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असम ग्राउंड रिपोर्ट – असमी अस्मिता के नाम पर भाषाई अल्पंसख्यकों के खिलाफ पूरा तंत्र

मनीषा भल्ला

असम में एनआरसी की दूसरी सूची जारी हो गई है। चालीस लाख लोग नागरिकता से बाहर कर दिए गए। इस खबर से मुझे हैरानी नहीं हुई। यह सूची जारी होने के कुछ दिन पहले लगभग मैंने असम में दस दिन बिताए थे। ग्राउंड से मिली जानकारियों के आधार पर अनुमान था कि एनआरसी की दूसरी सूची में 50 लाख लोग नागरिकता से बाहर कर दिए जाएंगे।

एनआरसी पर काम करने से पहले इस मुद्दे की कुछ तकनीकी जानकारियों के लिए मैं गोवाहाटी में एक परिचित के जरिये एक नामी राष्ट्रीय टीवी चैनल के संपादक से मिलने उनके ऑफिस पहुंची। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि बात शुरू करने से पहले बता दूं कि मैं संपादक होने के नाते इस मुद्दे पर बात नहीं करुंगा, असमी होने के नाते करुंगा। उनका कहना था कि हाल ही में असम के मुख्धारा के अख़बार और टीवी चैनलों के 28 संपादकों ने असम के मुख्यमंत्री से एक मीटिंग की है। हम लोगों ने साफ तौर पर मुख्यमंत्री से कह दिया है कि एनआरसी में बंगाली भाषाई मुसलमानों और हिंदुओं को नागरिकता सूची से बाहर किया जाए। इनकी तादाद जिस तरह से बढ़ रही है उस अनुसार असम में असमी लोग अल्पसंख्यक हो जाएंगे। संपादक महोदय ने कहा कि एनआरसी की जारी होने वाली सूची में अगर दस लाख लोग बाहर होते हैं हम तब भी नहीं मानेंगे, बीस लाख बाहर होते हैं तो भी हमें मंज़ूर नहीं, तीस लाख होते हैं तो भी मंज़ूर नहीं, यह आंकड़ा 50 लाख तक होना चाहिए।

जो मीडिया एनआरसी की सूची में नागरिकता से बाहर हुए लोगों को घुसपैठिया लिख रहा है वह वहां की ज़मीनी हक़ीक़त से बेखबर है। जिनकी जड़ें असम में हैं, पुश्तों से वहां रह रहे हैं वह डी वोटर बना दिए गए। गरीब, दिहाड़ीदार, अशिक्षित, सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बंगाली भाषी लोग डी वोटर बनाए गए। सड़क पर आ चुके इन 40 लाख लोगों के हालात के लिए भाजपा से ज्यादा कांग्रेस ज़िम्मेदार है। असम में 15 साल तक कांग्रेस ने राज किया है। वह चाहती तो इसे हल कर सकती थी लेकिन कांग्रेस ने भाजपा को यह मुद्दा थाली में परोस कर दिया है। जिसके जरिये वह अब ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है और करेगी।

असम में गैर कानूनी तरीक़े से दाखिल हुए प्रवासियों की पहचान के लिए अरसे से एनआरसी की मांग की जा रही थी। इसके लिए असमी हो या बंगाली सभी राज़ी थे। हिंदु हो या मुसलमान किसी को आपत्ति नहीं थी। क्योंकि जालीदार टोपी पहने जिस भी व्यक्ति को घुसपैठिए होने की नज़र से देखा जाता था उसका कहना था कि हम इसलिए एनआरसी चाहते हैं क्योंकि हमारे माथे से घुसपैठिए होने का कलंक धुल जाए।

लेकिन एनआरसी की ज़मीनी हक़ीक़त बहुत डरावनी रही। असम की जनता का आरोप है कि भाजपा-आरएसएस के दबाव के चलते एनआरसी के ज़मीनी काम में न केवल धांधलियां हुईं बल्कि जनता को प्रताड़ित किया गया। वर्ष 1951 से लेकर अभी तक के 16 दस्तावेजों की जो शर्त एनआरसी ने रखी थी उनमें ज़ाहिर है कि भारत जैसे देश में क्लैरिकल काम में गलती होना स्वाभाविक है। मैं अपनी बात करूं तो मेरे ही दसवीं और बाहरवीं के सर्टिफिकेट में मेरे पिता का नाम गलत लिखा हुआ है। हाल ही में मेरे इग्नू से आए एमए के रोल नंबर में मेरा नाम गलत है। तो इसका मतलब यह है कि मैं इस देश की नागरिक नहीं हूं क्या। क्लैरिकल स्टाफ की गलती का खामियाज़ा मुझे मेरी नागरिकता से हाथ धोकर चुकाना होगा क्या। असम में बाल विवाह होता रहा है। वहां जिस तबके के साथ नाइंसाफी हुई है उस तबके की महिलाएं घर से बाहर नहीं निकलतीं, पढ़ाई नहीं करतीं, नौकरी नहीं करतीं दस्तावेजों के नाम पर उनके पास न के बराबर दस्तावेज हैं। शादी के बाद उनका नाम बदल दिया गया, गांव का नाम बदल गया। तो इसका क्या मतलब है कि वह महिलाएं घुसपैठ करके भारत की सीमा में दाखिल हुई हैं। ज्यादा तादाद में महिलाएं प्रताड़ना का शिकार हुई हैं।

सोचा तो यह था कि एनआरसी के जरिये 50 साल पुराना विवाद थम जाएगा। असम संयुक्त तौर पर मज़बूत भी होगा। लेकिन छानबीन बताती है कि असम में यह आखिरी पायदान पर खड़े उस शहरी के लिए मौत जैसा साबित हुआ जिसे भारतीय नागरिकता साबित करनी पड़ी। एक मुलाकात में पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत और तरूण गोगोई ने भी माना कि निचले स्तर पर कर्मचारियों ने एनआरसी के काम में लापरवाई बरती है। एनआरसी की तरफ से लोगों को नागरिकता साबित करने के लिए जो नोटिस भेजे गए थे वह उन्हें नहीं मिले या वक़्त पर नहीं मिले। जब नोटिस नहीं मिले तो एनआरसी ने अपनी सूची फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल को भेजी। जिसे नोटिस भेजा गया उस द्वारा हाजिरी न दिए जाने पर फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने एक्स पार्टी जजमेंट दे उसे विदेशी बना दिया। क्योंकि जिसे नोटिस भेजा गया उस तक तो नोटिस पहुंचा ही नहीं। जहां 59 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं वहां एनआरसी ऑनलाइन नोटिस देने की बात कर रहा है। क्यों लोगों के हाथ में नोटिस नहीं दिए गए।

आंखों देखा हाल है कि असम में इस तबके को यह नहीं पता था कि करना क्या है, जाना कहां है, क्या दस्तावेज देने हैं, नोटिस का जवाब कैसे देना है। दो जून की रोटी में मसरूफ मज़दूर दस्तावेजों की गहन जानकारी नहीं रखता है। वकीलों के खर्च में गरीब लोगों ने घर, ज़मीन सब बेच दिया। इसमें वकील भी कम अपराधी नहीं हैं। क्योंकि उन्होंने लोगों को दस्तावेजों की जानकारी ही नहीं कि नागरिकता साबित करने के लिए क्या दस्तावेज देने हैं। कई सौ केस देखने के बाद मैंने देखा कि एक ही घर के दो लोग विदेशी करार कर दिए गए बाकी लोगों को भारतीय नागरिकता दे दी गई। मां-बाप डी वोटर हैं तो बच्चों के पास नागरिकता है, बच्चे डी वोटर हैं तो मां-बाप के पास नागरिकता है। यह कैसे हो सकता है। यहां तक कि सरकारी पेंशन पा रहे लोगों को डी वोटर बना दिया गया। जो भी है मारे तो बेचारे गरीब नागरिक गए आरएसएस-भाजपा हिंदुतत्व और एआईडीयूएफ मुस्लिम कार्ड खेल लेंगे।

बरपेटा ज़िले के गांव हाउली टाउन के रहने वाले राजमिस्त्री ज़ाकिर अली का परिवार एक वक़्त की रोटी मुश्किल से खा पा रहा है। घर में एमकमात्र कमाने वाले ज़ाकिर अली थे। उन्हें और उनके भाई बशीर अली दोनों को नौ साल पहले डी वोटर का नोटिस आया। नोटिस के जवाब में दोनों भाईयों ने जो दस्तावेज लगाए उसे एनआरसी ने खारिज कर दिया। ज़ाकिर अली और उसके भाई ने इस फैसले को अलग-अलग स्तर पर अदालत में चुनौती दी। अदालत में आखिरी हाज़िरी के वक्त उन्हें बॉर्डर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। केस चलता रहा। लेकिन ज़ाकिर अली के भाई को भारतीय घोषित कर दिया गया और ज़ाकिर अली को विदेशी। हालांकि इसमें गलती वकील की थी। वकील ने दोनों के मामले में मां के परिवार (मदर लिगेसी ) के दस्तावेज लगाए। जबकि लगाने पिता के चाहिए थे।

अब एनआरसी की सूची में बशीरअली तो हैं लेकिन ज़ाकिर अली नहीं हैं। वह तीन साल से डिटेंशन कैंप में रह रहे हैं। उनके चार बेटियां और एक बेटा है। जब घर में रोटी पकनी भी बंद हो गई तो इनका 17 साल का बेटा केरल कमाने के लिए गया। उसे महीने के दस हज़ार रुपये मिलते हैं। जिसमें घर का खर्च और वकील की फीस जाती है और वह अपना गुज़ारा भी इन्हीं पैसों में करता है।

इसी प्रकार बीटीएडी के ज़िला चिरांग का गांव है एंक्करबारी। यहां रहने वाले सबसे बुज़ुर्ग आदमी पंचानंद राय की पत्नी को पांच दिन पहले ही बॉर्डर पुलिस उस वक्त गिरफ्तार कर ले गई जब वह पूजा कर रही थी। जबकि दोनों पति-पत्नी को डी वोटर का नोटिस आया था लेकिन पति को भारतीय मान लिया गया और पत्नी को गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि उन्हें कुछ दिन बाद छोड़ दिया गया था।

लाखों की तादाद में डी वोटर हुए लोग अपने दस्तावेज लिए घूम रहे हैं। जब वह वोट डालने गए या गिरफ्तार हुए तब उन्हें पता लगा कि वह डी वोटर बना दिए गए हैं। दरअसल एनआरसी के ज़रिये ही असम में गैर कानूनी तरीके से रह रहे बांग्लादेशी लोगों का सही आंकड़ा सामने आएगा। गृहमंत्रालय द्वारा एनआरसी को दिए गए आंकड़ों के अनुसार असम में 1950 से लेकर अब तक 80,000 बांग्लादेशी आए जिनमें से अब 4,000 रह गए हैं बाकी लोग या तो वापस जा चुके हैं या उनकी मौत हो चुकी है।

यह जानना भी ज़रूरी है कि असम में हिंदु-मुसलमान की बजाय विवाद असमी और बांग्ला भाषाई लोगों के बीच है। असमिया लोग नहीं चाहते कि बांग्ला भाषाई खासकर मुसलमान वहां रहें। यहां रहने वाले हर मुसलमान को हमेशा बांग्लादेशी घुसपैठिए की नज़र से देखा जाता है इसलिए मुसलमान भी चाहते हैं कि एनआरसी होना ही चाहिए। नागरिकता की सूची से बाहर हुए ज्यादातर लोगों में मुसलमान हैं।

इस विषय पर फील्ड में काम कर रही जमियत उलमा ए हिंद (अरशद मदनी) के असम के सदर मुश्ताक अनफर का कहना है कि असमी लोगों को लगता है कि बंगाली भाषाई मुसलमानों और हिदुंओ से उनकी अस्मिता को खतरा है। इनकी वजह से कभी न कभी वे लोग अल्पसंख्यक हो जाएंगे। मुश्ताक अनफर बताते हैं ‘बिना जांच किए, सोचे समझे मुसलमानों को डी वोटर किया जा रहा है। बड़ी तादाद में मुसलमानों का नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए बड़ी साज़िश रची जा रही है। असम में इतनी बड़ी तादाद में हो रहे मानवाधिकार हनन पर कोई मुंह नहीं खोल रहा है।’

पूरी स्टेट मशीनरी ने असमी अस्मिता के नाम पर बंगाली भाषाई मुसलमान और बंगाली भाषाई हिदूं के खिलाफ काम किया है। अदालत में बड़ी तादाद में इस तरह के केस लड़ रहे मोइज़ूद्दीन महमूद बताते हैं कि मुसलमानों और बंगाली हिंदूओं के खिलाफ फारेनर्स ट्रिब्यूनल में झूठे सुबूत दिए जा रहे हैं। बॉर्डर पुलिस कहती है कि मैं इस आदमी के घर गया, नागरिकता संबंधी दस्तावेज मांगे लेकिन यह नहीं दे पाया। पीड़ित कहता है कि मेरे घर पर तो कोई आया ही नहीं। पीड़ित के पास नोटिस जाता है। वह नोटिस के जवाब में नागरिकता संबंधी ज़मीन के, शिक्षा के, दस्तावेज देता है लेकिन तमाम दस्तावेज देने के बावजूद किसी छोटी से स्पेलिंग में गलती बताकर उसे बांग्लादेशी करार कर दिया जाता है। पीड़ित कहता है कि यह दस्तावेज मेरा ही है, संबंधित अधिकारी से बात कर लें, उसे नोटिस दें लेकिन ट्रिब्यूनल का कहना होता है कि यह पीड़ित की ज़िम्मेदारी है कि वह साबित करे कि वह दस्तावेज उसी का है। मामला हाई कोर्ट आता है लेकिन वहां केस डिसमिस कर दिया जाता है।

इस वक्त फारेनर्स ट्रिब्यूनल में इस तरह के तीन लाख केस लंबित है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार असम में 34 फीसदी मुसलमान आबादी है और 1951 में यह 24 फीसदी थी। असमी भाषा बोलने वाले 48.3 फीसदी हैं और बंगाली बोलने वाले 24 फीसदी है। असम में गुवाहाटी विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर अब्दुल मन्नान कहते हैं असम में 57 फीसदी मुसलमान गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में हालात और खराब हैं। वे लोग अशिक्षित और गरीब हैं इसलिए साल दर साल उनकी जनसंख्या बढ़ रही है न कि बांग्लादेश से मुसलमानों के आने की वजह से।

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