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नज़रियाः मोदी सरकार के आने के बाद कैंसर की तरह ज़हर पूरे समाज में फ़ैल गया है


हिसाम सिद्दीक़ी

हम सैकड़ों सालों से बड़े फख्र के साथ कहते आए हैं कि हिंदुस्तान दुनिया का वाहिद (एकमात्र) ऐसा मुल्क़ है जहां हर मज़हब, हर तबके और हर ज़ात के लोग आपस में इतना मिल जुलकर मोहब्बत के साथ रहते हैं कि पता ही नहीं चलता कि इनमे कौन किस बिरादरी, किस मज़हब और किस फिरके से ताल्लुक रखता है। हमें अपनी सेक्युलर कद्रों खुसूसन अक्सरियती तबके हिंदुओं के सेक्युलरिज्म और रवादारी (सहिष्णुता) पर भी बड़ा फख्र रहा है। अब यह लिखने में मुझे इंतेहाई तक़लीफ महसूस हो रही है कि मुल्क़ के हिंदुओं की रवादारी (सहिष्णुता) और सेक्युलरिज्म में काफी फर्क आ गया है। यह सारा डेवलपमेंट गुजिश्ता तीन सालों की मोदी सरकार की देन है।

‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा लगाने वाली यह सरकार देश और देश के लोगों का कुछ भला तो नहीं कर सकी लेकिन आम लोगों के जेहनों में ज़हर ज़रूर भर दिया है। हम सहाफत के शोबे (क्षेत्र) में हैं ज़ाहिर है हमारे साथियों में मुसलमानों की तादादा उतनी नहीं है जितनी गैरमुस्लिमों की है। हमेशा हम सब प्यार-मोहब्बत से एक साथ मिलकर अपना काम करते रहे हैं। 1988 से 1992 तक का अयोध्या आंदोलन, पंजाब में खालिस्तान तहरीक और दहशतगर्दी का बदतरीन दौर, अलीगढ, मुरादाबाद, मेरठ जैसे भयानक दंगे, कश्मीर की दहशतगर्दी और 1993 मार्च में मुंबई में हुए सीरियल बम धमाके। हर मौजूअ और मसले पर हमारे दरम्यान तबादले ख्याल भी होता था और बहस भी खूब होती थी। बहस मे एक दूसरे के खिलाफ जो दलीलें पेश की जाती थीं अक्सर उन्हीं दलीलों में खबर का अस्ल ‘सूत्र’ भी मिल जाया करता था।

अगले दिन लोग एक दूसरे को फोन करके हंसते हुए ताने भी दिया करते थे कि कल तो बड़ी बहस कर रहे थे लेकिन रात में खबर लिखी उसमें मेरी दलील को ही इस्तेमाल कर लिया। आपस में एक दूसरे का इतना ख्याल कि छः दिसंबर की स्याह रात में जब हमें फैजाबाद से लखनऊ आने के लिए कोई सवारी नहीं मिली तो विनोद शुक्ला ने कहा अबे परेशान क्यों होते हो मेरा ड्राइवर लखनऊ पहुचाएगा। यह सब इस लिए था कि मुख्तलिफ नजरियात (विचार धारा) मानने के बावजूद हमारा यह भी मानना था होता था कि हमारे नजरियात कुछ भी हो खबर लिखने और घर से बाहर हमें ऐसा बर्ताव करना है कि हम सिर्फ और सिर्फ सहाफत के नज़रियात वाले लोग है।

आज हालात इतने खराब हो चुके हैं कि हमारे दरम्यान हिंदू मुसलमान की एक गहरी खाई बन गई है। सहाफी बिरादरी में ऐसे लोगों की तादाद इतनी बढ़ गई है कि सब पर शक होने लगा है। हम इतनी घटिया सतह तक उतर गए हैं कि वजीर-ए-आज़म नरेंद्र मोदी और वजीर-ए-आला आदित्यनाथ योगी की किसी कमी पर अगर कोई उंगली उठा दे तो बड़ी तादाद में सहाफी गाली-गलौज पर उतर आते हैं। माहौल इतना खराब हो गया है कि अगर कोई हिन्दू या मुसलमान सहाफी इनके खिलाफ बोल दे तो फौरन ही उन्हें देशद्राही करार दे दिया जाता है। इस मजमून की शुरूआत हमने सहाफियों से इसलिए की कि हम इसी बिरादरी का हिस्सा हैं और बिरादरी से बखूबी वाकिफ है।

ज़हर तो पूरे समाज में कैंसर की तरह फैला चुका है। मोदी सरकार आने के बाद से समाज में जो जहर फैला है उसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि ट्रेनों और सड़कों पर चंद गुंडे जब मुसलमानों को कभी गाय के नाम पर और कभी मुल्ला यानी मुसलमान होने की वजह से पीट-पीटकर मार रहे होते हैं तो भीड़ तो इकट्ठा होती है लेकिन भीड़ में शामिल लोग कभी गुण्डों का शिकार बनने वाले की मदद में आगे नहीं आते। हद यह कि कोई छिप कर पुलिस को फोन तक नहीं करता है। सबसे ज्यादा जहर तो लोगों ने अमरनाथ यात्रियों पर वहशी दहशतगर्दों के हमले के बाद सोशल मीडिया के जरिए फैला दिया। इंतेहा यह कि होटल के कमरों और ट्रेन व हवाई टिकटों की बुकिंग में दलाली करने वाली एक कंपनी की एक खातून अफसर ने होम मिनिस्टर राजनाथ सिंह तक पर हमला करते हुए ट्वीट कर डाला। खुद को सीनियर सहाफी कहने वाले मौकापरस्त और मफादपरस्त बूढे के विक्रम राव तक जहर फैलाने में लग गए।

वह भी इस बहाने कि गुजरात की जिस बस पर दहशतगर्दों ने हमला किया उसके ड्राइवर शेख सलीम की तारीफ मीडिया क्यों कर रहा है। याद रहे कि बस का एक टायर पंचर होने के बावजूद सलीम ने तकरीबन दो किलोमीटर तक बस भगा कर यात्रियों की जान बचाई। जिस मीडिया चैनलों और अखबारात ने उसकी तारीफ की उन्हें भी सोशल मीडिया पर खूब गालियां दी गईं। गुजरात के चीफ मिनिस्टर विजय रूपानी ने कहा था कि वह ड्राइवर सलीम को बहादुरी का अवार्ड दिए जाने की सि फारिश करेंगे। इस बयान की वजह से रूपानी को हिंदुतत्व का गद्दार तक लिखा गया। के. विक्रम राव और गुजराती जुबान मे निकलने वाले अखबार दिव्य भास्कर समेत बड़ी तादाद में लोगों ने कह दिया कि बस सलीम नहीं बल्कि ट्रांसपोर्ट मालिक जवाहर देसाई का बेटा हर्ष देसाई चला रहा था।

कई ज़हरीलों ने तो यहां तक लिख दिया कि सलीम को थर्ड डिग्री देकर पूछगछ की जानी चाहिए, उसके मोबाइल की कॉल डिटेल की तहकीकात की जाए हमला तो उसीने कराया है वर्ना अमरनाथ यात्रा में एक मुसलमान को घुसने की क्या ज़रूरत थी। इन ज़हरीलों को यह भी नहीं मालूम कि मुसलमान ही अमरनाथ गुफा तक यात्रियों को लेजाकर दर्शन कराते हैं। दूसरी तरफ जहर से भरे मुसलमानों ने फौरन जवाब में लिखना शुरू कर दिया कि इस साल के आखिर में गुजरात असम्बली के एलक्शन हैं इसलिए नरेन्द्र मोदी और बीजेपी ने खुद ही यह हमला कराया है।

समाज में कैंसर की तरह फैल चुके ज़हर का ही नतीजा है कि उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के चरखारी हलके से पहली बार जीत कर असम्बली पहुचने वाले बीजेपी के मेंबर ब्रजभूषण राजपूत ने बाकायदा सोशल मीडिया के सहारे फिर टीवी चैनलों और अखबारात के नुमाइंदों के जरिए देश के सौ करोड़ हिन्दुओं की जानिब से मुसलमानों को धमकाया उनके हज के सफर को रोकने का एलान किया लेकिन एक भी तंज़ीम (संगठन) और समाज ने उसकी मजम्मत (निन्दा) तक नहीं की किसी ने उनसे यह सवाल नहीं किया कि आखिर सौ करोड़ हिन्दुओं का ठेकेदार उन्हें किसने बना दिया। वह किस हैसियत से सौ करोड़ हिंदुओं की जानिब से मुसलमानों को धमकाने की घटिया हरकत कर रहे हैं? याद दिलाना जरूरी है कि ब्रजभूषण राजपूत जिन राजपूत के बेटे हैं वह 2004 में दिल्ली में दरख्त पर चढ़कर अपनी कनपटी पर रिवॉल्वर लगा कर मतालबा करते दिखे थे कि सोनिया गांधी ही वजीर-ए-आजम बनें।

सोशल मीडिया का तो यह हाल हो गया है कि समाज में जहर फैलाने के लिए बीजेपी आईटी सेल की जानिब से जिन लोगों को बाकायदा पैसे देकर तैनात किए जाने की खबरें आया करती हैं उनपेड जहरीलों की मर्जी के खिलाफ अगर बीजेपी का भी कोई लीडर बोलता है तो यह ज़हरीले उसपर टूट पड़ते हैं। यह जहर एक दिन में नहीं फैला है। हमे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि इस किस्म की बीमारियां ऊपर से आती हैं। उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर योगी आदित्यनाथ के दो बयानात ही काफी हैं।

एक में उन्होने कहा कि ‘गाय की स्मगलिंग करने और काटने वालों की पूजा नहीं की जा सकती’। दूसरे बयान में उन्होंने कहा कि अगर वह लोग (मुसलमान) ठीक से नहीं रहेंगे दंगा-फसाद करेंगे तो अक्सरियती (हिंदू) तबका भी उन्हें ठीक करेगा। इन दोनों बयानात का बहुत ही खतरनाक मतलब निचली सतह पर निकाला गया है। वह यह कि अगर कोई गाय की स्मगलिंग करेगा या जिबह करेगा तो उसकी पूजा करने के बजाए गौरक्षक ही उसका इलाज कर देंगे। इसी तरह दंगाई मुसलमानों के खिलाफ प्रदेश पुलिस सख्त कार्रवाई नहीं करेगी बल्कि हिंदू तबका ही उन्हें मुंह तोड़ जवाब देगा। अगर अपने दोनों बयानात में वह यह भी कह देते कि गायों की स्मगलिंग और उन्हें जिबह करने वालों और दंगा-फसाद करने वालों के खिलाफ पुलिस सख्त कार्रवाई करेगी तो शायद नीचे उनके बयान का गलत मैसेज न जाता।

ब्रजभूषण राजपूत जैसों का इतना भड़कीला बयान देने की हिम्मत न पड़ती और शायद फर्रूखाबाद में ट्रेन में सफर करने वाले मुस्लिम कुन्बे पर हमला करने की हिम्मत भी कोई गुंडा न कर पाता। इस खतरनाक जहर की वजह से अब तो आम मुसलमान यह सोचने लगा है कि उन्हें टेनों और बसों में सफर भी करना चाहिए या नहीं। जहर फैलाने वाले भूल रहे हैं कि जब जरूरत से ज्यादा जहर समाज और देश में घोल दिया जाता है तो उसका असर जहर फैलाने वालों पर ही पड़ता है। सहारनपुर में दलितो और ठाकुरों तो रायबरेली में ब्राहमण बनाम यादव सुल्तानपुर के जयसिंह पुर में ब्राहमण बनाम दलित, गुजरात के सुरेन्द्र नगर में राजपूतों और मरवाड़ों के दरम्यान जो जानलेवा हिंसा हुई वह इसी जहर का नतीजा है।

(लेखक उर्दू साप्ताहिक जदीद मरकज़)

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