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उजड़ते कश्मीर में घर बसाने का ख़्वाब!

इमामुद्दीन अलीग

आर्टिकल 370 हटाने के फायदे तो बहुत सुन लिए होंगे। कश्मीर की खूबसूरत वादियों में अपना घर, सेबों और मेवों से लदा अपना बाग़ और दिलफ़रेब कश्मीरी परियों के संग घर-गृहस्ती, कश्मीर की साफ-सुथरी झीलों, खिलखिलाती नदियों और मचलते झरनों में मस्ती और न जाने क्या क्या… लेकिन ज़रा रुकिए और थोड़ी देर के लिए इस ख्याली जन्नत से बाहर निकल कर वादी की वास्तविक परिस्तिथियों के आधार पर संभावित परिणामों का आकलन कीजिये। देखिये कि अब तक कश्मीर के हालात क्या थे, पिछले तजुर्बात, मौजूदा हालात, जनता के रुझान और सरकार के फैसले को सामने रख कर अंदाज़ा लगाइए कि कश्मीर के हालात आगे किस रुख पर जा सकते हैं।

कश्मीर में अब तक अक्सरो-बेश्तर लड़ाई मिलिटेंटों और सिक्योरिटी फोर्सेज के बीच होती रही है। जनता कुछ हद तक पत्थरबाजी और मिलिटेंटों को बचाने के प्रयासों तक सीमित रहती थी… कश्मीर की जनता का यह रुझान बता रहा है कि आर्टिकल 370 खत्म करने से आम अवाम में चरमपंथ अपने चरम पर पहुँच जाएगा। ऐसे में इस बात की प्रबल संभावना है कि कश्मीरी अवाम सरकार के फैसले को नाकाम बनाने के लिए ऐसे सभी लोगों को भी टारगेट करना शुरू कर देंगे जिनपर कश्मीर में आबाद होने या ठहरने का शक होगा। ऐसी स्थिति में वहां काम करने वाले मज़दूर, देश के अन्य हिस्सों से जाने वाले पर्यटक, अमरनाथ दर्शन के लिए जाने वाले यात्री सब के सब मिलिटेंटों और आम जनता के निशाने पर होंगे। यानि अब तक जो लड़ाई मिलिटेंटों और फ़ौज के बीच थी, सरकार के इस फैसले से वो आम अवाम की लड़ाई बन सकती है। कश्मीर में घर-गृहस्ती बसाने का सपना तो बहुत दूर की बात है, वहां अब अन्य भारतियों के लिए मजदूरी और यात्रा भी खटाई में पड़ सकती है। यह बात तो बिलकुल स्पष्ट है कि इस फैसले से मिलिटेंसी को बढ़ावा मिलेगा और कश्मीरी अवाम व्यापक रूप से मिलिटेंसी के रास्ते पर चल पड़ेंगे।

आर्टिकल 370 के खात्मे के बाद पैदा हुए ताज़ा हालात में अंतर्राष्ट्रीय उतार-चढ़ाव को भी नज़र अंदाज़ करना बड़ी भूल होगी… मौजूदा हालात में कश्मीर के मिलिटेंट ग्रुप दुसरे देशों से मदद हासिल करने का हर संभव प्रयास करेंगे। यह बात सही है कि पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति इतनी ख़राब है कि कश्मीर के लिए भारत से किसी भी तरह की जंग छेड़ना तो दूर, मज़बूत मिलिटेंसी खड़ा करने की भी पोज़ीशन में नहीं है। लेकिन हम अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता के करीब पहुँच चुके तालिबान, अफगानिस्तान और सीरिया से मायूस अमरीका और हथियार बेचने वाली इंटेरनेशनल लॉबी को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते। अफगानिस्तान से गला खुलासी के लिए तालिबान से डील के मामले में अमरीका को पाकिस्तान की ज़रुरत है। ऐसे में पाकिस्तान अमरीका से अफगानिस्तान के बदले कश्मीर की दो तरफा ख़ुफ़िया डील कर सकता है… युद्ध की हद तक न ही सही, सियासी और सिफारती हद तक ही सही, अमरीका और पाकिस्तान के बीच ऐसी किसी खुफिया डील से इंकार नहीं किया जा सकता। हाल के दिनों में कश्मीर विवाद को लेकर ट्रम्प के बयानों से कुछ ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं। दूसरी तरफ चीन पहले से ही खुल कर पाकिस्तान के साथ है।

बहरहाल मोदी सरकार के इस फैसले से अंतर्राष्ट्रीय पटल पर पाकिस्तान की स्थिति मज़बूत होने के साथ साथ कश्मीर में मिलिटेंसी और हिंसा को बढ़ावा मिलने की प्रबल संभावना है, रही बात कश्मीर में धर्म विशेष के लोगों को बसाने और जनसंख्या के अनुपात को बदलने की बात, तो फिलहाल इसकी हैसियत दूर के ढोल सुहावने या शैख़ चिल्ली की ख्याली जन्नत से ज़्यादा कुछ नहीं।

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