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एनआईए, आईबी, एटीएस, आतंक का ड्रामा और सुरक्षा-खुफिया एजेंसियों का जाल – राजीव यादव

मुगलसराय का नाम दीन दयाल के नाम पर रखा जाना और देवबंद जिसका नाम बदलकर देवबृंद करने की मांग भाजपा विधायक ने की थी वहां और उसके आस-पास के जिले मुज़फ्फरनगर, शामली से गिरफ्तारियां और सहारनपुर जो पिछले दिनों दलित हिंसा के लिए चर्चा में रहा वहाँ यूपी एटीएस की छापेमारी की खबरें सिर्फ कोई संयोग नहीं है.

पिछले कई दिनों से जिस तरह संदिग्ध कश्मीरी आतंकियों के घुसने की खबर मीडिया माध्यमों के जरिए आतंक फैला रही थी और खुफिया इनपुट का हवाला दिया जा रहा था उससे साफ था कि स्वतंत्रता दिवस की तैयारी की कहानी पूरी हो गई अब सिर्फ गिरफ्तारियां बाकी हैं.

यही सोचकर 5 तारीख को 5 बजे के करीब एक सूचना पोस्ट की…

खुफिया इनपुट-पुलिस अलर्ट, किसी कश्मीरी बेगुनाह को आजादी की वर्षगांठ के नाम पर झूठे केस में जेल में सड़ाने की कहानी पूरी, बस गिरफ्तारी बाकी..

और देर रात यानी जो गिरफ्तारियां बताई जा रही हैं जैसे मुज़फ्फरनगर के एक मस्जिद के इमाम को सुबह फजर की नमाज के समय 5 बजे के आस-पास पकड़ा जाना बताया जा रहा है उससे कुछ घंटे पहले 3 बजे रात में जब नींद नहीं आ रही थी तो ये सूचना पोस्ट की…

हर स्वतंत्रता दिवस की भांति इस बार भी खुफिया अफवाहों का बाजार गर्म…

अंतर बस ये की इस बार सहारनपुर???

क्योंकि आतंकियों के बहाने दलित आंदोलन के सवालों को दबाना…

क्योंकि उन्हें ये भरोसा है कि उनके झूठे राष्टवाद के बहकावे में वे आ जाएंगे…

उन्हें भरोसा है की कश्मीरी कहने या आतंकी कहने पर वे एक खास समुदाय से नफरत करने लगेंगे…

उनके इस भरोसे को धक्कामरकर, आपस में भरोसा कायम कर ही मुल्क को बचाया जा सकता है…

जो खुफिया कश्मीरी संदिग्धों की तलाश का माहौल बना रही है उसे पिछले दिनों 17 साल बाद रिहा हुए गुलज़ार वानी पर बताना चाहिए कि कैसे ऐसे ही उसे उसने फसा कर जीवन तबाह कर दिया…

उसे जरूर गुलजार को बरी करने के उस आदेश पर बोलना चाहिए जिसमें कहा गया है कि उसे फसाने वाले दोषियों से वसूलकर उसे मुआवजा दिया जाए…

और फिर सुबह से शाम और रात तक सर्च कर देख रहे हैं कि कहाँ-कहाँ से
उठे.

कुछ साथी इसे कांस्पिरेसी थ्योरी कहकर नकार देंगे पर ये सिर्फ एक बार का नहीं हर बार की कहानी है.

ऐसे ही नहीं 8 मार्च को चुनाव के एक दिन पहले 7 मार्च को लखनऊ में सैफुल्लाह नाम के युवक को मारकर मीडिया के जरिए दिन के 3 बजे से रात के 3 बजे तक न जाने कितनी बार मारने का दावा कर-करके बहुसंख्यक अवाम को समुदाय विशेष के प्रति दहशतजदा किया गया. पहले कहा तीन से मुठभेड़ फिर अंत में एक शव निकाला. व्हाट्सएप के जरिए आईएस के झंडे की बिछाकर कुछ तमंचे रख दीए गए और फ़ोटो को वायरल कर दिया गया. और शाम को पुलिस अधिकारी दलजीत चौधरी ने कहा कि मारे गए, पकड़े गए लोगों का आईएस से कोई संबंध नहीं. तो वहीं इस फर्जी मुठभेड़ के नायक एटीएस के असीम अरुण से जब मीडिया ने पूछा कि उनके पास घातक हथियार नहीं था तो इतना बड़ा ऑपरेशन क्यों तो इस पर उन्होंने चूक कहा.

दरअसल ये चूक नहीं थी बल्कि ऐसा करके एक माहौल तैयार करना जिससे टीवी वाले फर्जी सुरक्षा विशेषज्ञों को बैठकर झूठे आईएस के आतंकियों के नाम पर नफरत की आग लगा सकें.

अब इसे सिर्फ संयोग कहकर न टालिएगा. देश और दुनिया की सीक्रेट ऐजेंशियाँ इसमें लिप्त हैं तभी कोई कोई गुजरात का दंगाई रातों रात देश का नेता बन जाता है.

यह सिर्फ संयोग नहीं कि 9/11 के बाद 27 सितम्बर 2001 को सिमी पर प्रतिबंध लगाया जाता है.

और ये भी कोई संयोग नहीं कि 6 महीने बाद जिस ट्रिब्यूनल की तारीख 27 मार्च 2002 को थी उसके ठीक पहले 27 फरवरी को गोधरा कांड हुआ. जिसमें सिमी का हाथ बताते हुए सिमी के पूर्व मैनेजर अनवर रशीद और बिहार जोन के अध्यक्ष हसीब रजा को गिरफ्तार किया गया. ये पहला मामला था जब किसी घटना के बाद सीधे तौर पर सिमी को जिम्मेदार ठहराया गया. बड़ा अजीब था कि इस वक़्त भारत में सिमी एक मात्र संगठन है जो अपने प्रतिबंध का मुकदमा इतने सालों से लड़ रहा है. क्या कोई ऐसा करेगा कि केस भी लड़े और ऐन वक्त पर ऐसी हरकत करे जिससे केस बिगड़ जाए.

सिमी से होता हुआ भारत में टेरर पॉलिटिक्स का ये दौर आईएस तक आ पहुँचा है.

रक्षाबंधन है आप सभी को ढेरो शुभकामनाएं।

आप आज समाचार माध्यमों पर जरूर गौर करिएगा. इसमें आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तारियों की खबर क्या आपमें अपने उस दूसरे समुदाय के भाई के प्रति नफरत तो नहीं भरने का काम कर रही है.

आखिर जो एटीएस-खुफिया इतने दिन से संदिग्ध आतंकियों का माहौल बना रहे थे उनको ऐसे ही दिन क्यों मिलते हैं. उनको कोई देवबंद जो अपने तालिमी इदारों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है वो या फिर अलीगढ़-जामिया ही उनके निशाने पर क्यों होते है.

सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि अगर ये सही ऑपरेशन में पकड़ते तो थोड़े मीडिया में रोज खबरें छपवाते की संधिग्ध आतंकियों की तलाश में एटीएस.