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दहेज़ उत्पीड़न क़ानून के तहत आरोपों की पुष्टि किए बिना किसी की गिरफ़्तारी नहींः सुप्रीम कोर्ट

दहेज निरोधक क़ानून के दुरूपयोग से चिंतित उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिया है कि इस तरह के मामलों में आरोपों की पुष्टि के बगैर सामान्यतया कोई गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए क्योंकि ऐसे मामलों में निर्दोष व्यक्तियों के मानवाधिकार हनन को दरकिनार नहीं किया जा सकता. शीर्ष अदालत ने भारतीय दंड संहित की धारा 498-ए विवाहिता से अत्याचार के तहत शिकायतों से निबटने के लिये अनेक निर्देश दिये हैं. इनमें प्रत्येक जिले में परिवार कल्याण समिति का गठन करने का निर्देश भी शामिल है.

एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट में ने यह टिप्पणी भी की कि ऐसी अधिकतर शिकायतें वाजिब नहीं होती हैं और अनावश्क गिरफ़्तारी समझाौते की संभावनाओं को खत्म कर सकती है. जस्टिस एके गोयल और यूयू ललित की की पीठ ने इस बात का भी ज़िक्र किया कि शीर्ष अदालत ने पहले भी इस प्रावधान की गंभीरता से समीक्षा की आवश्यकता बताई थी और कहा था कई बार इस तरह की शिकायतें न सिर्फ आरोपी बल्कि शिकायतकर्ता के लिये भी परेशान का सबब बन जाती हैं.

पीठ ने कहा, ‘हम उस उद्देश्य के प्रति सचेत हैं जिसके लिये यह प्रावधान क़ानून में शामिल किया गया था. साथ ही निर्दोष के मानवाधिकारों के उल्लंघन को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है. यह न्यायालय अनावश्यक गिरफ़्तारी या संवेदनहीन जांच के प्रति कुछ सुरक्षा उपायों पर गौर कर चुका है. अभी भी यह समस्या काफी हद तक बदस्तूर जारी है.हालांकि न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि ये निर्देश शारीरिक हिंसा या मृत्यु से संबंधित अपराधों के मामले में लागू नहीं होंगे. यानी अगर महिला घायल हो जाती है या उसकी मौत हो जाती है, तब नए निर्देश को नहीं माना जाएगा और तुरंत गिरफ़्तारी होगी.

अदालत ने कहा कि यह क़ानून महिलाओं पर हो रहे अत्याचार रोकने के लिए बनाया गया था और इस क़ानून के तहत बड़ी संख्या में मुक़दमे दर्ज़ हो रहे हैं, इसलिए इससे सिविल सोसाइटी को भी जोड़ा जाना चाहिए. दैनिक जागरण के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार:
• मुकदमे के दौरान हर आरोपी की अदालत में उपस्थिति अनिवार्य नहीं होगी.
• अगर कोई आरोपी यदि विदेश में रह रहा है, तो सामान्य तौर पर उसका पासपोर्ट जब्त नहीं होगा और न ही उसके ख़िलाफ़ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया जाएगा.
• हर जिले में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा एक या इससे अधिक परिवार कल्याण समिति बनाई जाएगी, जिसमें पैरा लीगल स्वयंसेवी, सामाजिक कार्यकर्ता, सेवानिवृत्त व्यक्तियों, कार्यरत अधिकारियों की पत्नियों आदि को शामिल किया जा सकता है.
• लेकिन समिति के सदस्यों को गवाह नहीं बनाया जा सकेगा. हालांकि समिति इस तरह के मामले में संलिप्त पक्षकारों को व्यक्तिगत रूप से अथवा संवाद के दूसरे तरीकों से उनसे बातचीत कर सकती है.
• धारा 498-ए के तहत पुलिस या मजिस्ट्रेट तक पहुंचने वाली शिकायतें समिति को भेजी जाएंगी, जिन पर एक महीने के अंदर समिति को रिपोर्ट देनी होगी.
• कोर्ट ने यह भी कहा है कि समिति की रिपोर्ट आने तक किसी की गिरफ़्तारी नहीं होनी चाहिए. समिति की रिपोर्ट पर जांच अधिकारी या मजिस्ट्रेट मेरिट के आधार पर विचार करेंगे.
• धारा 498-ए की शिकायत की जांच विशिष्ट अधिकारी द्वारा होनी चाहिए.

अदालत ने उस प्रक्रिया को भी परिभाषित किया है, जिसका समितियों को पालन करना होगा. इसमें कहा गया है कि पहले दंपति और परिवारों को बुलाया जाना चाहिए और इस विषय पर चर्चा की जानी चाहिए. फिर समिति स्थानीय मजिस्ट्रेट या जांच अधिकारी को एक रिपोर्ट पेश करेगी. ऐसे में गिरफ्तारियां तब ही की जा सकती हैं जब समिति की रिपोर्ट में पति या उसके परिजनों की गलती पाई जाएगी.
कोर्ट ने यह भी कहा है कि यदि ऐसे मामले में जमानत याचिका दायर की गयी हो तो लोक अभियोजक या शिकायतकर्ता को एक दिन का नोटिस देकर यथासंभव उसी दिन उस पर फैसला किया जा सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने राजेश शर्मा नाम के एक व्यक्ति की इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के ख़िलाफ़ डाली गई याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया है. न्यायालय ने राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण से यह भी कहा कि इन निर्देशों में यदि बदलाव की या और निर्देशों की आवश्यकता हो तो वह इस संबंध में रिपोर्ट दे. कोर्ट ने इस मामले को अब अप्रैल 2018 में आगे विचार के लिये सूचीबद्ध किया है.

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