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“मुस्कुराईये, आप लखनऊ में हैं – 2” रेज़ीडेंसी इश्क़ की प्राईवेसी में चारदीवारी बनकर दरबानी करता है

नाज़िश अंसारी

गुरबत वाला इश्क जिसे रेस्टोरेंट नसीब नहीं होते,रेज़ीडेंसी उनकी प्राइवेसी में चारदीवारी बनकर दरबानी करता है। मोहब्बत के दरिया में गोते खाते जोड़ों के लिए जब पूरा शहर अपनी आंखों को सीसीटीवी से रिप्लेस कर लेता तब उनके सुकून के ठौर की तलाश रेजिडेंसी खत्म करता है।

रेजीडेंसी यानी ईस्ट इंडिया कंपनी का अवध ब्रांच का ऑफ़िस और अन्ग्रेज़ों की रिहाईशी क्षेत्र। तारीख कहती है-
1764 में मुगल बादशाह और अवध के नवाबों की संयुक्त सेना अंग्रेजों से बक्सर का युद्ध हार गई। नतीजतन अंग्रेजों ने मांग रखी कि ब्रिटिश प्रतिनिधि को अवध  दरबार में नियुक्त किया जाए।

1775 में नवाब आसिफुद्दौला ने गोमती के दक्षिणी किनारों पर शेखज़ादों से कुछ जमीने खरीदी और बंगले नुमा घर बनाए। क़रीब 33 एकड़ में फैला यह क्षेत्र ब्रिटिश रेजिडेंट के रहने की जगह थी। यही रेजीडेंसी कहलाई।
नवाब रेजिडेंट्स को अपना मेहमान मानते थे। मेहमान नवाज़ी और देखभाल में उनके दारोगा नियुक्त थे। लेकिन सियासत, प्रभुत्व की लालसा, आवभगत की भाषा नहीं समझती। रेज़ीडेंट्स का दरबारी कामों में दखल से दोनों तरफ के लोगों में कड़वाहटें होने लगीं।

7 फरवरी 1857 को वाजिद अली शाह को अयोग्य करार देते हुए उनसे बादशाहत छीन ली गई। नवाबी हुकूमत की जगह कंपनी बहादुर ने ली।

उधर 10 मई 1857 को अंग्रेज अफसरों की मनमानी से त्रस्त मेरठ में ब्रिटिश सेना के भारतीय सैनिकों ने बगावत कर दी। और दिल्ली में बहादुर शाह जफर से अपने नेतृत्व की गुहार लगाई। उनका नेतृत्व मिलते ही यह क्रांति इंकलाब का शोला बन गयी। जिसकी चिंगारियां उन्नाव, सुल्तानपुर, सीतापुर, जौनपुर से लेकर लखनऊ तक पहुँचीं।
वाजिद अली शाह से बेपनाह मुहब्बत करने वाली आवाम उन्हें गद्दी से उतारनेे की वजह से अंग्रेजों से नफरत की हद्द तक चिढ़ी बैठी थी। गदर को बेगम हजरत महल का नेतृत्व मिलते ही अवध के क्रांतिकारियों ने रेज़ीडेंसी पर ताबड़तोड़ हमले किये। तीन रोज तक लगातार।

तड़तड़ तोप के गोलों की बारिश और धड़ाधड़ मरते हुए अंग्रेज़••
आखिरकार सेना प्रमुख कॉलिन कैंपबेल को लगने लगा कि अवध क्रांतिकारियों को हराया नहीं जा सकता। उन्होंने बचे हुए ब्रिटिश सैनिकों को वापस जाने का आदेश दिया। इसके बाद वे अवध को वापस एक साल बाद जीत सके।

रेजीडेंसी का दाखिल दरवाज़ा बेली गारत गेट नाम से मशहूर हैं। इसे नवाब सआदत अली खाँ ने 19वीं शताब्दी की शुरुवात में लखनऊ के रेजिडेंट कैप्टन बेली के सम्मान में बनवाया था। उन्होंने ही बैन्क्वेट हाल का निर्माण कराया। गेट के बगल में डॉक्टर फेयरर का घर है।
बेगम कोठी में नसीरुद्दीन की विलायती बेगम रहती थीं। उनकी मौत के बाद उन्हीं की सौतेली बहन शर्फुन्निसा ने अवधी शैली में इमामबाड़ा और एक मस्जिद भी बनवाई।

रेज़ीडेंसी के दक्षिण भाग में एक तहखाना है। तहखाने ने अंग्रेज़ों को लखनऊ की भयंकर लू से बचाया। गदर के वक़्त यूरोपीय महिलाएं और बच्चों को छिपाया भी।
तीन दिन चली उस जंग में मर रहे ब्रिटिशों की तादाद इतनी होती कि एक शॉर्ट प्रेयर के साथ उनको वहीं दफना दिया जाता था।

रेजीडेंसी अपने कैंपस में कब्रिस्तान रखता है। चर्च भी। बूचड़ खाना। इमामबाड़ा और मस्जिद भी। इसी रेजीडेंसी को 1857 की गदर में लगातार तीन दिन तोपों से छेदते हुए लखनऊ अन्ग्रेज़ों को हरा देता है।

जो आज खंडहर है वहां कभी नवाबों की शाही दावत हुआ करती थीं। उनकी बेगमात रहा करती थीं।

अब सिर्फ अवशेष हैं। मिट के भी नहीं मिटा वह है, दीवारों और खंभों पर तोप के गोलों के निशान। जो चेचक की तरह बदसूरत हैं। फिर भी रेजीडेंसी खूबसूरत है। और गवाह है 1857 की गौरवपूर्ण जीत की। इस विश्वास की, जंग कैसी भी हो, असलहों से नहीं, हौसलों से जीती जाती है।

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