Exact matches only
Search in title
Search in content
Search in posts
Search in pages
Filter by Categories
home
margin
slider
top three
top-four
travel
Uncategorized
viral
young india
कल्चर
दुनिया
देश
लीक से हटकर
विशेष
वीडियो
सटीक
सियासत
हाशिया
हेल्थ

उम्मीदों के पथ पर नई दलित ‘क्रान्ति’, इम्तिहां और भी हैं

अलीमुल्लाह खान

गुज़रे कई बरसों में कई आंदोलनों की आंधी चली। ऐसा लगा कि देश में क्रान्ति होने ही वाली है। यह आंधी भ्रष्टाचार,जुर्म और कुशासन सब को उड़ा ले जाएगी। एक नए राष्ट्र का निर्माण होगा। मीडिया ने इन आंदोलनों के कई नायक गढ़े। सोशल मीडिया ने उसे खाद-पानी दिया। इन नायकों ने कितनी जुमलेबाज़ी की और हक़ीक़त में कितना काम किया वो सब बताने की ज़रूरत नहीं। एक-एक महीने की उम्र के यह आंदोलन और इनके नेता औंधे मुंह ज़मीन पर गिरे हैं। गुमनाम हो गए। वजह यही समझ आती है कि छोटे-छोटे मंसूबों के पूरे होते ही तथाकथित हौसलों के जोश को निजी मंसूबों के पानी ने धो दिया।

इन दिनों उत्तर भारत में उस दलित आंदोलन की चर्चा है जिसने दलित आंदोलन के उम्र दराज़ पुरोधाओं की ज़मीन हिला दी है। उनके क़िले में सेंध लगा दी है। इसमें कोई शक़ नहीं कि दलित आंदोलन की यह नई पौध इस वक्त गुस्से से भरी हुई है। इनकी ख़ासियत यह है कि यह पौध अपने हक़ जानती है, पढ़ी-लिखी है। इसे नज़रअंदाज़ करना सत्ता के लिए मुश्किलों को दावत देना होगा। इस मायने में भी यह अच्छी बात है कि दलित जनचेतना की विचारधारा को कुछ पुराने बरगद के पेड़ों ने अपनी जड़ों में कसकर समेटा हुआ था। ज़मीन पर दलित आंदोलन दम तोड़ चुका था। इसलिए इस लिहाज़ से यह सच में एक नई क्रान्ति का आग़ाज़ है।

लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि आखिर कब तक? यही तेवर क़ायम रहेंगे क्या ? दलितों में भी फिरक़ापरस्ती है,उससे उबर पाएंगे ?, यह पढ़ा लिखा दलित आंदोलनकारी मिर्चपुर और भगाणा कांड का भी नेतृत्व करेगा ?, आज तक मैला ढो रहे दलितों की पैरवी करेगा? हरियाणा में उस जाट समुदाय से मुकाबला करेगा जो आज भी दलित दूल्हे को घोड़ी पर नहीं चढ़ने देते हैं। उन पटेलों से लड़ेगा जो गुजरात में दलितों को मंदिरों में नहीं घुसने देते हैं, उस दलित समाज के हक़ के लिए क्या करेगा जिनके घर आज भी गांव से बाहर इस दिशा में बनाए गए हैं कि हवा वहां से गुज़रते हुए गांव में दाखिल न हो। पंजाब में उस ज़मींदार बिरादरी से कैसे निपटेगा जो दलितों को न तो गुरुद्वारों में आने देते हैं और न गांव का शमशान घाट प्रयोग करने देते हैं। पंजाब के कई गांवों में रोष में दलितों ने अपने परिजनों की लाशें गांव के ज़मींदारों के घरों के सामने जलाई हैं। कई दलित ईसाई बन गए और आंगन में अपनों की लाशें दफन कर दीं।

यह वो कड़वे सच हैं जो मीडिया के ज़रिये बाहर आए। पता नहीं कितने और सच दफन हुए रखे हैं। भारत में दलित समाज के साथ भेदभाव की जड़े इतनी गहरी हैं कि यह कह पाना मुश्किल है कि उस समाज का असल दर्द बहुत कम उम्र के आंदोलन के यह हीरो समझते होंगे।
वाह वाही और आंदोलनों के पीछे की राजनीति में मुद्दे अक्सर दम तोड़ जाते हैं। गर्म खून वाली आंदोलनकारियों की यह नई जमात पर्दे के पीछे कितनी संजीदा है असल बात तो यह है। अन्यथा हमारे होशो हवास में अन्ना आंदोलन से बड़ा कोई आंदोलन ही नहीं हुआ था जिसमें किरण बेदी आज भी याद है कि किस प्रकार तिरंगा लहराया करती थी। लेकिन कहां गए अन्ना और कहां है किरण बेदी? देश जिस दौर से गुज़र रहा है उसमें तो अरविंद केजरीवाल भी कुछ नहीं बोल रहे हैं सिवाय इसके कि केंद्र सरकार इन्हें काम नहीं करने दे रही है।

जिग्नेनेश मेवाणी और अब चंद्रशेखर आज़ाद कितना किसके हाथ की कठपुतली बनकर रहेंगे, कितना सियासी हो जाएंगे, कितनी महत्वकांक्षाए पाले हुए हैं ये वो जनता नहीं जानती जो पोटली में रोटी और सूखे आलू बांधकर जंतर-मंतर आती है। बहुत अच्छी बात है कि इनके मंसूबे खरे हों लेकिन उनमें अगर निजी मंसूबों की ज़रा सी भी गंध है तो इनमें और उन बरगद के पुराने पेड़ों में कोई फर्क नहीं है जो कानों में हीरे,हाथ में लैदर का पर्स टांग कर अपने जूते हवाई जहाज से मंगवाते हैं और खुद को दलितों का नेता कहते हैं।