Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content
Search in posts
Search in pages

सिंधिया और पायलट के ‘सम्मान राग’ की पड़ताल

डॉ राकेश पाठक

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो चमकते दमकते चेहरे आखिरकार ‘हाथ’ का साथ छोड़ ही गए। ज्योतिरादित्य सिंधिया अब मोदी-शाह की गोदी में बैठ कर सत्ता का माखन पा गए हैं और सचिन पायलट मक्खन के छींके की तरफ टकटकी लगाए हैं।

दोनों को नटखट नंद गोपाल की तरह मुख्यमंत्री पद का ‘चंद-खिलौना’ चाहिये था और उसके बिना मचल कर घर से बाहर आ गए हैं। आईये पहले कांग्रेस नेतृत्व को कोसने की रस्म अदा कर ली जाये। तो बिल्कुल सही बात है कि इन दोनों युवाओं को सहेजना,समेट कर रखना पार्टी के आला कमान की ज़िम्मेदारी थी। निहोरे,पाते करके इन्हें मनाना चाहिये था। कोशिश की भी तो परवान नहीं चढ़ी।

दूसरा पहलू भी गौर कर लीजिये
जब यह मामूल हो कि आपका जिगरी दोस्त जिसे अपने सब कुछ दिया हो वह महीनों से आपके जानी दु’श्मन के साथ पीगें बढ़ा रहा है तो उसे क्यों मनाना चाहिये??? सिर्फ़ इसलिये कि आप को आख़िरी दिन तक धो’खा देता रहे और क”त्ल कर दे??? सोचिएगा ज़रूर।

सिंधिया और पायलट ने पार्टी में सम्मान न मिलने का राग
अलापा है। दोनों ने रस्मन वह डायलॉग भी पेश किया है कि “सत्य परेशान हो सकता है,पराजित नहीं।”
तो कायदे से इसकी पड़ताल तो होना ही चाहिये कि इन दोनों के साथ ऐसा क्या हो रहा था कि ये पार्टी से गयाराम हो गए?

पहले सिंधिया की पड़ताल

ज्योतिरादित्य अपने पिता माधवराव सिंधिया के असमय
निध’न के बाद राजनीति में आये। उनका कांग्रेस में प्रवेश सोनिया गांधी के घर हुआ। चार पूर्व मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल,अर्जुन सिंह, मोतीलाल बोरा ,दिग्विजय सिंह और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष राधाकिशन मालवीय सोफे के पीछे खड़े थे। (सिंधिया के बीजेपी में प्रवेश के दृश्य ताजा ही हैं,याद कर लीजिएगा)

सिंधिया ने सियासी सीढियां सरपट चढ़ीं और 18 साल में से 17 साल सांसद रहे। केंद्रीय मंत्री रहे। लोकसभा में उप नेता और चीफ़ व्हिप रहे। प्रियंका गांधी के साथ राष्ट्रीय महासचिव बने। उत्तर प्रदेश में प्रियंका के बराबर आधे आधे के प्रभारी रहे। केंद्रीय कार्यसमिति के सदस्य रहे।

मप्र चुनाव अभियान समिति के संयोजक भी रहे।
2019 का लोकसभा चुनाव अपने ही एक पूर्व कार्यकर्ता से सवा लाख वोटों से हार गए। सिंधिया खेमे का दावा है कि उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। आंकड़े बताते हैं कि जब 2018 के नतीजों के बाद जोर आजमाइश हुई तो सिंधिया के साथ मात्र दस बारह विधायक थे। ज़ाहिर है बहुमत कमलनाथ के साथ था और वे सीएम बने।
पार्टी छोड़ते समय भी उनके साथ 19 विधायक ही आये हैं।

सिंधिया जिस पार्टी में सम्मान न मिलने की बात कर रहे हैं उस पार्टी में वे पूरी अठारह साल टॉप फाइव में रहे। यहां तक कि जब राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ा तब उस पद के दावेदारों में उनका नाम पहले नंबर पर चला।

अब सिंधिया जिस पार्टी में हैं वहां वे प्रदेश में ही संगठन में छठवें नम्बर पर रखे जा रहे हैं। उप चुनाव के बाद पार्टी का रुख क्या होगा कोई नहीं जानता। सिंधिया ने पार्टी छोड़ते समय न रिश्तों को तरजीह दी न विचारधारा को तवज्जो। मजेदार बात ये है कि आज वे उस पार्टी में हैं जिसे वे जुमा जुमा चार दिन पहले लोकतंत्र की ह’त्या में एक्सपर्ट बता रहे थे।

अब सचिन पायलट की बात

सिंधिया जैसी कहानी राजस्थान में सचिन पायलट ने दोहराई है। राग वही कि पार्टी में सम्मान नहीं था। सचिन भी अपने पिता राजेश पायलट की मृ’त्यु के बाद राजनीति में आये। जब राजेश पायलट का निध’न हुआ तब सचिन की उम्र चुनाव लड़ने लायक नहीं थी। तब उनकी मां रमा को कांग्रेस ने टिकिट दिया और वे विधायक रहीं।

जैसे ही सचिन 25 बरस के हुये उन्हें लोकसभा का टिकट मिल गया और वे 26 साल की उम्र में सांसद बन गए।
31 साल की उम्र में केंद्रीय मंत्री बने। एक लोकसभा चुनाव दो लाख वोटों से हारे फिर 35 साल की उम्र में प्रदेश अध्यक्ष और 40 साल की उम्र में उप मुख्यमंत्री।

सचिन भी फौरन से पेश्तर सीएम बनने को उतावले थे जबकि बहुमत अशोक गहलोत के साथ था। अब भी बग़ा’वत के वक्त गिनती के ही विधायक साथ गए हैं। तथ्य तो यह भी है कि सचिन पायलट का नाम कांग्रेस के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के लिये भी चर्चा में रहा ही था फिलवक्त सचिन बीजेपी में नहीं गए हैं लेकिन उप मुख्यमंत्री पद से बर्खा’स्त हो चुके हैं। अब उनके लिये कांग्रेस के दरवाज़े फिलहाल तो बन्द ही दिखते हैं। देखना होगा कि सिंधिया को बीजेपी में कब तक कितना सम्मान मिलता है?
पायलट की राह अभी साफ नहीं है। वे बीजेपी में जाएंगे या अलग पार्टी बनाएंगे यह देखना बाक़ी है।

Democracia एक गैर-लाभकारी मीडिया संस्था हैं। जो पत्रकारिता को सरकार-कॉरपोरेट दबाव से आज़ाद रखने के लिए वचनबद्ध है। इसे जनमीडिया बनाने के लिए आर्थिक सहयोग करें।