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भूकंप से दिल्ली बच जाए, हिमालय ध्वस्त हो जाए तो कोई बात नहीं

रवीश कुमार 

जो हमारी सोच में होती है, वही भाषा में होती है। हमारी संवेदना का दिल्लीकरण हो गया है। दिल्ली का इस कदर दिल्लीकरण हो चुका है कि वह अपने आंखों के सामने ख़राब हवा को भी देश के दूरदराज़ के इलाके में ख़राब हवा के रूप में देखती है। जैसे उसके लिए हरियाणा के खेतों में जलावन तो बड़ा दिखता है मगर दिल्ली के भीतर का प्रदूषण नहीं दिखता है। उसी तरह भूकंप की खबरों को लेकर दिल्ली की चिन्ता यही होती है कि बस दिल्ली को कुछ न हो। जैसे ही किसी रिसर्च में यह बात आती है कि हिमालय में भूकंप आएगा तो दिल्ली और एन सी आर भी बर्बाद हो जाता है तभी दिल्ली के कान खड़े होते हैं। दिल्ली से छपने वाली ख़बरों में आप इस तरह का विभाजन साफ साफ देखेंगे। जैसे हिमालय तबाह हो जाए कोई बात नहीं, बस दिल्ली एनसीआर को कुछ न हो। हिमालय के करीब तो लोग रहते ही नहीं हैं।

भूकंप पर लिखी जाने वाली ख़बरों और उनकी हेडलाइन में अक्सर ऐसा विभाजन साफ साफ उभर कर आता है। इसी को मैं त्रासदियों का दिल्लीकरण कहता हूं। केरल में बाढ़ आए तो ठीक, तमिलनाडु में गजा तूफान आए तो वो समझे, खेतों में किसान मर जाए तो ठीक, बस दिल्ली को कुछ नहीं होना चाहिए। इस सुरक्षाकवच में मीडिया ने एनसीआर को भी जोड़ लिया है। मीडिया की भाषा में दिल्ली और एन सी आर एक ऐसे क्लब की तरह झलकता है जैसे इन्हें हर हाल में आपदा से महफूज़ रखना है। बाकी की नियति तो आपदाग्रस्त होने की ही है। दिल्ली का काम सिर्फ मुआवज़ा बांटना है और हवाई सर्वेक्षण करना है।

नवंबर महीने में भूकंप को लेकर कई ख़बरें छपी हैं। भारतीय शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पुरानी बात को ही साबित किया है कि हिमालय में उच्च तीव्रता का भूकंप आने वाला है। बंगलुरू के जवाहर लाल नेहरू सेंटर फॉर अडवांस साइंटिफिक रिसर्च के भूकंप वैज्ञानिक सी पी राजेंद्रन ने बताया है कि हिमालय के क्षेत्र में तनाव काफी जमा हो चुका है। जब यह निकलेगा तो 8.5 या उससे भी अधिक तीव्रता का भूकंप आएगा। यह भूकंप कभी भी आ सकता है। इस रिसर्च में भारतीय सीमा पर मौजूद नेपाल से सटे चोरगालिया और मोहाना खोला के आंकड़ों को शामिल किया गया है।

शोधकर्तांओं का कहना है कि 1315 से 1440 के बीच 600 किमी के इलाके में भंकर भूकंप आया था। 8.5 या उससे अधिक तीव्रता का भूकंप आया था। इसके बाद हिमालय का यह हिस्सा 600-700 साल तक शांत रहा। जिसके कारण इसके भीतर काफी तनाव जमा हो गया है। जिसके बाहर आने का सम हो गया है। अमरीकी भूगर्मशास्त्री रोजर बिल्हम ने भी इस नए शोध का समर्थन किया है। रोजर इस क्षेत्र में लंबे समय से काम करते रहे हैं। यह वाला हिस्सा एनडीटीवी डॉट कॉम से लिया है।

इकोनोमिक टाइम्स में भी इससे जुड़ी ख़बर छपी है। इसमें बताया गया है कि जब 2001 में भुज में भूंकप आया था तब 10,000 लोग मरे थे। भुज से 320 किमी दूर अहमदाबाद की ऊंची इमारतों पर भी बहुत बुरा असर पड़ा था। वैसी इमारतें जिनमें स्टिल्ट फ्लोर होता है जहां गाड़ियां पार्क होती हैं, साईं भजन होता है, बच्चे खेलते हैं, वैसी इमारतें जल्दी गिरती हैं। दूर कहीं भी भूकंप आता है, ऐसी इमारतें हिल जाती हैं। भूकंप का एक प्रकार होता है जिसकी तीव्रता केंद्र से 500 किमी दूर तक जाती है। इन्हें रेलिग तरंगे कहते हैं।1985 में मेक्सिको में आए भूकंप के समय भी यही हुआ था। नए शोध से पता चलता है कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और कश्मीर के कुछ इलाके भूकंप के तीव्र झटके के लिए तैयार हैं। 1950 से पहले इन इलाकों में कोई ऊंची ईमारत नहीं थी। अब दिल्ली एन सी आर और हिमालयी इलाकों में भी ऊंची इमारतों की भरमार हो गई है।

आप जानते हैं कि दिल्ली की सतह में मिट्टी ज़्यादा है। ठोस चट्टानें कम हैं। भुरभुरे चट्टान ज़्यादा हैं। रेलिग तरंगों वाला भूकंप दिल्ली और आस पास की इमारतों को नेस्तानाबूद कर देगा। इस विषय पर शोध करने वाले दुनिया के कई वैज्ञानिक मानते हैं कि 2018 और उसके बाद के कुछ सालों में ऐसे कई भूकंप आएंगे। कारण धरती की रफ्तार का धीमा होना है। इस कारण दिन की लंबाई में मामूली बदलाव आता है। कुछ लाख मिलीसेकेंड का फर्क आ जाता है। लेकिन इसके कारण धरती के नीचे जमा ऊर्जा की भारी मात्रा बाहर आने के लिए बेताब हो जाती है। पिछली सदी में ऐसा पांच बार देखा गया है। दिन की लंबाई का धीमा पड़ना छह साल तक चलता है और उसके बाद धरती एक तीव्र भूकंप के दौर में प्रवेश कर जाती है। अंग्रेज़ी में इसे LENGTH OF THE DAY(LOD) कहते हैं। इस बार यह 2011 में शुरू हुआ, इस लिहाज़ से माना जा सकता है कि पृश्वी 2018 में तीव्र भूकंप के चरण में प्रवेश कर गई है। शोध में यह नहीं कहा गया है कि ठीक-ठीक कब भूकंप आएगा लेकिन शोध से पता चलता है कि जब भी दिन की लंबाई में बदलाव आता है, ज़्यादातर बड़े भूकंप इक्वेटर के पास आते हैं।

दिल्ली और आस-पास के इलाके में भूकंप को लेकर कोई गंभीरता नहीं है। गंभीरता तो हिमालय के इलाकों में भी नहीं हैं। जब भी भूकंप आया है, दिल्ली एन सी आर की इमारतों को लेकर मीडिया ने घनघोर कवरेज भी किया है लेकिन उसके बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। कार्रवाई कैसे होगी। मीडिया ने वैसे पर्याप्त रूप से भूकंप के ख़तरों और दिल्ली की तैयारी को लेकर चर्चा की है। मगर कोई खास बदलाव नहीं आया है। जैसे हम सब मिटने का इंतज़ार कर रहे हैं। जीवन बीमा भी लेने वाला कोई नहीं बचेगा। केवल प्रीमियम ही जमा करते रह जाएंगे लोग। यह काम कौन करेगा, क्या कोई अलग से मजबूत विभाग है, उस विभाग में लोग हैं? हम सब जानते हैं कि कुछ नहीं है।

जब नीयत में बेईमानी होती है, भाषा में बेईमानी आ जाती है और तब हमारा बेईमान सिस्टम हमारी ज़़िंदगी से भी बेईमानी करने लग जाता है। दावे के साथ कह सकता हूं कि ऐसी ख़बरों से दिल्ली एन सी आर के इंजीनियर झूमने लग जाते होंगे। भयादोहन से और कमाई बढ़ जाती होगी।
वे खुश ही होते होंगे कि घूस खाकर जिन इमारतों के बना देने की अनुमति दी वो गिर जाएंगी। लोग मर जाएंगे। नई इमारतें खड़ी होंगी, वे नए सिरे से घूस लेंगे। दिल्ली एनसीआर को भूकंप से ख़तरा है तो क्या उससे बचने का तरीका क्या है? बेईमान संस्थाओं और उनमें बैठे लोगों को यह गुड न्यूज़ मुबारक। जब होगा तब देखेंगे अभी तक कमा लें। क्या यही हमारी नैतिकता नहीं बन गई है?

रवीश कुमार के ब्लॉग क़स्बा से

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