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पंडित नेहरू और कश्मीर – 2

राजेंद्र गोदारा
आईये पहले थोड़ा सा स्वतंत्रता पहले का कुछ जान लें जब देश में अंग्रेजों भारत छोड़ो अभियान चल रहा था तब कश्मीर में शेख अब्दुल्ला कश्मीर में महाराजा हरिसिंह कश्मीर कश्मीर छोड़ो अभियान चला रखा था और कश्मीर में ये मुहिम बहुत जोर पकङ रहा था कश्मीर का आवाम शेख के साथ था

महाराजा हरिसिंह ने 1925 के आसपास राजगद्दी संभाली थी 1927 में वो वो विवादास्पद विदेशी नागरिक कानून लाये जो कश्मीर समस्या की जङ बन गया और आज जिसे हम धारा 370 व 35 ए के रूप में जानते है वैसे महाराज का मन्सूबा पूरी तरह गलत भी नहीं था कश्मीर की भूमि सदैव विदेशियों का आकर्षण का केन्द्र बनी रही हर विदेशी हर अमीर भारतीय कश्मीर में रहना चाहते थे रहना नहीं तो स्वर्ग को मात देने वाली सुंदरता वाली जगह पर कुछ भूमि अपने नाम करना जरुर चाहते थे जहां कभी भी वो आकर धरती के सौन्दर्य के बीच रह सके।

इन सबसे बचने के लिए ही हरिसिंह वो कानून लेकर आये थे जिस पर तत्कालीन अंग्रेज़ी सरकार ने भी अपनी मोहर लगाई थी उसी समय से कश्मीर में जाने के लिए भारतीयों के लिए भी परमिट लेना जरूरी हो गया था।

उस परमिट कानून की भी सबसे पहले खिलाफत पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की थी आज जो लोग कहते है कश्मीर में परमिट लेकर जाने के नियमों को सबसे पहले हिंदू महासभा या जनसंघ के नेता डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तोड़ा था वो बहुत बङी गलतफहमी में है पंडित नेहरू ने तो उस परमिट वाले कानून को आजादी से पहले ही तोड़ दिया था जब नेहरू जबरन कश्मीर में दाखिल हुए तो महाराजा हरिसिंह ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया तब अंग्रेज़ी सरकार ने उन्हें कहा था उस ने किस बला को गिरफ्तार किया है ये महाराज को अहसास ही नहीं है जेल नेहरू का घर है जहां उन्होंने दस साल से ज्यादा का वक्त बिताया है नेहरु को छोड़ दो नहीं तो पहले ही जल रहा कश्मीर और सुलगेगा महाराज ने कहा था मुझे शक है वो शेख अब्दुल्ला की मदद के लिए आया है जवाब मिला ना तो शेख को किसी मदद की जरूरत है क्यों की कश्मीर की जनता उस के साथ है ना नेहरू के पास इस काम के लिए समय है तब महाराज को पंडित नेहरू को छोड़ना पङा।

परमिट के बिना कश्मीर में प्रवेश करने वाले प्रथम नागरिक नेहरू थे ना की श्यामा प्रसाद मुखर्जी आजादी के बाद कश्मीर का विलय भारत में जिन शर्तो पर हुआ उन में परमिट वाली शर्त भी शामिल थी जिसके बारे में पंडित नेहरू ने संविधान सभा में भी कहा था की महाराज हरिसिंह व शेख अब्दुल्ला दोनों की समान राय के कारण हम इसे शामिल कर रहे है पर इस प्रकार की शर्ते चलने वाली नहीं है जल्द ही आजाद भारत को इस अस्थायी बिंदु को हटाना पङेगा।

महाराजा हरिसिंह तो आजादी से पहले ही अपना राज्य अपने पास की जुगत में लगे थे और शेख ने भी आजादी से पहले ही उन्हें हटाने की मुहिम चला रखी थी की अब भारत का कोई राज्य कम से कम किसी राजा के तो अधीन नहीं रह सकता

आजादी के बाद महाराज हरिसिंह व शेख अब्दुल्ला की धारा 370 पर तो समान राय थी दोनों कश्मीर के लिए ज्यादा से ज्यादा स्वतंत्रता चाहते थे जो भारत आजादी से पहले ही उन सब पर सहमति दे चुका था और इन सब में सरदार पटेल पूरी तरह शामिल थे उस थारा की कोई भी उपधारा तक ऐसी नहीं थी जिसमें सरदार की सहमति ना शामिल हो वैसे तो विलय की शर्तो पर पहली रजामंदी ही पटेल की थी नेहरू का तो नंबर ही बाद का था क्योंकि

राज्यों के भारत गणराज्य में विलय की सभी शर्ते पटेल ही तय करते थे ये गृहमंत्री होने के कारण उन्हीं के अधिकार क्षेत्र में आता था और ये सब पहले दिन से ही तय था और कश्मीर कोई इससे अलग नहीं था कश्मीर के लिए नेहरु ने कभी भी अलग से कोई सर्कुलर जारी नहीं किया की बाकी राज्यों के विलय की शर्ते पटेल तय करेंगें और कश्मीर पर निर्णय नेहरू करेंगे और ऐसा भी कभी नहीं था की सभी राज्यों के लिए सामान शर्ते हो सिक्किम और पूर्वी क्षेत्र तो अलग थे ही यहां तक कि राजस्थान के जोधपुर व बीकानेर राज्य की शर्ते अलग प्रकार की थी

आजादी के बाद भारत में शामिल होने वाला इकलौता मुस्लिम बहुल राज्य कश्मीर था और महाराज हरिसिंह को भी ये सब जल्द ही समझ आ गया की कश्मीर के मुस्लिम सिर्फ शेख के कारण भारत के साथ थे

यहां एक और आश्चर्यजनक बात ये थी की जम्मू के मुस्लिम शेख अब्दुल्ला को कभी पसंद नहीं करते थे आजादी से पहले जम्मू में मुस्लिमों की अच्छी तादाद थी पर वे भारत के शेख को ज्यादा तव्वजो देने के कारण पाकिस्तान चले गए जब की कश्मीर का जो हिस्सा भारत के पास है उस के ज्यादातर मुस्लिम शेख अब्दुल्ला व मौलाना आजाद की अपील पर भारत के साथ ही रहे हालांकि आजादी के बाद शेख अब्दुल्ला बेगम अब्दुल्ला ने भी श्रीनगर सीट का प्रतिनिधित्व किया पर ये सब तब हासिल हुआ जब जम्मू की मुस्लिम नवाया ज्यादातर पाकिस्तान चली गई

अब बचे हुए कश्मीर के शेख बेताज नहीं ताज सहित बादशाह थे और कश्मीर की जनता व धारा 370 की शर्ते उन की सहायक थी एक और बात धारा 370 जो पहले 338 के रूप में लिखी गई थी को जब पास किया गया तो नेहरू विदेश में थे पर जब वे लौटे तो उन्होंने उस धारा की शर्तो में एक बदलाव किया और इस बदलाव के बारे में शेख अब्दुल्ला को बता भी दिया शेख ने पास की धारा में उस बदलाव को धोखा बताया पर नेहरू टस से मस नहीं हुए

यहां इस बदलाव का महत्व तब पता चला जब 1953 में शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लंबे समय के लिए जेल में डाल दिया गया तब संविधान सभा में उस बदलाव के साक्षी रहे गोपाल अयंगर ने कहा था की शेख की गिरफ्तारी उसी बदलाव के कारण संभव हुई थी नहीं तो पहले पास हुई धारा में ये गिरफ्तारी नहीं हो सकती थी

फिर से शेख के शासन पर आते है जम्मू कश्मीर की जनता पूरी तरह शेख अब्दुल्ला के साथ थी पर यहां जो पूरी स्वायत्ता का भूत पहले महाराज हरिसिंह पर सवार था अब वो भूत शेख अब्दुल्ला पर चढ गया और वे संचार सेना व विदेश के मामलों को छोड़ कर बाकी सब तरह से कश्मीर पर खुद का शासन देखने के सपने देखने लगे तब सरदार तो रहे थे नहीं तब सारा मामला पंडित नेहरू पर आ गया उन्होंने शेख साहब को समझाना चाहा पर शेख तो आजादी की ऐसी हवा पर सवार थे जिस पाक द्वारा कब्जे गए कश्मीर पर वो अपना शासन वैसे ही चाहते थे जैसे आज भूटान है मॉरीसस है मयांमार है

पर कायदे आजम जिन्ना ने नेहरु को ऐसे ही दूरदर्शी नहीं कहा था उन्होंने शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया और तब उन से अधिकारीयों के माध्यम से बात शुरू की वे क्या बातें थी उन का कुछ पता पंडित नेहरू के निधन के बाद शेख अब्दुल्ला के बयानों से पता चला जब नेहरू का निधन हुआ तब शेख पाकिस्तान की अधिकारिक यात्रा पर थे नेहरू का निधन की बात सुनते ही वे रोने लगे और तत्काल भारत आये
तब शेख अब्दुल्ला ने कहा था

नेहरू की अथाह राष्ट्रभक्ति व देशप्रेम को सब नहीं समझ सकते 1953 में जेल में डालने के बाद जब नेहरू ने अधिकारीगणों के माध्यम से बात शुरू की थी तो एक कॉपी की सूरत में शर्ते लिखी हुई थी शेख जिस शर्त पर सहमत हो जाते उसे टिक कर दिया और बाकी पर अधिकारी कहते अगली बार बात करेंगें जब कुछ ही शर्तें रह गई तो शेख ने अधिकारीयों से कहा इन शर्तो पर हां वे जनता के बीच जाकर करेंगें इस तरह 1958 में शेख को रिहा कर दिया गया पर

बाहर आते ही शेख बदल गए और पूरानी स्वायत्ता का वही राग फिर अलापने लगे तब पंडित नेहरू ने उन्हें फिर जेल में डाल दिया नेहरू के निधन के बाद में वो तब रिहा हुए जब उन्होंने उस कॉपी पर लिखी हर शर्त पर अपनी सहमति दे दी ऐसा नहीं था की सब शर्ते कश्मीर के खिलाफ थी पर नेहरू तो नेहरू थे

शेख अब्दुल्ला ने आगे बताया की रिहा होने केबाद एक बार जब वे नेहरु से मिले तो उन्होंने नेहरू को उलाहना दिया की अपने खास मित्र शेख के साथ वे इस तरह इतनी कङाई से पेस आयेंगे ऐसा उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था तब नेहरू ने हंस कर जवाब दिया की तुम भी कश्मीर के विलय के समय ऐसे ही पेश आये थे और इस से भी कङी शर्ते महाराजा हरिसिंह के साथ मिल कर पेश की थी बल्कि जोर देकर मनवाई भी थी आगे नेहरु बोले

उस समय तुम्हारा और महाराजा का दिन था आज हमारा है तुम लोग भी अपने कश्मीर के लिए लङ रहे थे उसी के लिए शर्ते मनवा रहे थे फर्क बस इतना है की मैं उस समय भी देश के लिए लङ रहा थाऔर शर्तें मान रहा था मैं आज भी देश की भलाई के लिए लङ रहा हूं और आज स्थितियों में फर्क ये आ गया की अब मैं अपनी शर्ते तुमसे मनवा रहा था

तुम कश्मीर के लिए सब कुछ कर रहे थे और मैं देश के लिए सबकुछ कर रहा था दोनों अपनी जगह सही थे नथिंग पर्सनल शेख दिल पर मत लेना

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