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पार्ट-1- जंग-ए-आज़ादी में मुसलमानः फिर आखिर में केवल एक ऐसा सुल्तान बचा जिसका नाम था ‘टीपू सुल्तान’


इमरान

शुरूआती दौर में अंग्रेज़ो ने 101 व्यापारियों के साथ 30 हज़ार पौंड की पूंजी जमा करके “ईस्ट इंडिया कंपनी” नाम से कंपनी बनाई और 1601 में उसके जहाज़ पहली बार हिंदुस्तान रवाना हुए।

अंग्रेज़ो ने अपना केंद्र बंगाल को बनाया और मुग़ल दरबार में ख़ुद को व्यापारी बताकर व्यापार करने की अनुमति ले ली। सुल्तान औरंगज़ेब की वफात (1707 ई) तक मुग़ल शासन मज़बूत होने पर अंग्रेज़ो को ज्यादा सफलता नही मिली लेकिन उसके बाद पहला हादसा प्लासी के मैदान में 1757 ईo में नज़र आया। बंगाल के सिराजुद्दौला की फौज कंपनी की ट्रेंड फ़ौज़ के सामने हार गई और बंगाल में अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया।

आखिर में सिर्फ एक ऐसा सुलतान रह गया था जिसका नाम था “टीपू सुल्तान”, 1799 में वह भी शहीद हो गए। उनका एक कथन आज भी इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है “गीदड़ की सौ साल की ज़िन्दगी से शेर की एक दिन की ज़िन्दगी अच्छी है”।

आखिर में 1803 में दिल्ली के सुल्तान “शाह आलम” से अंग्रेज़ो ने ज़बरदस्ती एग्रीमेंट लिखवा लिया और उसके बाद गुलाम हिंदुस्तान में ज़ुल्म की हवाएं आम हो गयीं।

उस ही दिल्ली में बैठकर “हुज्जतुल इस्लाम हज़रत शाह वलीउल्लाह” के साहबज़ादे “अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी रह0” एक आज़ाद हिंदुस्तान का सपना देख रहे थे अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ पहला फतवा हज़रत शाह ने ही दिया। ये ही फतवा हिंदुस्तान की आज़ादी की बुनियाद है और हिंदुस्तानी आवाम का दर्द देखते हुए अंग्रेज़ो से टक्कर लेने का फैसला ले लिया।

जारी है…

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