलखंड से ही किसान आत्महत्याओं की खबरें आया करती थीं लेकिन अब नए-नए और विकसित राज्यों से भी आ रही हैं। खंगालने पर वजह एकमात्र जो नजर आती है वो यह है कि लगातार खेती करना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। आत्महत्याओं के आंकड़ों पर केवल बयानबाजी होती है लेकिन बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है।

पंजाब में हुए अध्ययनों पर गौर करें तो वहां हरित क्रान्ति, कर्ज और खासकर मंडियों में बैठे साहूकार किसान आत्महत्याओं के लिए ज़िम्मेदार हैं। किसानों की जमीनों के लगातार छोटे हो रहे आकार एक और बड़ी वजह है। साहूकार किसानों से खाली परनोट पर साइन करवा कर रख लेते हैं। पिछला कर्ज अदा होता है तो नई फसल के लिए नया कर्ज मिलता है। कर्ज की रकम जरा सी दाएं-बाएं होती है तो खाली परनोट पर कुछ भी चढ़ा कर जमीन हड़प ली जाती है। अब तो हद यह चुकी है कि जो किसान बैंक का कर्ज समय पर नहीं लौटा पा रहे हैं उनकी ज़मीन संबंधित विभाग के अधिकारी ऑफिस में बैठे-बैठे कुर्क कर देते हैं और किसान को पता भी नहीं लगता क्योंकि इससे पहले जब विभाग के अधिकारी जमीन कुर्क करने के लिए गांव जाते थे तो गांव वाले उन्हें भगा दिया करते थे। सरकारी खरीद की राह तकती किसान की फसल कई-कई दिन मंडियों में पड़ी रहती है। खेती में लागत बढ़ती जा रही है और कमाई कम होती जा रही है। खेत जोतने से लेकर सिंचाई के साधन सब बेहद खर्चीले हो चुके हैं। पानी लगातार कम हो रहा है। बारिश या तो बेमौसमी हो रही है या नहीं ही हो रही है। डार्क ज़ोन बढ़ते जा रहे हैं। पंजाब में चावल की खेती ने अंदर से जमीन का गला पूरी तरह से सुखा दिया है। भूजल खतरनाक स्थिति में है।

तेलंगाना में भी यही हालात हैं। जहां बोरवैल के लिए सरकारी कर्ज मिलना बंद हो गया तो किसान साहूकार के पास जाने लगे। उत्तर प्रदेश में किसानों का चीनी मिलों के पास करोड़ों रुपया बकाया है। ज्यादातर किसान ऐसे हैं जो एक से लेकर पांच एकड़ के मालिक हैं। यहां तक कि संपन्न इलाकों के किसानों के घरों में रोटियों के लाले पड़ने लगे हैं। चलिए प्राकृतिक आपदा पर तो वश नहीं लेकिन फसलों की कीमतों के लिए किसान सड़कों पर है। सरकार ने कभी किसानों के लिए वित्तिय राहत को जरूरी समझते हुए फौरन कदम नहीं उठाए। देश में सब कुछ हो रहा है, देश आगे बढ़ रहा है लेकिन किसानों के लिए परंपरागत व्यवस्था ही है जो बहुत ही लचर है। फसलें बरबाद होती हैं, सूखा पड़ता है, किसान पर कर्ज है तो सरकार ने खेती से ही संबंधित दूसरे व्यवसायों को विकसित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए।

जैसे मीट उत्पादन, पशुपालन, डेयरी उद्योग,मछलीपालन, रेशम या मोती की खेती आदी। कर्ज एक दफा माफ हो भी जाएगा तो समस्या तो जस की तस बनी रहेगी इसलिए जरूरत है खेती के जरिये किसानों की आय बढ़ाने की। खेती को किफायती बनाने की। साहूकारों पर नकेल डालने की।

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