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पीएम मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘मन की बात’ में उर्दू को तीन साल बाद भी जगह नहीं

सलीम बेग

उर्दू भाषा को हर जगह संघर्ष की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। नीट परीक्षा में तो वह कानूनी लड़ाई जीत गई लेकिन बहुत सी जगहों पर उसका दायरा सिकुड़ता जा रहा है।

ऐसी ही एक जगह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम ‘मन की बात’ । आज तीन साल बाद भी ‘मन की बात’ कार्यक्रम में उर्दू ज़ुबान को जगह नहीं मिल सकी है। जबकि देश की दूसरी कई क्षेत्रिय भाषाओं में यह कार्यक्रम है। इसपर आपत्ति जताते हुए आरटीआई कार्यकर्ता सलीम बेग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है।

गौरतलब  है कि ‘मन की बात’ कार्यक्रम हिंदी-अंग्रेज़ी के अलावा 19 भाषाओं में है। मोबाइल पर 1922 दबाकर किसी भी भाषा में सुना जा सकता है। सलीम बेग का कहना है कि उर्दू कोई मुसलमानों की भाषा नहीं है बल्कि एक लश्करी भाषा है। उर्दू इस प्रकार हमारी भाषा में रची-बसी हुई है कि इसके कई लफ्ज़ आरएसएस वालों के घर के अंदर भी बोले जाते हैं। यह आज़ाद हिंदुस्तान की भाषा है। उस भाषा को मारने की कोशिश की जा रही है।

सलीम बेग का वह पत्र जो उन्होंने पीएमओ को लिखा हैः

निवेदन है कि मैं भारतगण राज्य का एक आम नागरिक हूं। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद का निवासी हूं। बीते दो वर्षों  से  लगातार आपका ड्रीम प्रोजेक्ट  मन की  बातउर्दू भाषा में सुनने की   उम्मीद लगाए  हुए हूं।लेकिन मेरा यह सपना आजतक पूरा नहीं हुआ। भले ही मोदी सरकार को तीन साल पूरे हो चुके हों । जबकि  मन की बात ‘  हिंदी, अंग्रेज़ी भाषा के अलावा  देश की विभिन्न 19 भाषाओं में है लेकिन हैरानी की बात यह है कि देश में दूसरे नंबर पर  बोली और समझी जाने वाली भाषा उर्दू में  प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बत करना गवारा नहीं समझा । जबकि उर्दू भाषा देश के कई राज्यों की दूसरी सरकारी भाषा भी है।

 मन की बात ‘  में उर्दू  भाषा को पीएमओ द्वारा नज़र अंदाज़ करना प्रथम दृष्टया नफरत ज़ाहिर करता है। इस कृत्य का विरोध और निंदा कड़े शब्दों में होनी चाहिए क्यूंकि पीएमओ के इस कदम से करोड़ो उर्दू भाषियों को मायूसी हुई है। आपने उर्दू भाषियों को अपने ड्रीम प्रोजेक्ट से महरूम किया है । कम से कम पीएम को तो देश के सभी नागरिकों का सामान रूप ध्यान रखना चाहिए। 

 एक तरफ हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  “सब का साथ सब का विकास”  का नारा देते नहीं थकते,वहीं उनकी  सरकार  उन्हीं के कार्यालय से संचालित होने वाले कार्यक्रम में  देश की जानी पहचानी  और आम चलन में रहने वाली ज़ुबान  उर्दू भाषा को उक्त प्रोग्राम में स्थान न देकर उर्दू के साथ खुला भेदभाव  कर रही है। निसंदेह: पीएमओ का यह  कृत्य अपने कामकाज पर प्रश्न चिन्ह लगाता है ?  पीएमओ  द्वारा जानबूझकर उर्दू भाषियों, उर्दू प्रेमियों  को  इस प्रकार अपमानित करने जैसा ही है। जबकि सच्चाई यह है कि उर्दू किसी मज़हब की भाषा नहीं है। यह बहुत से लोगों की, तहज़ीब की भाषा है और हमारे पीएम पूरे देश को संबोधित करते हैं। 

जबकि देश में विभिन भाषाओं को विकसित करने एवं उनके कल्चर को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग विभाग संचालित हैं  इसके बावजूद  ” मन की बात”  जैसे महत्वपूर्ण प्रोग्राम से उर्दू का आउट होना दुर्भाग्यपूर्ण है। जो दमनकारी नीति को दर्शाता है और हमें सवाल पूछने को मजबूर करता है। हम कहना चाहते हैं कि भारत का इतिहास ऐसे भेदभाव को कभी माफ़ नहीं करेगा।