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बोल कि यह थोड़ा वक़्त बहुत है

नाज़िश अंसारी

डर, गुस्सा, नाउम्मीदी, हताशा, बेचैनी में सोचती हूं–मैं बच जाऊँगी शायद। जैसे-तैसे। बिटिया अभी ढाई बरस की ही है। बरसों बरस ज़िंदगी के कई पड़ाव उसके सामने ठूंठ से खड़े हैं। हाँ ठूंठ•••बिना किसी भाव के। भाव हों भी तो इन घटनाओं के बाद अंजान व्यक्ति पर यक़ीन करने की frequency घटती जाती है।

प्रियंका रेड्डी पेशे से वेटरनरी डॉक्टर हैं। तय वक़्त पर शाम को घर आने के बाद खुद को दिखाने किसी क्लिनिक के लिये निकलती हैं। लौटते हुए रात 9 के ऊपर का वक़्त है। रास्ते में गाड़ी का टायर पन्कचर हो जाता है। हैदराबाद हाईवे पर खड़ी वह अपनी बहन को फोन करती हैं। तमाम लारी वालों के घूरने की शिकायत के साथ वे डरी हुई हैं। एक मेकेनिक गाड़ी सही करने का कह कर टोलगेट से दूर ले जाता है। फोन स्विच ओफ्फ। घर वाले गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराते हैं। सुबह किसी खेत में जली लाश के तौर पर उनकी शिनाख्त होती है।

ट्वीटर पर हैशटैग चल रहा है। कैंडल मार्च निकाला जा चुका है। लोग dp ब्लैक करेंगें। तीखी आलोचनाओं, कड़ी निन्दाओं, सख्त कार्यवाही के क्लीशेज़ के बीच देश की एकता चरम पर होगी। न्यूज़ चैनलों को भी थर-थर कांपते पाकिस्तान, बिल में घुसे मसूद अज़हर से ब्रेक मिलेगा।
नारीवाद फिर उबाल मारेगा। निर्भया, कठुआ, उन्नाव•• अब हैदराबाद। (हालाँकि इसके बीच 20,000 से ऊपर रेप हो दर्ज चुके हैं। बगैर दर्ज हुए तो जाने कितने हैं•• )

पहले हर 20 मिनट•• फिर 15•• अब 11 मिनट में देश की एक लड़की– (नहीं, असल में स्त्री योनि) बलत्कृत होती है। मिनट्स घट रहे हैं लगातार। घट रही है हमारी संवेदनशीलता भी।

स्क्रोल डाउन करते उदास मूड में भी हा-हा एमोजी react करने के आदी लोग कुत्ते-बिल्ली के लिये संवेदनशील हैं। गाय के लिये इनकी संवेदनशीलता उरूज़ पर पहुँचती है। बारूद बनकर पहलू खानों पर फट फट पड़ती है।

“आधी रात तक घर से बाहर रहेगी। छोटे कपड़े पहनेगी तो यही होगा।”
निभर्या के वक़्त आये इस तर्क को पहनने की आज़ादी के अधिकार से काटा गया। दूध पीती बच्ची से लेकर वृद्ध औरत तक नोची, घसीटी, मारी गयी। बलात्कारी को मानसिक रूप से विछिप्त/अवयस्क कह कर मामला सलटाया गया।

फाँसी की माँग हर बार उठती है। बैठ जाती है। निचली से लेकर ऊपरी अदालत, कहीं भी फैसले को चुनौती देने और न्याय व्यवस्था का पूरा procedure देखते हुए practically कतई हलुवा ना हो रखा सब।
हालांकि इस जुर्म का निपटारा हलवा सरीखा ही होना चाहिये था। जो कि नहीं है।
विश्व गुरु बनने का ख्वाब पाले हिन्दुस्तान अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बलात्कारियों का अघोषित देश है।

कारण की बात करें तो भारतीय समाज के तमाम नियम-चलन, परम्परा, बंदिश ने स्त्री शरीर को रहस्मयी बना रखा है। सेक्स को वर्जित। डेढ़-दो जीबी डेटा से लैस स्मार्टफोन, महज़ एक click पर अश्लील videos/clips, पोर्नोग्राफी की असीमित दुनिया खोल देते हैं। व्यक्ति उत्तेजित है। बेरोज़गार। शराब। अकेली लड़की। मौक़ा पाकर मोबाइल में देखी उत्तेजना को लाइव कर के देखता है।
पित्रसत्तात्मक समाज के शीर्ष पर बैठा मर्द जानता है वह जिसकी चाहे छाती छू ले। जिसे चाहे छेड़ ले। फब्तियाँ कस लें। पीड़िता ही आरोपी कही जाएगी। बेइज़्ज़ती, बेशर्मी से जाने कितनी घटनाएँ दर्ज़ नहीं की जाएंगीं। उससे ज़्यादा लड़कियों के ज़हन में होकर भी ज़बान तक नहीं आएंगी।
निर्भया के आरोपियों में किसी को फाँसी नहीं। उन्नाव केस में मंत्री जी बाइज़्ज़त बरी हैं। तो क्यूँ ना इस उम्र में लड़कों से ऐसी गल्तियां हो जाया करें!

सदियों से औरत को घर सम्भालने, बच्चे पैदा करने, चारदीवारी में रहने की ताकीद थी। औरतें बाहर निकल रही। नौकरी कर रही। तमाम क्षेत्रों में उनसे मिली चुनौती भी एक कारण है। बलात्कार एक तरह से स्त्री को उसकी औक़ात बताना है।

ये विडम्बना है कि सामने समस्या है। कारण भी है। समाधान का मगर पता नहीं। जो हैं भी कारगर नहीं।

लेटेस्ट पर लहालोट हुई जा रही generation ने अपडेट टू डेट होने का प्रेशर बना रखा है। मोमबत्ती जलती हैं। जल जाते हैं जंतर-मंतर पर लगाये नारे भी। साथ जलता जाता सभ्य समाज का सुन्दर चेहरा।
समय का यह सबसे बदसूरत रूप है। हम डरी हुई औरतें अपनी बच्चियों को सीने में दबाएं अभिशापित हैं जीने को। हम जाएँ तो जाएँ कहाँ••
और जाएँ तो क्यूँ भला•• सरकार को इन घटनाओं के प्रति तय करनी होगी अपनी जवाबदेही। स्त्री शरीर के प्रति संवेदनशीलता का इंतज़ार हजारों प्रियंकाओं के जलने तक नहीं किया जा सकता।
लड़कियों ! तुम अपनी हिफ़ाज़त खुद करो। जूडो कराटे सीखो। कोई घूरे तो आँख में आँख डाल कर आँख निकाल लो। छुए तो चीख पड़ो। चुप मत रहो। घर से निकलों! और ज़्यादा संख्या में पढ़ो। नौकरियां करो।
लगातार प्रेशर से कोई बॉल फटती है या दूगुनी तेजी से पलटकर आती है।
कहो, बस बहोत हुआ!!
यह पलट कर आने का समय है।

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