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आज ही है, वह महान तारीख, जब दुनिया हिल उठी थी

श्रवण यादव रदलामी

7 नवंबर, आज ही के दिन 102 साल पहले मेहनतकश वर्ग ने मानव इतिहास में पहली बार अपना राज्य स्थापित किया था और अगले तीन दशकों में यह साबित किया कि मज़दूर वर्ग न सिर्फ सत्ता चला सकता है, बल्कि किसी अन्य वर्ग से बेहतर व शानदार तरीके से चला सकता है।

मज़दूर वर्ग के सत्ता पर काबिज होने के दो दशक के भीतर यूरोप का सबसे पिछड़ा देश, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन गया। दो दशकों में महान सोवियत संघ ने आर्थिक व सांस्कृतिक विकास की उन ऊंचाइयों को छू लिया, जिन्हें छूने में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे पूँजीवादी देशों को दो से तीन शताब्दियाँ लगी थी। मज़दूर वर्ग की सत्ता ने शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवन स्तर, कला, संस्कृति हर क्षेत्र में उन ऊंचाइयों को छू गया जिसकी कल्पना भी पूँजीवादी मुल्क नहीं कर सकते। और ऐसा करने के लिए सोवियत संघ को न किसी दूसरे मुल्क को अपना उपनिवेशी गुलाम बनाने की ज़रूरत पड़ी, न पूँजीवादी राष्ट्रों की तरह दूसरे कमज़ोर देशों की संपदाओं को लूटने की ज़रूरत पड़ी। सोवियत संघ ने मानव सभ्यता की इस महान उड़ान को अपने लोगों की ताकत पर व समाजवादी व्यवस्था के रास्ते चलकर पूरा किया। दो दशकों में इस मज़दूर सत्ता ने बेरोजगारी और अशिक्षा का पूरी तरह उन्मूलन कर दिया। इन दो दशकों में जितनी लाइब्रेरी सोवियत संघ में खुली, उतनी पिछली एक सदी में पूरे यूरोप में न खुली थी। दो दशकों में डॉक्टरों और नर्सों की संख्या 19 हज़ार से बढ़कर डेढ़ लाख पहुँच गई। सोवियत संघ द्वारा अपनी जनता को मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य मुहैया होता देख पूँजीवादी मुल्कों में भी आवाज़ें उठनी तेज़ हुई और जनांदोलनों के दबाव में यूरोप के पूँजीवादी निज़ामो को कल्याणकारी राज्य का मॉडल, अस्थाई रूप से ही सही, लागू करने को मजबूर होना पड़ा।
जब 1930 के दशक की ऐतिहासिक आर्थिक महामंदी के चपेट में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था तबाहो-बर्बाद हो रही थी, तब सोवियत संघ अकेला मुल्क था जिसकी आर्थिक वृद्धि दर रिकॉर्ड ऊंचाइयां छू रही थी।

सोवियत संघ के सामाजिक प्रयोग ने साबित किया कि मज़दूर वर्ग न सिर्फ सत्ता संभाल सकता है, बल्कि शोषित वंचित तबकों के हितों की मानव इतिहास में सबसे बेहतरीन सत्ता का उदाहरण पेश कर सकता है। 7 नवंबर 1917 के बाद सर्वहारा समाजवादी व्यवस्था कोई यूटोपिया नहीं रही, बल्कि यथार्थ बन गई। इस महान घटना ने दुनिया भर के मुक्तिकामी नौजवानों को क्रांति की ओर धकेला। भारत में ग़दर पार्टी, HSRA और सीपीआई ने इसी महान घटना से प्रेरित होकर आज़ादी की लड़ाई में क्रांतिकारी राजनीति के भ्रूण डाले।

दुनिया के पूँजीवादी साम्राज्यवादी निज़ाम आज भी इस घटना से इस कदर खौफ खाते हैं कि समाजवाद, महान सोवियत संघ, लेनिन, स्तालिन के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार के लिए उनका अथक प्रयास एक सदी से चालू है। लेकिन इसके बावजूद आज भी दुनिया के हर मुल्क हर कोने में इस महान परिघटना से प्रेरणा लेने वाली मुक्तिकामी नौजवानों की नई नस्लों को पैदा होने से रोक नहीं पाए हैं।

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