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सोहराबउद्दीन मामलाः जज की मुश्तबा मौत,शक़ के दायरे में फिर शाह

हिसाम सिद्दीकी

जज लोया की बहन और वालिद ने कहा कि अमित शाह समेत बारह मुल्जिमान के खिलाफ मुकदमे में नर्म रवैय्या अख्तियार करने के लिए हाई कोर्ट के एक जज के जरिए सौ करोड़ रूपए की रिश्वत की पेशकश की गई थी, जिसे उन्होने ठुकरा दिया था उनकी मौत के बाद आए जज एमबी गोसावी ने सिर्फ एक महीने मे सभी मुल्जिमान को बरी कर दिया था। एक हजार पेज की चार्जशीट दाखिल करने वाली सीबीआई ने इस फैसले के खिलाफ अपील भी नहीं की थी।

सीबीआई के स्पेशल जज बृजगोपाल हरिकृष्ण लोया की मौत की वजह हार्ट अटैक बताया गया था, घर वालों की इजाजत के बगैर पोस्ट मार्टम किया गया उनकी बाडी मुंबई में उनकी बीवी बच्चों के पास भेजने के बजाए लातूर जिले के उनके गेट गांव को एक ड्राइवर के साथ भेज दिया गया। उनके कपडों पर खून के द्दब्बे कहां से आए। उनका मोबाइल तीन-चार दिन बाद आरएसएस स्वयं सेवक ईश्वर बहेती लेकर आया था। फोन के तमाम रिकार्ड डिलीट कर दिए गए थे।

जज बृजगोपाल लोया की आखिरी रसूमात (अंत्येष्टि) में शामिल होने उनके गांव आए दूसरे कई जजों ने उनकी बीवी बच्चों से कहा था कि वह खामोश ही रहें क्योंकि उनके दुश्मन बहुत ही जालिम और ताकतवर हैं। इसीलिए उनकी बहन, भांजी और वालिद ने अब आवाज उठाई है लेकिन उनकी खौफजदा बीवी और बच्चे आज भी बोलने की हिम्मत नहीं कर सके।

सोहराबउद्दीन के मुबय्यना (कथित)इनकाउंटर मामले में अमित शाह समेत एक दर्जन मुल्जिमान के खिलाफ सुनवाई करने वाले जज बृजगोपाल हरिकृष्ण लोया की पहली दिसम्बर 2014 को नागपुर के वीआईपी गेस्ट हाउस में दिल का दौरा पड़ने से मौत नहीं हुई थी बल्कि उन्हें कत्ल किया गया था। तीन साल बाद जज लोया की डॉक्टर बहन अनुराधा, भांजी नुपूर और वालिद हरकिशन ने इस मामले पर अपना दर्द बयान करते हुए जो कुछ कहा है उससे तो यही साबित होता है कि जज लोया को बड़ी गहरी साजिश के तहत कत्ल किया गया था।

उनकी बीवी और बच्चे तो आज तक इतने सहमे हुए हैं कि कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। अब पता चला कि लोया की आखिरी रसूमात (अंत्येष्टि) में शामिल होने उनके जो साथी जज उनके गांव आए थे उनमें से कुछ ने बीवी बच्चों से कहा था कि वह खामोश ही रहें क्योंकि उनके दुश्मन बहुत ही जालिम और ताकतवर लोग हैं।

लोया के बाद इस मामले की सुनवाई एम बी गोसावी के सुपुर्द की गई। एक हजार सफहात (पृष्ठों) की चार्जशीट वाले इस मामले को गोसावी ने पन्द्रह दिनों में निपटा दिया और तीस दिसम्बर 2014 को यह कहते हुए अमित शाह और ग्यारह दीगर मुल्जिमान को बरी कर दिया कि यह मुकदमा तो सियासी वजूहात की बिना पर चलाया गया था। लोया की बहन और वालिद का यह भी कहना है कि इस मामले मे जज लोया को मुंबई हाई कोर्ट के एक जस्टिस के जरिए सौ करोड़ की रिश्वत की पेशकश भी की गई। पहली दिसम्बर 2014 को जज लोया की मौत हार्ट अटैक से होना बताया गया।

वह जिस गेस्ट हाउस में ठहरे थे उसमें कई दूसरे जज और सीनियर अफसरान ठहरे हुए थे। कई गाडियां खड़ी थीं फिर भी दिल का दौरा पड़ने पर उन्हें आटो में बिठाकर ऐसे अस्पताल ले जाया गया जहां ईसीजी करने का भी बंदोबस्त नहीं था। फिर दूसरे अस्पताल ले जाया गया जहां डाक्टरों ने कहा कि उनकी मौत पहले ही हो चुकी। उन्हें कौन अस्पताल ले गया कुछ पता नहीं है।

घरवालों से इजाजत लिए बगैर उनका पोस्ट मार्टम कराया गया। पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के हर पेज पर किसी के फर्जी दस्तखत हैं नीचे लिखा है लोया के चचेरा भाई जबकि उनका कोई चचेरा भाई ही नहीं है। उनके कपडों पर खून के धब्बे कई जगह थे वह कहां से आए। वह मुंबई में अपनी बीवी बच्चों के साथ रहते थे उन्हें मौत की खबर नहीं दी गई और जस्दे खाकी (पार्थिव शरीर) मुंबई के बजाए लातूर जिले में उनके आबाई गांव ‘गेटगांव’ क्यों और किसके कहने पर भेजा गया वह भी एक ड्राइवर ही उसे लेकर गांव पहुचा।

आज तक यह भी खुलासा नहीं हो सका कि उन्हें किस वक्त दिल का दौरा पड़ा और कब उनकी मौत हुई? उनके मोबाइल फोन समेत सारे सामान को पचनामा करके पुलिस ने एक जगह क्यों नहीं रखा तीन-चार दिन बाद आरएसएस का एक स्वयं सेवक ईश्वर बहेती उनका मोबाइल उनकी बहन को दे गया। फोन के तमाम रिकार्ड्स डिलीट किए जा चुके थे। इसी संघी ईश्वर बहेती ने उनकी मौत की खबर भी घर वालों को दी थी।

अब जज बृजगोपाल हरिकृष्ण लोया के वालिद और बहन ने पूरे मामले की आला सतही तहकीकात का मतालबा किया है। यह पूरा मामला मंजरे आम पर लाने का हौसला मुंबई के खोजी सहाफी निरंजन टाकले ने दिखाया है। उनकी तफसीली रिपोर्ट दो हिस्सों में अंग्रेजी मैगजीन कारवान ने शाया की तो हंगामा मच गया।

कारवां की खबर को कई पोर्टल्स ने अपने-अपने हिसाब से शाया किया तो इंडिया संवाद ने कुछ और मालूमात इकट्ठा करके खबर चलाई। मुल्क के अखबारात और टीवी चैनलों ने इस खबर को कोई तवज्जो नहीं दी अकेले एनडीटीवी के रवीश कुमार ने ही इस खबर को टेलीकास्ट करने की हिम्मत दिखाई।

अब देखना यह है कि मुल्क के चीफ जस्टिस इस मामले पर कोई नोटिस लेते हैं या नहीं? उन्हें इतना ख्याल जरूर रखना चाहिए कि अगर वह अपनी ही बिरादरी के एक जज को इंसाफ नहीं दिला पाए तो आम लोगों का अदलिया पर भरोसा कमजोर होगा। मशहूर वकील प्रशांत भूषण का मतालबा है कि तहकीकात तो इस बात की भी होनी चाहिए कि जिस मामले मे खुद सीबीआई ने एक हजार पेज की चार्जशीट दाखिल की थी उसमें ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील क्यों नहीं की?

(लेखक उर्दू दैनिक जदीद मरकज़ के संपादक हैं।)