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नज़रियाः मोदी साहब ! याद रखें कि यह उनके सपनों का भारत नहीं बल्कि जंगलराज है


हिसाम सिद्दीक़ी

तरह-तरह के नए-नए नारे लगाकर मुल्क को ख्वाबों की दुनिया में ही रखने में माहिर बल्कि शातिर वज़ीर-ए-आज़म नरेन्द्र मोदी ने गुज़िश्ता दिनों एक नया नारा देते हुए कहा था ‘मेरा भारत बदल रहा है’। साथ ही उन्होने यह भी एलान कर दिया था कि 2020 तक वह एक नया भारत बना देंगे। मोदी के जुमले पर गौर करने की भी ज़रूरत है। वह हमेशा ‘मेरा भारत’ कहते हैं कभी भी ‘हमारा भारत’ नहीं कहते हैं। खैर इसपर आइंदा कभी लिखा जाएगा।

मोदी की यह बात सुनकर कई दिनों तक इस उलझन में रहा कि आखिर मोदी के भारत में बदल क्या रहा है। मोदी का भारत इसलिए कि उन्होंने ही बार-बार मेरा-मेरा-मेरा भारत कहा है। हमें किसी भी तरह समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर भारत में क्या बदल रहा है। अब 5 मई और नौ मई को सहारनपुर में जो कुछ हुआ उसे देखकर यकीन (विश्वास) हो गया कि हां मोदी का और हमारा भारत दोनों मे बहुत बड़े पैमाने पर बदलाव हुआ है। यहां यह बताना भी जरूरी है कि उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से बदलाव की जो खबरें आई वह तब्दीली होने में तकरीबन बीस साल का वक्त लगा है। कोई बीस साल कब्ल सहारनपुर की हरौड़ा एसेंबली सीट से बहुजन समाज पार्टी की आज की चीफ मायावती ने अपने सियासी गुरू कांशीराम की निगरानी में चुनाव लड़ा था।

कांशीराम अक्सर पब्लिक मीटिंगों में अपना कलम उल्टा करके पब्लिक (दलितों की भीड़) को दिखाते हुए कहते थे पेन का ऊपरी हिस्सा सवर्ण तबका है और नीचे का हिस्सा दलित हम इसे पूरी तरह उलट देना चाहते हैं जब दलित तबका ब्राह्मण तबके की जगह पर और ब्राह्मण तबका दलितों की जगह पर पहुंच जाएगा तब यह तस्लीम किया जाएगा कि अब भारत के समाज मे तब्दीली आई है और यह कलम भी सही सिम्त (दिशा) में पहुंचा हुआ क़रार दिया जाएगा।

पांच मई को सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में ठाकुरों के साथ दलितों ने जो रवैय्या अख्तियार किया उससे लगता है कि अब कांशीराम का ख्वाब पूरा हो रहा है और शायद इसी सूरते हाल को मोदी ‘मेरा भारत बदल रहा है’ कह रहे हैं। हिन्दुस्तान में दलित और आदिवासी बल्कि कई पिछड़े तबके मजलूम रहे हैं। उनपर हर तरह के मजालिम ढाए गए। यह मजालिम ढाए गए हिन्दुओं के सवर्ण तबकों यानी ब्राहमणों और ठाकुरों के जरिए जहां कहीं मुसलमान ताकतवर रहे उन्होने भी दलितों, आदिवासियों और समाज के इंतेहाई कमज़ोर तबकों के साथ ठीक वैसा ही बर्ताव किया वैसे ही मजालिम ढाए जैसे उनपर सवर्ण हिंदू ढा रहे थे।

आजादी के बाद दलितों पर मज़ालिम का रवैय्या कम ज़रूर हुआ पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ। इतना ज़रूर हुआ है कि जैसे-जैसे दलितों व आदिवासियों के वोटों में इज़ाफा होता गया इंतेखाबात में उनकी अहमियत बढती गई वैसे-वैसे उनके साथ होने वाले मजालिम में कमी होती गई। इसके बावजूद अभी तक दलितों को बराबरी का दर्जा नहीं मिल सका है। उनके साथ पूरे हिन्दू समाज ने रोटी बेटी का रिश्ता कायम नहीं होने दिया। यह भी अजीब बात है कि अगर कोई दलित आईएएस, पीसीएस या आईएफएस और आईपीएस हो गया तो सवर्णों ने उसको अपनी बेटी देने में कोई दुश्वारी महसूस नहीं की लेकिन अगर किसी आम दलित का किसी सवर्ण लड़की से या सवर्ण लड़के का किसी दलित लड़की से इश्क हो गया तो दोनों का कत्ल होना लाजिमी है।

हरियाणा और पच्छिमी उत्तर प्रदेश में इस किस्म के नौजवानों को मारा जाना दरख्तों से लटका कर फांसी दे देने के वाक्यात अक्सर सामने आते रहते हैं। इस किस्म के मर्डर्स को सवणों ने नाम भी बहुत अच्छा दे रखा है ऑनर किलिंग’। अब इस किस्म की किलिंग में भला ‘आनर’ कहां से दिखता है। हम देखते हैं कि आईएएस, आईपीएस , आईएफएस और पीसीएस हो जाने वाले दलितों की अक्सरियत को सवर्ण तबकों के लोग या तो खुशी-खुशी अपनी बहन बेटियां व्याह देते हैं या फिर वह दलित अफसरान इश्क मोहब्बत के जरिए खुद ही सवर्ण लड़कियां हासिल कर लेते हैं। अब भी दलित अफसरान की अक्सरियत ऐेसी है जिनकी बीवियां सवर्ण तबके की हैं। बड़ी तादाद तो ऐसे अफसरान की भी है जिनकी अपनी बिरादरी की पहली बीवी गांवों में ही रह जाती है और शहरों में उनकी ‘मेम साहिबा’ कोई सवर्ण ही बन जाती हैं। ऐसे मामलात देख कर भी अक्सर लगता है कि हां हमारा भारत तब्दील हो रहा है।

तालीम अच्छी, मुलाज़मिते-व्यापार में हैसियत अच्छी हो जाने के बावजूद अभी भी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, बिहार और उड़ीसा जैसे प्रदेशों के गांव-देहातों में दलितों के साथ सवर्णों का रवैय्या तकरीबन वैसा ही है जैसा सालों पहले हुआ करता था। गांवों की हालत यह है कि अगर कोई सवर्ण दलितों के दरवाजे से गुज़रे तो दलित अपने घर के बाहर पड़ी चारपाई (खटिया) या टूटी-फूटी कुर्सी पर बैठा नहीं रह सकता वह उठकर खड़ा जरूर होगा। सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में बदलते भारत की तब्दील शुदा तस्वीर पांच मई को उस वक्त दिखी जब महाराणा प्रताप की जयन्ती के मौके पर ठाकुरों ने गाजे बाजे के साथ जुलूस निकाला एक गाड़ी पर तेज आवाज में म्यूजिक बजाता डीजे जुलूस के आगे चल रहा था। गांव का जुलूस पड़ोसी गांव शिमलाना में महाराणा प्रताप जयन्ती के बड़े जलसे में शामिल होने जा रहा था। यह जुलूस दलितों के मोहल्ले में पहुंचा तो दलितों ने ठीक वही किया जो अक्सर गांवों में सवर्ण बिरादरी के लोग दलितों के साथ करते दिखते हैं।

गांव के दलित प्रधान शिवकुमार ने पहले तो ठाकुरों से कहा कि उनके मोहल्ले से खामोशी के साथ जुलूस निकालें न नारेबाजी न म्यूजिक। उनके मोहल्ले से आगे निकल कर जो चाहें करें। ठाकुरों ने जिद की तो कहा कि अच्छा डीजे म्यूजिक की आवाज कम कर लें ठाकुर साहबान इसके लिए तैयार नहीं हुए उस वक्त तक प्रधान शिवकुमार के दरवाजे गांव के बड़ी तादाद में दलित इकट्ठा हो चुके थे। मामूली कहा-सुनी के बाद दलितों ने ठाकुरों को मारना शुरू कर दिया।

ठाकुरों ने भी जवाबी कार्रवाई की लेकिन दलितों की तादाद ज्यादा होने की वजह से ज्यादा पिटाई ठाकुरों की हो गई। इस हद तक कि पड़ोसी गांव रसूलपुर टांक से इस जुलूस में शामिल होने आए छब्बीस साल के ठाकुर नौजवान सुमित राजपूत की बुरी तरह पिटाई से जान चली गई। सुमित के कत्ल की खबर फैलते ही गांव के दलित भाग खड़े हुए तो ठाकुरों ने इकट्टा होकर शब्बीरपुर और महेशपुर के दलितों के मकान जला दिए। इसपर एक दलित का कहना था कि उनके दो दर्जन घर जले, घरों में उनके पास था ही क्या? इसके बावजूद अगर हम लोग गांव में होते तो हमारे घर जलाने वालों को भी हम उन्हीं जलते हुए घरों में फेंक कर जला देते यकीनन दलितों के यह तेवर इस बात का सबूत है कि हमारा भारत तब्दील हो रहा है।

तेजी से तब्दील होते भारत की तस्वीर नौ मई को मेरठ और सहारनपुर दोनों शहरों में दिखी। वजीर-ए-आला योगी आदित्यनाथ नौ मई को मेरठ दौरे पर गए तो दलितों से हमदर्दी जताने की गरज से वह शेरगढी मलिन बस्ती में भी गए। उनका काफिला मलिन बस्ती से निकलते ही दलितों की एक बड़ी भीड़ ने मलिन बस्ती में इकट्ठा होकर नारेबाजी शुरू कर दी फिर यह लोग बस्ती के बाहर मेन रोड पर आ गए पेट्रोल पम्प और दुकानों में तोड़-फोड़ शुरू हो गई। शराब की एक दुकान लुट गई। पुलिस समझ ही नहीं सकी कि आखिर हुआ क्या? पूछने पर नाराज दलितों ने कहा कि मलिन बस्ती में आने के बावजूद चीफ मिनिस्टर योगी ने वहां लगी डाक्टर अम्बेडकर की मूर्ति पर न तो फूल चढाए न उसे माला पहनाई यह डाक्टर अम्बेडकर की तौहीन है हम इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते वह नारेबाजी करते रहे ‘बाबा साहब का अपमान नहीं सहेगा हिन्दुस्तान’।

उसी दिन यानी नौ मई को सहारनपुर के गांधी पार्क में बड़ी तादाद में दलितों ने इकट्ठा होकर शब्बीरपुर और महेशपुर गांवों में पांच मई को दलितों के घर जलाने के मुआवजे का मतालबा शुरू कर दिया। यह पंचायत ‘भीम सेना’ नाम की एक नई तंजीम ने बुलाई थी। पंचायत शुरू हुई तो चारों तरफ से दलितों का हुजूम गांधी पार्क पहुचने लगा। पुलिस और एडमिनिस्ट्रेशन के अफसरान ने मौके पर पहुचकर पंचायत खत्म करने के लिए कहा क्या कि पंचायत की इजाजत नहीं ली गई थी तो भीम सेना के सदर चन्द्रशेखर ने दो टूक कह दिया कि अगर ठाकुर बिरादरी जिला असफसरान की इजाजत के बगैर महाराणा प्रताप जयन्ती का जलसा कर सकते हैं जुलूस निकाल सकते हैं तो हम भी पंचायत करने के लिए किसी से कोई इजाजत नहीं लेंगे।

बात इतनी बढ गई कि मार-पीट शुरू हो गई। शहर पुलिस कप्तान, सीओ और एसडीएम को जान बचाने के लिए भागना पड़ा। दलित यहीं नहीं रूके उन्होने पार्क से निकल कर आधे शहर और शहर के इर्दगिर्द गांवों में बडे़ पैमाने पर तोड़-फोड़ और आगजनी की। जिस तरह बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, हिंदू युवा वाहिनी और हिन्दू रक्षकदल व गौररक्षकों पर हाथ डालने की हिम्मत पुलिस नहीं कर पाती, उसी तरह भीम सेना के चीफ चन्द्रशेखर पर भी हाथ डालने की हिम्मत पुलिस नहीं दिखा पाई। मतलब साफ है कि हमारा भारत बदल रहा है और बकौल मोदी 2020 तक एक नया भारत सामने होगा। मोदी को याद रखना चाहिए कि अगर इसी तरह भारत तब्दील हुआ जैसे पच्छिमी उत्तरप्रदेश में हो रहा है तो यह रास्ता अफरा-तफरी यानी अनार्की की जानिब भी जाता है।

(लेखक दैनिक उर्दू जदीद मरकज़ के संपादक हैं। )