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सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामला: पक्ष में फैसला देने के लिए सीबीआई जज को मिला था 100 करोड़ का ऑफर

 


गुजरात के चर्चित सोहराबुद्दीन शेख़ एनकाउंटर मामले की स्पेशल सीबीआई कोर्ट में सुनवाई कर रहे जज बृजगोपाल लोया की मौत पर उठे सवालों के बाद उनके परिवार ने मामले से जुड़े कुछ और खुलासे किए हैं.

द कारवां पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार लोया की बहन अनुराधा बियानी ने बताया कि उनके भाई बृजगोपाल लोया को उस समय बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मोहित शाह द्वारा सोहराबुद्दीन मामले में उनके कहे अनुसार फैसला देने के एवज में 100 करोड़ रुपये देने की बात कही गई थी.

पत्रिका के रिपोर्टर से बात करते हुए अनुराधा ने बताया कि मौत से कुछ समय पहले जब वे लोग दिवाली पर अपने गांव में मिले थे तब लोया ने उन्हें यह बात बताई थी.

लोया के पिता हरकिशन लोया ने भी इस बात की पुष्टि की और बताया कि इस मामले में पक्ष में फैसला देने के लिए उनके बेटे को पैसे और मुंबई में घर का प्रस्ताव दिया गया था.

गौरतलब है कि 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई सीबीआई स्पेशल कोर्ट में करवाने का आदेश दिया था. उस समय मामले की सुनवाई जेटी उत्पत कर रहे थे.

6 जून 2014 को जज उत्पत ने अमित शाह को इस मामले की सुनवाई में उपस्थित न होने को लेकर फटकार लगाई और उन्हें 26 जून को पेश होने का आदेश दिया. लेकिन 25 जून को 2014 को उत्पत का तबादला पुणे सेशन कोर्ट में हो गया. इसके बाद बृजगोपाल लोया आए, जिन्होंने भी अमित शाह के सुनवाई में मौजूद न होने पर सवाल उठाए.

आउटलुक पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार, मामले की शुरुआत में लोया अमित शाह की सुनवाई की तारीख पर मौजूदगी को लेकर नरम ही थे, पर ये नरमी न्यायिक प्रक्रिया के चलते थी. इसी रिपोर्ट के मुताबिक लोया ने केस में दी गई कुछ आखिरी टिप्पणियों में कहा था कि शाह को सुनवाई में उपस्थित होने के मामले में यह छूट आरोप तय हो जाने तक दी जा रही थी. लोया के इस नरम रवैये का अर्थ यह नहीं था कि वे उनके ख़िलाफ़ आरोप हटाने के बारे में सोच भी रहे थे.

द कारवां पत्रिका की रिपोर्ट बताती है कि इस मामले में सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन के वकील मिहिर देसाई के मुताबिक लोया इस मामले की पूरी चार्जशीट (जो लगभग 10,000 पन्नों की थी) सबूत और गवाहों की बारीकी से जांच करना चाहते थे.

मिहिर देसाई ने बताया, ‘ये काफी संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामला था और इससे एक जज के बतौर लोया की प्रतिष्ठा का फैसला हो सकता था. लेकिन दबाव तो निश्चय ही बढ़ रहा था.’

देसाई के अनुसार, ‘कोर्ट रूम का माहौल बेहद तनावपूर्ण रहता था. बचाव पक्ष के वकील शाह के ख़िलाफ़ आरोप हटा देने पर जोर दिया करते थे, जबकि हमारी मांग थी कि सीबीआई द्वारा सबूत के रूप में सौंपी गई कॉल्स के ट्रांसक्रिप्ट अंग्रेज़ी में दिए जाएं क्योंकि न हमें न लोया को गुजराती समझ में आती थी.’

देसाई ने 31 अक्टूबर 2014 को हुई सुनवाई के घटनाक्रम को याद करते हुए बताया कि लोया ने शाह के बारे में पूछा, जिस पर शाह के वकीलों ने जवाब दिया कि वे लोया के आदेशानुसार ही अनुपस्थित हैं. इस पर लोया ने कहा ये छूट केवल उस समय के लिए है जब शाह राज्य में मौजूद नहीं हों. उस समय नवनिर्वाचित महाराष्ट्र सरकार के शपथ ग्रहण के लिए वे मुंबई में ही थे.

लोया ने तब शाह के वकीलों को आदेश दिया कि अगली बार जब शाह राज्य में हो तब वे सुनवाई पर शाह की कोर्ट में मौजूदगी सुनिश्चित करें. इसके बाद अगली सुनवाई की तारीख 15 दिसंबर 2014 तय की गई, लेकिन 1 दिसंबर 2014 को ही उनकी मौत हो गई.

मालूम हो कि बृजगोपाल लोया के परिजनों से हुई बातचीत का हवाला देते हुए सोमवार को द कारवां पत्रिका में प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट में लोया की मौत की संदेहास्पद परिस्थितियों पर सवाल उठाए गए हैं.

 

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