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यह पहली सरकार है जो किसानों के लहू पर शर्मिंदा होने के बजाय कुतर्क पर आमादा है

मनीषा भल्ला

31 जनवरी वर्ष 2000, बठिंडा ज़िले के पास जेठूके नाम का इलाका। किसान मिट्ठू सिंह की आत्महत्या के बाद किसान हिंसा ऐसी फैली कि जिसमें पुलिसिया गोली से दो किसानों की मौत हो गई। वर्ष 2007 में जब बरनाला ज़िले में ट्राइडेंट कंपनी किसानों की ज़मीन एक्वायर कर रही थी तो बड़े स्तर पर किसान आंदोलन हुआ। आसपास के सभी गांव सरकार ने सील कर दिए। गोलियां चलीं। इन दोनों मामलों में राज्य सरकार न केवल बैकफुट पर आई बल्कि किसानों की मांगे भी मानी। इन दो मामलों के बारे में मैं पक्के तौर पर इसलिए लिख सकती हूं कि यह दोनों मामले मैंने मौके पर जाकर कवर किए थे। इसके अलावा 29 मार्च 2004 को अमृतसर में मानावालां जगह पर जब किसानों पर गोली चलाई गई तो अंग्रेज सिंह नामक किसान मारा गया। सरकार वहां भी बेकफुट पर आई और किसानों से बात की।

लेकिन मंदसौर की सड़कों पर पुलिस की गोली से 9 किसानों का लहू सड़कों पर गिरा। यह पहली ऐसी सरकार है कि जिसे फर्क ही नहीं पड़ा। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो किसानों से बातचीत करने की बजाय समस्या के हल के रूप में उपवास पर बैठ गए हैं। बाकायदा पंडाल लगाकर।

15 जून को देश भर से जंतर-मंतर किसान मंदसौर कांड के ख़िलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करेंगे। एक किसान नेता बताते हैं कि ‘शायद हम जींस पहनकर आएं।’ वह कहते हैं कि ऐसी सरकार और ऐसा मुख्यमंत्री( शिवराज सिंह चौहान) हमने पहली दफा देखा है। बजाय किसानों से बात करने के। बजाय चुनावी वादे पूरे करने के, ये लोग बेतुकी बातें कर रहे हैं।

कोई कह रहा है कि किसानों को योग करना चाहिए। किसी का कहना है कि प्रदर्शनकारियों ने तो जींस पहन रखी थी। पुलिस की गोली से किसी की भी मौत हो सरकार बैकफुट पर आती है लेकिन यहां अपने हक़ के लिए सड़कों पर उतरे किसानों की मौत पर सरकार को ज़रा सा भी मलाल नहीं।

आंदोलनों के दौरान हुई हिंसा में सरकारी स्तर पर इतना कुतर्क पहले कभी नहीं देखा गया। किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में अपनी मांगों को लेकर 1989 में इंडिया गेट पर पूरे हिंदुस्तान से किसान दिल्ली की सड़कों पर फैल गए थे। मुजफ्फरनगर का भोपा आंदोलन, मेरठ का कमीश्नीर आंदोलन, लाल किले पर किसानों के खिलाफ आए डंकल प्रस्ताव वापस लेने के लिए किए गए आंदोलन इतिहास में याद किए जाने वाले बड़े किसान आंदोलन हैं। इनमें हिंसा हुई, किसान शहीद भी हुए लेकिन सरकारों ने किसानों को बुलाकर बातचीत के ज़रिये बीच का रास्ता निकाला।

हाल ही के दिनों में भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ने की पेंडिंग पेमेंट के लिए आंदोलन हो या पंजाब में गेंहू-धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़वाने के लिए आंदोलन हुआ हो बाकायदा किसान नेताओं से बातचीत की गई है। किसान नेता चाहे वह चौधरी चरण सिंह हों, चौधरी देवीलाल,सर छोटू राम या महेंद्र सिंह टिकैत राज्य और केंद्र सरकारें इन्हें नज़अंदाज़ नहीं कर सकती थीं। आज उत्तर भारत के किसान नेताओं का वैसा कद तो नहीं है लेकिन ऐसी हालत नहीं है कि इनके यहां राज्य सरकारों ने इतनी बेशर्मी दिखाई हो कि सरेआम 9 लोग मारे गए और सरकार मान तक नहीं रही है कि वे कैसे मारे गए।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का कहना है कि ये नकली किसान नेता हैं मैं असली किसान नेताओं से बात करूंगा। यानी आप इनसे बात नहीं करेंगे। इस प्रकार से आप पूरे आंदोलन को ही खारिज कर रहे हैं। आपको कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है। शहरों में के एसी ड्राइंग रूम में बैठकर बातें तो कैसी भी कर लो लेकिन खेत, खेती की लागत, बिजली-पानी,उपकरण, खाद, मिट्टी, उपज, उसे कीड़ों से बचाना, उसे बेचना,मंडियों तक पहुंचाना, उसकी उचित लागत मिलना, कर्ज, साहूकार, बैंक, कुर्की यह सब तो सिर्फ किसान जानता है।

हमारा पेट आज भी किसान के उगाए अन्न से भरता है। वो वर्ग बहुत कम है जो इटालियन पिज्ज़ा या पास्ता खाकर अपना पेट भरता है। रियल इस्टेट माफिया ने वैसे ही खेती की ज़मीने निगल ली हैं। ज़मीन कम हो गई है। दालों की पैदावार कम हुई है। रहती कसर सरकारें पूरी कर रही हैं ताकि किसानों की आने वाली पुश्तें किसी सूरत में खेती न करें। समाधान के रूप में कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग रह जाएगी। राज्य में शांति की बहाली के लिए अगर राज्य का सबसे ज़िम्मेदार नेता ट्वीट पर कहे कि वह अनशन पर बैठ गया है तो हालात सुधरेंगे नहीं बेकाबू ही होंगे। यही नहीं जब पत्रकारों ने केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह मंदसौर में किसानों की हत्या को लेकर सवाल पूछा तो कृषि मंत्री ने कहा योग कीजिए।

किसानों के कर्ज की समस्या का स्थायी हल निकालने की ज़रूरत है। इसे सरकार चुनावी छुनछुने की तरह बजाना अब बंद करे। महेंद्र सिंह टिकैत कहा करते थे कि ‘हम तो दुश्मन का खाना-पानी भी बंद नहीं करते।’ किसानों की नाराज़गी और सत्ता का उपवास सभी को मंहगा पड़ेगा।

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