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सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला- मरहूम निदा फाज़ली


ध्रुप गुप्त

निदा फ़ाज़ली  आधुनिक उर्दू शायरी के कुछ सबसे बड़े चेहरों में एक रहे हैं। वामपंथी प्रतिगतिशील आंदोलन से जुड़े निदा की ग़ज़लें और नज्में संवेदना, प्रेम और मनुष्यता के जीवंत दस्तावेज़ हैं। उनकी शायरी के कुछ चर्चित संकलन हैं – ‘लफ़्ज़ों के फूल’, ‘मोर नाच’, ‘आंख और ख़्वाब के दरमियां’, ‘खोया हुआ सा कुछ’, ‘आंखों भर आकाश’ और ‘सफ़र में धूप तो होगी’। बड़े मुशायरों के वे बेहद लोकप्रिय चेहरा थे।

कई दूसरे शायरों की तरह उन्होंने फिल्मों में भी कुछ लिखे,लेकिन अपने अक्खड़ स्वभाव की वजह से उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिल सकी। फिल्मकार कमाल अमरोही के लिए सबसे पहले उन्होंने फिल्म ‘रज़िया सुल्तान’ के दो गीत लिखे – तेरा हिज्र मेरा नसीब है और आई जंजीर की झंकार खुदा खैर करे। उनके कुछ दूसरे लोकप्रिय गीत हैं – होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है (सरफ़रोश), कभी किसी को मुक़म्मल ज़हां नहीं मिलता (आहिस्ता-आहिस्ता), तू इस तरह से मेरी ज़िंदग़ी में शामिल है (आप तो ऐसे न थे), चुप तुम रहो, चुप हम रहे’ (इस रात की सुबह नहीं), कभी शाम ढले तो मेरे दिल में आ जाना, आ भी जा ओ सुबह आ भी जा (सुर), ज़िंदगी है कि बदलता मौसम (एक नया रास्ता), तुमसे मिलके ज़िंदगी को यूं लगा (चोर पुलिस) और अज़नबी कौन हो तुम (स्वीकार किया मैंने)। पिछले साल लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।

निदा फ़ाज़ली के यौमे पैदाईश (12 अक्टूबर) पर खिराज़-ए-अक़ीदत उनकी एक ग़ज़ल के साथ ! अब खुशी है न कोई ग़म रुलाने वाला हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला हर बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा जिस तरफ़ देखिए आने को है आने वाला उसको रुखसत तो किया था मुझे मालूम न था सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला दूर के चांद को ढूंढ़ो न किसी आंचल में ये उजाला नहीं आंगन में समाने वाला इक मुसाफ़िर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया कोई जल्दी में कोई देर में जाने वाला

(लेखक सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हैं)