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नज़रिया: मुनाफा की अंधी दौड़ और पूँजीवाद से नहीं बचेगा पर्यावरण

मुकेश असीम

पर्यावरण का सवाल मुख्यतः आर्थिक-राजनीतिक सवाल है, वैज्ञानिक-तकनीकी या नैतिक-सांस्कृतिक नहीं। विज्ञान ने तो पर्यावरण-प्रदूषण संबंधित अधिकांश प्रश्नों की वजहों को भी स्पष्ट किया है और इनसे निपटने की तकनीक भी विकसित कर दी है। मगर जो आर्थिक संबंध इस समस्या को पैदा और बड़ा कर रहे हैं, तथा वह कैसे राजनीति में अभिव्यक्त हो रहे हैं, उन्हें समझे बिना चिंता, रोष जाहिर करने या लिजलिजी-गिजगिजी भावनात्मक उदारवादी मानवीय अपीलों से कुछ असर होता तो यह स्थिति आती ही क्यों?

पेड़ों-जंगलों का नष्ट होना हो, या तालाबों-झीलों-नदियों का खत्म होना, मिट्टी-हवा-पानी में जहर भरने का काम हो या पटाखों-पराली का जलाना हो, या दवाओं से दूध सब्जियों तक में मिलावट या इनका पूरी तरह नकली होना, सबके पीछे विशिष्ट आर्थिक संबंध हैं। समस्या बड़े स्तर के पूंजीवादी उत्पादन व छोटे स्तर के या सरल माल उत्पादन दोनों में है। पर कारण भिन्न हैं।

अभी छोटे उत्पादकों (लघु उद्योग, दस्तकार व छोटे-मध्यम किसान) को लेते हैं। ये निरंतर दिवालिया व कंगाल हो रहे हैं क्योंकि मौजूदा पूंजीवादी दौर में छोटा माल उत्पादन घोर अनुत्पादक व अलाभकारी है। पर इन्हें भी तो अपनी हर जरूरत के लिए बाजार में खरीदार बन कर खड़ा होना है।

यही विवशता इन्हें हर मुमकिन अतिरिक्त पैसा अर्जित करने वास्ते जमीन के हर कतरे को चूस लेने, हर पेड़-झाड़ी को काट डालने, जोहड़-तालाबों को पाट देने, फसल में जहरीले रसायन प्रयोग करने, गाय-भैंस के बच्चे को एक बूंद दूध न देकर मार डाल फिर दूध के लिए ओक्सिटोसिन की सुईं लगाने, नकली दूध-मावा बनाने, पाती-पराली जलाने, खाना-मिठाई बेचने वालों को सस्ते-जहरीले तेल, रंग, नकली मसाले, आदि इस्तेमाल करने, नकली रसायन-दवाएं बनाने, सब्जियों-फलों में जहरीले रसायन-रंग, मोम लगाने, कूड़ा-कचरा जलाने, वगैरह वो सब काम करने के लिए मजबूर करती है जिनका नतीजा वो भी जानते हैं पर उनके मौजूदा जीवन की तकलीफ़ें उनका इस हद तक अमानवीकरण कर चुकी हैं कि वे जानते हुये भी यह करते हैं।

उनके पास जो उत्पादन के साधन व पूंजी है उसमें वैज्ञानिक तकनीक या उत्तम गुणवत्ता वाले अवयवों का प्रयोग करने का विकल्प भी नहीं है। कोई नैतिक उपदेश इस कठोर वास्तविकता को बदल नहीं सकते क्योंकि यह नैतिक समस्या है ही नहीं। पूंजीवादी व्यवस्था में छोटे पैमाने के उत्पादकों का यही हश्र है। ये स्वयं भी इस बात को समझते हैं, अपनी आगामी पीढ़ियों को इससे निकालना चाहते हैं। पर पूंजीवादी व्यवस्था का आर्थिक संकट व उससे पैदा बेरोजगारी इन्हें निकलने भी नहीं देती।

जो लोग बिना विज्ञान-तकनीक, यंत्रों वाले लकड़ी के हल, बैलगाड़ी, दस्तकारी, बाग-बगीचों से हरे-भरे सुरम्य ग्राम-स्वराज्य की कल्पना में आज की समस्या का हल बताते हैं वो अक्सर वही शहराती लोग होते हैं जो उस ‘ग्राम्य’ जीवन को दशकों पहले छोड़कर बड़े पूंजीवादी उत्पादन क्षेत्र की नौकरियाँ करते आधुनिक तकनीक आधारित जीवन बिताते हैं। खुद पूंजीवादी लाभ के हिस्से का भोग करते यही लोग छोटे किसानों-दस्तकारों के जीवन की कंगाली-विपत्ति को ज्यों का त्यों सुरक्षित रखना चाहते हैं।

अतः छोटे पैमाने के उत्पादन का समाप्त होना ऐतिहासिक जरूरत है। बड़े पैमाने के सामाजिक उत्पादन में ही वह संभावना निहित है कि पर्यावरण के लिए आवश्यक जंगल, तालाब छोड़े जा सकें, जमीन को अतिदोहन से बचाकर जैविक चक्र को चालू रखा जाये, व जैविक वैज्ञानिक तकनीकों के प्रयोग से बिना जहरीले रसायनों के उत्पादन किया जा सके और औद्योगिक कचरे को अहानिकारक उत्पादक पदार्थों में बदलने लायक तकनीकी निवेश किया जा सके।

पर पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था में यह संभावना वास्तविकता नहीं बन सकती क्योंकि उत्पादन का मकसद सामूहिक सामाजिक हित नहीं हरेक पूंजीपति का निजी मुनाफा है। उपलब्ध वैज्ञानिक तकनीक का प्रयोग वह इसलिए नहीं करता क्योंकि यह उसके मुनाफे को कम कर उसे पूंजीवादी बाजार होड में कमजोर करती है। मुनाफा ही उसकी नैतिकता है अतः कोई नैतिक उपदेश उसे भी नहीं बदल सकता। मुनाफे की पूंजीवादी व्यवस्था को बदलना ही विकल्प है।

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