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बाबरी मस्जिद की पच्चीसवीं बरसीः हम न बाबरी मस्जिद को भूलेंगे न देश के शहरियों को भूलने देंगे

हिसाम सिद्दीकी

अब से ठीक पच्चीस साल पहले 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों के नाम पर लाखों गुंडों को इकट्ठा करके साढे चार सौ साल पुरानी तारीखी बाबरी मस्जिद की इमारत और मुल्क़ के संविधान की धज्जियां उड़वाई गई थीं। हम भी उस नाक़ाबिले माफी गुनाह (पाप) के चश्मदीद गवाहों में शामिल रहे हैं। अजीब बात है कि 25 सालों मे न तो मस्जिद दोबारा बन सकी न ही उस जगह पर भगवान राम का आलीशान मंदिर बन पाया।

संविधान की धज्जियां उड़ाई गई थीं आज तक वह सिलसिला जारी है जिस किसी भी पार्टी की सरकार मुल्क़ में आती है, संविधान की तौहीन करने का काम जरूर करती है। आजकल नरेन्द्र मोदी मुल्क की सत्ता पर काबिज हैं तो संविधान और संवैधानिक इदारों (संस्थानों) की तौहीन कुछ ज्यादा ही होने लगी है। इन पच्चीस सालों में बाबरी मस्जिद तोड़ने वालों और तुड़वाने वालों को सजाएं भी नहीं मिल पाई हैं।

यह हमारे सिस्टम की नाकामी तो है ही पुलिस और प्रॉसीक्यूशन का गुनाह भी है। हमने शुरू से ही कहा है कि मुल्क़ और मुल्क़ के संविधान के साथ इतना बड़ा गुनाह करने वालों को जबतक कानून के मुताबिक मुनासिब सजाएं नहीं मिल जाती हम न तो बाबरी मस्जिद को भूलेंगे न देश और देश के शहरियों को भूलने देंगे। हम मुसलसल अपने कलम के हथियार के जरिए मस्जिद और संविधान के गुनाहगारों पर हमला करते रहेंगे।

आम शहरियों, अदालतों और सरकार के कानों तक अपनी यह बात पहुंचाते रहेंगे कि संविधान और मस्जिद के कातिल जिंदा हैं, बेशर्म चेहरे लिए घूम रहे हैं और मुल्क के सिस्टम व अदलिया (न्यायपालिका) को चिढाने का काम भी कर रहे हैं। इन गुनाहगारों का एक और बड़ा ‘पाप’ यह है कि छः दिसम्बर 1992 तक भले ही इमारत के एतबार से वह मस्जिद थी लेकिन अमली तौर पर उसे मंदिर में तब्दील किया जा चुका था। राम लला उसी इमारत में ‘विराजमान’ थे। आराम से पूजा-पाठ होती थी और भोग भी लगता था। इन गुनाहगारों (पापियों) ने अपनी घिनौनी हरकतों से राम लला को भी बेघर करके एक मामूली तिरपाल के नीचे पहुचवा दिया तेज हवाओं, बारिश और तब्दील होते मौसमों की वजह से वह तिरपाल अक्सर फट जाता है जिसे तब्दील करने के लिए आला सतही अदालतों तक जाना पड़ता है।

उत्तर प्रदेश और देश के करोड़ों लोगों को इस बात की सख्त तकलीफ है कि पच्चीस साल से राम लला तिरपाल के नीचे हैं इस तरह राम लला को घर से बेघर करने के गुनाह की सजा भी मस्जिद के कातिलों को मिलनी चाहिए।

अयोध्या में जिस जगह पर बाबरी मस्जिद थी उसमें मिम्बर की जगह को भगवान राम लला की पैदाइश की जगह बताया गया। इस मस्जिद/मंदिर के तनाजे (विवाद) को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट 5 दिसम्बर से रोजाना सुनवाई कर रही है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के ही आर्डर पर मस्जिद के कातिलों पर लखनऊ के ट्रायल कोर्ट में मुसलसल सुनवाई चल रही है। उम्मीद है कि शायद दोनों अदालतों के फैसले भी एक साथ आएंगे। हमारी इत्तेला के मुताबिक 2018 खत्म होते-होेते सुप्रीम कोर्ट मस्जिद/ मंदिर के मुकदमे का फैसला कर देगा।

यह मुकदमा मुल्क की अदलिया (न्यायपालिका) के लिए भी बहुत बड़ा इम्तेहान है। वजह यह है कि दोनों फरीकैन यानी आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ल़ॉ बोर्ड और सुन्नी सेण्ट्रल वक्फ बोर्ड की जानिब से बार-बार कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला होगा मुस्लिम तबका उसे खुशी-खुशी तस्लीम करेगा लेकिन दूसरे फरीक यानी जन्म भूमि न्यास और राम लला विराजमान की जानिब से ऐसी कोई यकीनदहानी नहीं कराई जा सकी है। इसकी वजह यह है कि उन दोनों पर पूरी तरह से बीजेपी और विश्व हिन्दू परिषद हावी हो चुकी है।

इन दोनों का वाजेह (स्पष्ट) कहना है कि यह मामला कानून और अदालत का नहीं ‘आस्था’ का है जिस पर कोई समझौता नहीं हो सकता। जहां तक हिन्दुओं की आस्था का सवाल है आम मुसलमानों को भी उसका बखूबी एहसास है शायद ही कोई मुसलमान हो जो हिन्दुओं की आस्था का एहतराम (सम्मान) न करता हो। वैसे तो यह मामला अब सैकड़ों साल पुराना हो चुका है। लेकिन आम मुसलमानों का जो मौकुफ (दृष्टिकोण) छः दिसम्बर 1992 से पहले था वह अब नहीं है। मस्जिद की शहादत के बाद से अब तक आम मुसलमान यह भी सोचता है कि सुप्रीम कोर्ट हो या दुनिया की कोई अदालत अगर उसका फैसला मस्जिद के हक में आ भी गया तो भी कुदरत, अल्लाह और ईश्वर का कोई करिश्मा (चमत्कार) ही उस जगह पर दुबारा मस्जिद तामीर करा सकता है।

दुनिया की कोई ताकत तो अब उस जगह पर मस्जिद की दुबारा तामीर नहीं करा सकती। सारा मामला बिगाड़ा है विश्व हिन्दू परिषद और भारतीय जनता पार्टी ने। विश्व हिन्दू परिषद के अशोक सिंघल और प्रवीण तोगड़िया वगैरह ने हमेशा सख्त और मुसलमानों को खौफजदा करने वाली बयानबाजी की तो भारतीय जनता पार्टी ने आज तक अयोध्या और राम मंदिर के नाम पर हिन्दुओं को भड़का कर उनके वोट ठगने का काम किया है। दोनों ने हमेशा यह एहसास (आभास) दिलाने की कोशिश की है कि हम तो अयोध्या की जगह जबरदस्ती छीन कर ले लेगें।

मुसलमानों की नफ्सियात और छः दिसम्बर 92 के बाद पूरी तरह तब्दील शुदा सूरतेहाल में जितना हमें मुसलमानों से फीडबैक मिला है हम पूरे यकीन के साथ कह सकते हैं कि अगर विश्व हिन्दू परिषद और भारतीय जनता पार्टी को इस मामले से अलग करके चारों-पांचों जो भी है शंकराचार्य एक बार सामने आकर मुसलमानों से यह कह दें कि देखिए मस्जिद अब उस जगह पर मौजूद नहीं है। यह मामला मुल्क और दुनिया के करोड़ों हिन्दुओं की आस्था व जज्बात का है।

इसलिए अपने हिन्दू भाइयों की आस्था व जज्बात का एहतराम (सम्मान) करते हुए मुसलमान अब उस जगह से अपना दावा छोड़ कर अल्लामा इकबाल के मुताबिक ‘इमाम-उल-हिन्द’ और हिन्दुओं के मुताबिक भगवान राम का आलीशान (भव्य) मंदिर की तामीर के लिए खुशी-खुशी दे दें तो हमें पूरा यकीन है कि मुसलमान अपना दावा छोड़ सकते हैं। इस किस्म के समझौते के बाद मुल्क में जीत हार का माहौल और जलसे जुलूस भी नहीं होने चाहिए। मसला बड़ी आसानी से निपट सकता है वर्ना सुप्रीम कोर्ट में तो मुकदमा चल ही रहा है। हां समझौते की एक लाजमी शर्त यह भी होनी चाहिए मंदिर तामीर का काम जन्म भूमि न्यास और मजहबी धार्मिक रहनुमाओं के हाथों में ही रहना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और उर्दू साप्ताहिक जदीद मरकज़ के संपादक हैं)