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महाराष्ट्र में पकड़ गए सत्ता लूटने वाले

हिसाम सिद्दीकी
महाराष्ट्र की सत्ता लुटने से बच गई क्योंकि वहां शरद पवार जैसा सीनियर और आज की सियासत का अस्ल मायनों में चाणक्य मौजूद था, जो आज के दौर के खुदसाख्ता ‘चाणक्य’ अमित शाह पर भारी पड़ गया। अगर शरद पवार ने अपनी सियासी सलाहियतों का इस्तेमाल न किया होता तो कर्नाटक, गोवा और मणिपुर की तरह महाराष्ट्र की सत्ता भी लुट जाती।

वैसे महाराष्ट्र की सत्ता लूटने की नाकाम कोशिशों में वजीर-ए-आजम के ओहदे व दफ्तर यानी पीएमओ, राष्ट्रपति भवन और महाराष्ट्र के राजभवन तीनों का जमकर बेजा इस्तेमाल भी किया गया। इन तमाम गुनाहों के बावजूद वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी अपने सबसे करीबी देवेन्द्र फडणवीस को मुसलसल दूसरी बार महाराष्ट्र का वजीर-ए-आला बनाने में कामयाब नहीं हो पाए। शिवसेना की जिद भी पूरी हो गई और ठाकरे कुन्बे के उद्धव ठाकरे का पहला वजीर-ए-आला बनने का रास्ता भी साफ हो गया। महाराष्ट्र में हुए इस सियासी उथल-पुथल से जो सियासी माहौल पैदा हुआ है उससे भारतीय जनता पार्टी, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह सभी के जवाल (पतन)  का दौर भी शुरू होता नजर आने लगा है।

अगर झारखण्ड में भी बीजेपी सरकार की वापसी नहीं हुई तो मोदी और अमित शाह वगैरह की सियासत को ग्रहण लगना तय है। उद्धव ठाकरे को शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार के वजीर-ए-आला की हैसियत से गवर्नर ने उन्हें एक नायब वजीर-ए-आला और वजीरों के साथ 28 नवम्बर को उसी शिवाजी पार्क में अपने वालिद बाल ठाकरे की यादगार के सामने हलफ दिलाया जिस शिवाजी पार्क के बाल ठाकरे ने तकरीरें करके महाराष्ट्र में शिवसेना को इस बुलंदी तक पहुचाने का काम किया था।

इस तरह देश के कई प्रदेशों में सत्ता पर जबरदस्ती कब्जा करने वाले बल्कि सत्ता लूटने वालों की टीम एक मराठा दारोगा शरद पवार के हाथों पकड गई। पच्चीस नवम्बर की दोपहर तक इंतेहाई घमण्डी लहजे में अपनी मजबूत सरकार बनाने का दावा करने वाले मरकजी वजीर कानून रविशंकर प्रसाद, राज्य सभा मेम्बर जीवीएल नरसिम्हा व तर्जुमान संबित पात्रा और वजीर-ए-आला तो मैं ही बनूंगा जैसा दावा करने वाले देवेन्द्र फडणवीस  सभी की बोलती बंद हो गई।

महाराष्ट्र के अटठारहवे और ठाकरे परिवार के पहले शख्स के तौर पर उद्धव ठाकरे ने 28 नवम्बर को शिवाजी पार्क में वजीर-ए-आला के ओहदे का हलफ लिया। उनके साथ सरकार में शामिल तीनों पार्टियों के दो-दो काबीना वजीर बनाए गए। इनमे शिवसेना के कोटे से एकनाथ शिदें और उद्धव के बेहद करीबी और उनके एडवाइजर बताए जाने वाले सुभाष देसाई ने कैबिनेट वजीर का हलफ लिया। नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के जयंत पाटिल और छगन भुजबल ने काबीना का हलफ लिया। छगन भुजबल माली समाज के लीडर है और ऐसे पहले लीडर है जिन्होने शिवसेना के खिलाफ बगावत की थी।

कांग्रेस की तरफ से महाराष्ट्र कांग्रेस के सदर बाला साहब थोराट और शेडयूल्ड कास्ट लीडर नितिन राउत ने कैबिनेट वजीर का हलफ लिया। पहले खबर थी कि शायद पृथ्वीराज चहवाण काबीना वजीर का हलफ लेंगे लेकिन उनकी जगह नितिन राउत सामने आए। सियासी माहिरीन का कहना है कि चूंकि कांग्रेस को स्पीकर का ओहदा मिला है तो बहुत मुमकिन है कि पृथ्वीराज चहवाण असम्बली के स्पीकर बने।

एनसीपी को डिप्टी चीफ मिनिस्टर का ओहदा मिला है जिसके लिए अजित पवार का नाम चल रहा है। खबर लिखे जाने तक पृथ्वीराज चहवाण ने स्पीकर और अजित पवार ने डिप्टी चीफ मिनिस्टर का हलफ नहीं लिया था। खबरों के मुताबिक उद्धव ठाकरे की वजारत में 43 वजीर होगे जिसमें सबसे ज्यादा वजीर गठजोड की सबसे बडी पार्टी एनसीपी के 16 वजीर होगे पन्द्रह शिवसेना के और बारह वजीर कांग्रेस के होगे।

उद्धव ठाकरे की हलफ बरदारी की तकरीर में शामिल होने के लिए कांग्रेस सदर सोनिया गांद्दी और राहुल गांद्दी के अलावा वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी को भी न्योता दिया गया था। लेकिन कोई नहीं आया। नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट करके उद्धव ठाकरे को मुबारकबाद दी तो सोनिया और राहुल गांद्दी ने खत भेज कर उद्धव ठाकरे को वजीर-ए-आला बनने की मुबारकबाद देते हुए कहा कि उन्हें पूरी उम्मीद है कि उद्धव ठाकरे कामन मिनिमम प्रोग्राम के तहत किसान, रोजगार, और विकास पर काम करेगे। कांग्रेस की तरफ से मध्य प्रदेश के चीफ मिनिस्टर कमलनाथ, अहमद पटेल, पृथ्वीराज चहवाण, कपिल सिब्बल और मल्लिकार्जुन खडगे वगैरह मौजूद थे तो एनसीपी लीडर शरद पवार, उनकी बेटी सुप्रिया सुले, अजित पवार वगैरह थे।

डीएमके की तरफ से के स्टालिन और टी आर बालू भी हलफबरदारी की तकरीब में शरीक हुए। इनके अलावा बीजेपी लीडर और साबिक चीफ मिनिस्टर देवेन्द्र फडणवीस  के साथ थैलीशाह मुकेश अंबानी अपनी बीवी नीता अंबानी और अनंत के साथ मौजूद थे। उद्धव के भाई राज ठाकरे भी हलफ बरदादारी की तकरीब में मौजूद थे जिसके बाद लगा दोनों भाइयो के बीच में बर्फ पिघलने लगी है। राज ठाकरे स्टेज पर मनोहर जोशी के साथ बैठे थे। संजय राउत भी स्टेज पर थे। उद्धव ठाकरे की बीवी रश्मि अपने बेटे आदित्य ठाकरे के साथ स्टेज पर मौजूद थी।

मुल्क के दूसरे सबसे बड़े प्रदेश महाराष्ट्र में बिल्कुल नए किस्म की सरकार बनी है। नए वजीर-ए-आला उद्धव ठाकरे की शिवसेना हमेशा से ही हिन्दुत्व के रास्ते पर चली है अब सेक्युलरिज्म और सबको साथ लेकर चलने वाले नजरियात (विचारद्दारा) वाली कांग्रेस और उसी नजरियात की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के साथ मिल कर सरकार बनाई है। मीडिया ने यह सवाल खड़ा किया तो जवाब आया कि सरकार हिन्दुत्व नहीं काश्तकारों नौजवानों और सबको साथ लेकर चलने के उसूल पर चलेगी। इसमें हिन्दुत्व पर कायम रहने और छोड़ने का सवाल कहां से आ गया। कांग्रेस तर्जुमान (प्रवक्ता) पीएल पुनिया ने साफ कह दिया कि हम हिन्दुत्व के खिलाफ कब थे हम तो सबको साथ लेकर चलने वाले हिन्दू हैं और असल हिन्दुत्व वही है जिसमें सभी के एक साथ रहने की जगह हो।

हम सनातनी गांद्दी के हिन्दुत्व पर चलने वाले लोग हैं हम सावरकर गोडसे और नागपुर के हिन्दुत्व पर चलने वाले नहीं हैं। पुनिया यह कहना भूल गए कि शिवसेना के बानी (संस्थापक) बाला साहेब ठाकरे ने 1966 में जब इसी शिवाजी पार्क में दशहरे के दिन एक भीड के सामने खडे होकर दक्खिन भारतीयों (मद्रासियों) के खिलाफ शिवसेना बनाने का एलान किया था और उठाओ लुंगी बजाओ पुंगी, भगाओ मद्रासी का नारा दिया था। उस वक्त से शिवसेना के मजबूत होने तक कांग्रेस ने ही बाल ठाकरे की हर तरह से मदद की थी।

कोई बीस साल तक शिवसेना की मदद करने वाली कांग्रेस ने तब अपना हाथ खींचा, जब बाल ठाकरे ने मद्रासियों के बाद मुसलमानों को अपने निशाने पर लेना शुरू कर दिया। बाल ठाकरे ने भी कांग्रेस की मेहरबानियों का जवाब 1975 में इंदिरा गांद्दी की इमरजेसी की हिमायत करके दिया था। 25 जून 1975 को इंदिरा गांद्दी ने मुल्क में इमरजेसी लगाई तो मुंबई से बाहर न निकलने वाले बाल ठाकरे ने दिल्ली जाकर इंदिरा गांद्दी से मुलाकात करके उनके इस फैसले की हिमायत करने का एलान किया था।

महाराष्ट्र की सत्ता भी हाथ से निकल जाने के गैर मुतवक्के (अप्रत्याश्ति) वाक्ए ने भारतीय जनता पार्टी को बुरी तरह हिला दिया है। जोड़तोड़ बेशुमार दौलत और मरकजी सत्ता पर काबिज होने के बाद सीबीआई, इनकमटैक्स व ईडी जैसे सरकारी मोहकमों का बेजा इस्तेमाल करके भारतीय जनता पार्टी ने एक वक्त में मुल्क की इक्कीस (21) रियासतों पर सीद्दे-सीद्दे या इलाकाई पार्टियों के साथ मिल कर कब्जा कर लिया था तो मुल्क के मोदी गुलाम मीडिया ने मोदी को अकेले फातेह (विजेता) और अमित शाह को आज के दौर का ‘चाणक्य’ बता कर ऐसा माहौल बना दिया था जैसे अब कयामत तक मोदी और अमित शाह की जोड़ी ही मुल्क पर कब्जा जमाए रखेगी। मुल्क का सत्तर फीसद से ज्यादा हिस्सा बीजेपी की कयादत वाले एनडीए के कब्जे में आ गया था। यह सूरतेहाल दिसम्बर 2017 तक बरकरार रही थी। महज पौने दो सालों की मुद्दत में बीजेपी सिमट कर देश के चालीस फीसद हिस्से तक पहुँच चुकी है। अब न मोदी का करिश्मा काम कर पा रहा है और न अमित शाह की जोड़ तोड वाली चाणक्यगीरी।

मोदी ने 2014 में बीजेपी पर पूरी तरह कब्जा किया था उस वक्त बीजेपी कयादत वाले एनडीए में अटठाइस (28) पार्टियों हुआ करती थीं, अब अटठारह (18) बची हैं। उनमें भी राम विलास पासवान की लोकजन शक्ति पार्टी समेत तीन इलाकाई पार्टियां झारखण्ड असम्बली एलक्शन के दौरान ही बीजेपी से अलग होकर एलक्शन लड़ रही है। झारखण्ड में बीजेपी की शिकस्त की पूरी उम्मीद है। इसके बाद बिहार का एलक्शन आने वाला है। वहां भी बीजेपी के हालात कुछ अच्छे नहीं हैं।

शिवसेना के उद्धव ठाकरे को एनसीपी और कांग्रेस की मिली जुली सरकार के वजीर-ए-आला की हैसियत से मुंतखब ही किया गया था उनकी हलफ बरदारी भी नहीं हुई थी उससे पहले ही पार्टी के राज्य सभा मेम्बर संजय राउत ने एलान कर दिया कि हमारी मंजिल दिल्ली है।

संजय राउत ने कहा कि जब हमने कहा था कि हमारा ‘सूर्ययान’ (उद्धव ठाकरे) महाराष्ट्र सरकार के सदर दफ्तर मत्रालय की छठी मंजिल पर सेफ तरीके से लैण्ड करेगा तो सभी ने खुसूसन आप लोगों (मीडिया) ने मेरा मजाक उड़ाया था। अब हमारा सूर्ययान मंत्रालय की छठी मंजिल (चीफ मिनिस्टर दफ्तर) पर सेफ्टी के साथ लैण्ड कर चुका है। अब हम दूसरा एलान कर रहे हैं कि हमारे सूर्ययान की अगली लैडिंग दिल्ली में होगी।

महाराष्ट्र मे जो सियासी उथलपुथल हुई उसमें नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, सदर जम्हूरिया (राष्ट्रपति भवन) और राजभवन महाराष्ट्र की इज्जत पर तो चोट लगी ही है इनमें सबसे ज्यादा जिल्लत और तौहीन मुल्क के मीडिया खुसूसन उन टीवी चैनलों की हुई है जो किसी भी तरह और किसी भी कीमत पर वहां बीजेपी की सरकार बनवाने पर तुले हुए थे। अब गैर बीजेपी सरकार बन गई तो चैनलों के एंकर और एंकरनियांं ने बडी बेशर्मी के साथ यह प्रोपगण्डा शुरू कर दिया है कि तीन पार्टियों पर चलने वाली महाराष्ट्र सरकार की यह गाडी ज्यादा दिनों तक चल नहीं पाएगी।

‘अभी देवद्दन’ ‘रंजना नाम मोदी’ और ‘मजाहिया रूपया सियासत’ जैसों की तो शक्लें आजकल देखने लायक है। इन सभी की शक्ले बता रही हैं कि महाराष्ट्र में मोदी और अमित शाह की हुई तौहीन और नाकामी से यह लोग कितना दुःखी हैं। शर्मसार होने का तो इनके यहां खाना ही नहीं है। एक एंकर है ‘और अब गोदानी’ उसका बस चले तो वह एक मिनट में खुद ही मुंबई जाकर उद्धव ठाकरे को चीफ मिनिस्टर की कुर्सी से हटा कर बीजेपी के किसी पुतले को बिठा दे।

कहने को तो महाराष्ट्र असम्बली में एक सौ पांच मेम्बरान वाली भारतीय जनता पार्टी एक मजबूत अपोजीशन की तरह उद्धव ठाकरे की मखलूत सरकार के रास्ते में बडी रूकावट बनेगी लेकिन सरकार बनने से पहले ही बीजेपी का अंदरूनी टकराव भी खुल कर सामने आने लगा है। पार्टी के सीनियर लीडर एकनाथ खडसे ने सवाल उठा दिया कि भारतीय जनता पार्टी ने अजित पवार पर भरोसा करके तेइस नवम्बर को फडणवीस को वजीर-ए-आला की हैसियत से हलफ क्यों दिलाया इस फैसले पर पूरी पार्टी की राय क्यों नहीं ली गई?

नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के तर्जुमान और सीनियर लीडर नवाब मलिक ने कहा है कि बीजेपी के जो एक सौ पांच मेम्बर जीत कर असम्बली पहुचे हैं उनमें अक्सरियत उन लोगों की है जो एलक्शन से पहले ही एनसीपी और कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में शामिल हुए थे जिस दिन हमारे लीडर शरद पवार ने तय कर लिया वह सभी बीजेपी छोड कर हमारी तरफ ही खडे दिखाई पडेगे और बीजेपी खाली हो जाएगी। उन्होने कहा कि अब महाराष्ट्र से ही बीजेपी के खत्म होने की शुरूआत हो गई है।

 

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