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पार्ट-3-जंग-ए-आज़ादी में मुसलमानः “सैदू” और सिखों की फौज मैदान में आमने-सामने थीं…

इमरान

पिछले भाग में लिखा था कि किस तरह से “हज़रत सयैद अहमद” को सिखों से युद्ध करना पड़ा जिनके राजा “रणजीत सिंह” थे जबकि लड़ाई का असल मकसद तो अंग्रेज़ थे लेकिन रणजीत सिंह के न मानने पर पहली जंग 21 दिसंबर 1826 में हुई.

पहले मुक़ाबले में सयैद साहब को कामयाबी हासिल हुई और उन्होंने अपने मातहत इलाकों में 10 जनवरी 1827ई को अपनी अस्थाई इस्लामी सरकार क़ायम कर दी और कस्बों में अपने गवर्नर और प्रचारक नियुक्त कर दिए और साथ ही दूर दराज़ इलाको में अपने मरकज़ बनाय ताकि जिहाद के लिए सामान और रसद मुहैया रहे और नए लोगो की भर्ती का काम भी चलता रहे. सयैद साहब के गवर्नर ने हर जगह इस्लामी नियम लागू किया. महसूल (टेक्स) का निज़ाम बनाया गया और गैर इस्लामी रस्मों को अपने इलाके से सफाया कर दिया, यानी हिंदुस्तान का एक हिस्सा अब आज़ाद था. इस तरह के नियमों से अवाम खुश थी लेकिन ज़ालिम और मतलबी मालदारों का जीना हराम हो गया था और वह बराबर सयैद साहब के आंदोलन को नुक्सान पहुँचाना चाहते थे.

आप दिल्ली सेंटर से बराबर संपर्क में रहे जहाँ के ज़िम्मेदार “हज़रत मौलाना मोहम्मद इसहाक” इस आंदोलन के लिए माली और फौजी इमदाद की तैयारी कर रहे थे. इसके अलावा आपने “मौलाना मोहम्मद अली रामपुरी” को मद्रास, “मौलाना विलायत अली साहब” को हैदराबाद, “मौलाना इनायत अली साहब” को बंगाल, “मौलाना मोहम्मद क़ासिम पानीपती” को मुंबई, “मौलाना सयैद औलाद हसन साहब कन्नौजी” को यूपी के अलग अलग इलाक़ो में प्रचार और संगठन के उद्देश्यों के लिए रवाना किया. इन इलाक़ो से माली मदद के साथ-साथ नए लोगो की भर्तियां भी होती थीं.

अस्थाई इस्लामिक हुकूमत बन जाने के कुछ दिनों के बाद “सैदू” के मैदान में सिख सेना से मुकाबला हुआ, उसी रात को पेशावर के हाकिम “यार मोहम्मद खान” ने “सयैद साहब” के खाने में ज़हर मिलाकर भिजवाया, जिसे खाकर सयैद साहब की हालत खराब हो गई मगर आप उस ही हालात में हाथी पर सवार होकर मैदान में पहुंचे, उस वक़्त सयैद साहब की सेना में लगभग 1 लाख आदमी थे जंग की शुरुआत में सयैद साहब का पल्ला भारी था मगर पेशवार के सरदार अपनी फौजें लेकर मैदान से फरार हो गए और ये कामयाबी नाकामी में बदल गयी, लोगो ने किसी तरह अपनी जान बचाकर एक गाँव में पनाह ली और करीब एक हफ्ते में सयैद साहब को शिफा नसीब हुई.

जारी है….

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