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नज़रिया – मुसलमानों से चाहती क्या है मोदी सरकार

हिसाम सिद्दीक़ी

गुजिश्ता काफी दिनों से मुल्क के अलग-अलग प्रदेशों में मुसलमानों को पीट-पीटकर कत्ल करने यानी लिंचिंग करने के वाक्यात पेश आ रहे हैं। कहीं गाय के नाम पर कहीं मुल्ला के नाम पर कहीं बच्चा चोरी के नाम तो कहीं ट्रेन की सीट के नाम पर। गोया मुल्क के मुसलमानों में एक खौफ की फजा पैदा करने की कोशिशें मुसलसल जारी है, लेकिन मुसलमान भी सत्तर सालों में पिट-पिटकर इतने सख्त जान हो चुके हैं कि खौफजदा होने को तैयार ही नहीं हैं।

वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने एक नहीं दो-दो बार गौरक्षकों के नाम पर दहशत फैलाने वालों को मुबय्यना (कथित) वार्निंग भी दे दी फिर भी गौरक्षक अपनी हरकते छोड़ने को तैयार नहीं हैं। मुबय्यना वार्निंग हम इस लिए लिख रहे हैं क्योंकि गाय के नाम पर लिंचिंग के वाक्यात तो उन्हीं प्रदेशों में हो रहे हैं जिन प्रदेशों में बीजेपी सरकारें हैं और मोदी की मेहरबानी से उनके ही कठपुतली चीफ मिनिस्टर उन प्रदेशों में बैठे हुए सरकारें चला रहे हैं।

हालात इतने खराब हो गए हैं कि कई हिन्दू लोग अपने मुसलमान दोस्तों को मश्विरा देनेे लगे हैं कि फिलहाल वह (मुसलमान) बसों और ट्रेनो में सफर करने से बचें और गोल टोपी लगाकर कुर्ता पाजामा पहन कर सड़कों पर न निकलें। हम अभी भी लिंचिंग को सिर्फ मुसलमानों का मसला नहीं मानते यह देश का मसला है और इतना खतरनाक मसला है कि सबसे ज्यादा लिंचिंग कराने वाले झारखण्ड में 22 मई को बच्चा चोरी के बहाने जिन तीन लोगों को पीट-पीट कर मार डाला गया वह तीनों विकास वर्मा, गौतम वर्मा और उनका एक दोस्त गणेश गुप्ता तीनो हिन्दू थे। विकास और गौतम सगे भाई थे। चंद दिन कब्ल उत्तर प्रदेश के रायबरेली में पांच लोागें को पीट-पीटकर अधमरा किया गया दो के हाथ-पांव काटे फिर पांचों को उन्हीं की स्कार्पियो गाड़ी में डालकर पांचों को जिंदा जला दिया गया। यह पांचों मुसलमान नहीं थे, ब्राहमण थे। इस बेहरमाना कत्लेआम को अंजाम देने वालों की खुली हिमायत उत्तर प्रदेश के एक वजीर स्वामी प्रसाद मौर्या ने की। मौर्या के खिलाफ कार्रवाई तो दूर नरेन्द्र मोदी और योगी आदित्यनाथ ने वार्निंग तक नहीं दी। ऐसी सूरते हाल में वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी की वार्निंग को फर्जी और मिलीभगत ही कहा जा सकता है।

राज्य सभा में उन्नीस जुलाई को लिंचिंग के शर्मनाक वाक्यात पर संजीदा बहस हुई लीडर आफ अपोजीशन गुलाम नबी आजाद ने इस मसले पर सरकार की पूरी पोलपट्टी खोलकर रख दी। सभी अपोजीशन पार्टियों ने एक जुबान में इन वाक्यात का जिक्र करते हुए मोदी सरकार को आइना दिखाने का काम किया। इसके बावजूद सरकार की जानिब से फाइनेंस मिनिस्टर और राज्य सभा में लीडर आफ द हाउस अरूण जेटली, एचआरडी वजीर प्रकाश जावडेकर और जूनियर वजीर मुख्तार अब्बास नकवी समेत जितने भी वजीरों और बीजेपी मेम्बरान ने इस बहस में हिस्सा लिया सभी ने मामले को घुमाने और हल्का करने की ही कोशिश की। ऐसी सूरत में अब मुसलमानों में एक ही सवाल सुनाई दे रहा है कि आखिर सरकार मुसलमानों से चाहती क्या है?

पूरे मुल्क का मुसलमान अम्न व अमान के साथ रहना चाहता है फिर आखिर सरकार उन्हें जबदस्ती गुमराही के रास्ते पर क्यों डालना चाहती है। क्या नरेन्द्र मोदी की मरकजी और उनकी पार्टी की रियासती सरकारें यह चाहती हैं कि जो रास्ता गौरक्षा के नाम पर बड़ी तादाद में आरएसएस से मुताल्लिक गुण्डों और शहरी दहशतगर्दों ने अख्तियार कर रखा है उनके जुल्म व ज्यादतियों से बचने के लिए वहीं हिंसा का रास्ता मुसलमान भी अख्तियार कर लें? क्या मवेशी व्यापारियों को अब दस-बीस लोगों की टीम बना कर असलहा लेकर चलना पडे़गा ताकि रास्ते में गौरक्षा के नाम पर जब गुण्डे उन्हें घेरे तो वह भी अपने बचाव में असलहों का इस्तेमाल करें या हिंसा पर उतारू हो जाएं?

इन गौरक्षक गुण्डों का शिकार बन रहे बेकुसूर मुसलमान इंसान हैं। बिल्ली को भी अगर मारते-मारते आप दीवार तक ले जाते हैं उसके पास भागने का कोई रास्ता नहीं बचता है तो वह बिल्ली भी पलट कर हमला ही कर देती है। मौजूदा हालात से परेशान और मायूस होकर मुस्लिम नौजवान गुमराही के रास्ते पर न पडे़, जरायम की दुनिया और दहशतगर्द गरोहों का शिकार न बन जाएं उन्हें रोक रखने में गुजिश्ता साल भर से तकरीबन मस्जिदों के इमाम साहबान, समाज के जिम्मेदारान और बुजुर्ग दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, जुमे की नमाज के वक्त और उसके बाद भी उलेमा साहबान नौजवानों और पूरे मुस्लिम समाज को यह समझाते देखे जा सकते हैं कि अल्लाह बड़ा है आप लोग सब्र और तहम्मुल का दामन थामे रखिए, मौजूदा हालात भी तब्दील होंगे और मुल्क में लोग अम्न व अमान के साथ मिलजुल कर जिंदगी गुजारेंगे।

28 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर से कन्याकुमारी और रामेश्वरम तक, कोलकाता से मुंबई तक और कश्मीर से पोर्ट ब्लेयर तक ‘नाट इन माई नेम’ तहरीक के तहत पूरे मुल्क के लोगों ने लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर निकल कर जेहनी एतबार से इंतेहाई तनाव में जिंदगी गुजार रहे मुस्लिम नौजवानों का हौसला मजबूत करने का काम किया है। मुसलमानों को एक बार फिर यकीन हुआ है कि आरएसएस परिवार के लोगों की ज्यादतियों के खिलाफ वह अकेेले नहीं हैं। उन्हें मायूस और गुमराह होने की जरूरत नहीं है। मुल्क के लोग हमेशा की तरह आज भी उनके साथ हैं और मुल्क का सेक्युलर तानाबाना कहीं से न तो टूटा है और न कमजोर हुआ है।

इस सूरतेहाल के बावजूद मोदी सरकार से मुसलमानों का एक अहम सवाल है वह यह कि अगर उनके साथ जुल्म व ज्यादती होती है उनका कोई नजदीकी गौरक्षकों के हाथों मार दिया जाता है पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती प्रदेश सरकारें गौरक्षकों के हक में दिखती हैं अदालतों से कोई इंसाफ नहीं मिलता तो उनके पास रास्ता क्या बचता है? इस सवाल का जवाब सरकार में बैठे उन्हीं लोगों को देना पड़ेगा जिनपर कानून का राज कायम रखने की जिम्मेदारी है।

राजस्थान हो हरियाणा हो या झारखण्ड अदालतें मजबूर दिखती हैं। क्योंकि अदालतों को तो सुबूत चाहिए और प्रासीक्यूशन की जानिब से मुकदमात की मजबूत पैरवी चाहिए। प्रासीक्यूशन गुजरात की तरह जालिमों और कातिलों को बचाने में मसरूफ दिखता है। ऐसे मे अदालते क्या इंसाफ करें? राजस्थान सरकार और उसके मुकर्रर किए हुए सरकारी वकीलों की बेईमानी का ही नतीजा है कि पहलू खान के सभी कातिल गिरफ्तार नहीं हुए उनमें तीन गिरफ्तार हुए उन्हे जमानते मिल गई वह बाहर आकर फिर अपने काम पर लग गए। वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी के प्रदेशों में बैठे चीफ मिनिस्टर्स को यह नहीं भूलना चाहिए कि पहलू खान हो, मजलूम अंसारी हो, मिन्हाज अंसारी हों, अबरार खान हों, मोहम्मद शकील, नईम शेख, सिराज शेख, हलीम शेख, सलमान, अलीम उद्दीन अंसारी, उस्मान अंसारी वगैरह हों या मोहम्मद असरार हों इनमें से जिस जिस के मासूम छोटे बच्चों ने अपने वालिद की मस्ख (छत-विछत) लाश को देखा है उन बच्चों की आंखों में उनके बाप की टूटी-फूटी लाश के साथ-साथ उनके कातिलों की तस्वीरें भी कैद हो चुकी हैं। बडे़ होकर वह इन तसावीर के साथ क्या सुलूक करेंगे और उम्र बढने के साथ-साथ वह कौन सा रास्ता अख्तियार कर सकते हैं इसका तसव्वुर (कल्पना) भी खौफनाक नजर आता है। इन बच्चों को सही रास्ते पर रखने का एक ही जरिया है वह यह कि उनके बाप के कातिलों को सख्त से सख्त सजा मिले अगर ऐसा न हुआ तो इन बच्चों को बचाए रखना बहुत मुश्किल हो जाएगा। वैसे समाज के लोगों ने अभी से इन बच्चों पर नजर रखने का काम शुरू कर दिया है।

राज्य सभा में बहस के दौरान लीडर आफ द हाउस और फाइनेस मिनिस्टर अरूण जेटली ने यह कहकर इतने संगीन मामले को हल्का करने की कोशिश की कि नज्म व नस्क (कानून व्यवस्था) प्रदेश सरकारों की जिम्मेदारी है। अरूण जेटली यह क्यों भूल जाते हैं कि जिन प्रदेशों में लिंचिंग के वाक्यात ज्यादा हो रहे हैं उनमें उनकी अपनी ही पार्टी की सरकारें हैं वह बेवकूफ बनाने की कोशिशें क्यों करते रहे। मुख्तार अब्बास नकवी की बातों का तो जिक्र ही बेमायनी (निरर्थक) है। वह तो हमेशा अपने आकाओं को खुश करने की कोशिशों मे ही मसरूफ दिखते हैं। प्रकाश जावडेकर तो आरएसएस की भट्टी से तप कर बीजेपी और मरकजी वजारत में शामिल हुए हैं। जब वह लिंचिंग की बात पर भी 1984 में सिख मुखालिफ दंगों का जिक्र करते है तो हठधर्मी का सुबूत देते हैं।

हम इस मजमून के जरिए उन्हें एक तल्ख हकीकत से रूबरू करा देना चाहते हैं वह यह कि अगर 1984 मंे सिख मारे गए थे तो उन्हें मुसलमानों ने नहीं मारा था उन्हें भी इंतेहाई घटिया जेहनियत के फिरकापरस्त हिन्दुओं ने ही मारा था। हिन्दुओं को गुमराह करके उन्हें फिरकापरस्ती का नशा कौन पिलाता है। यह बात प्रकाश जावडेकर समेत पूरा मुल्क जानता है। हम दावे के साथ यह भी कह रहे है कि पूरे मुल्क में एक भी मुसलमान ने किसी सिख पर हाथ नहीं उठाया था। दूसरे क्या सिखों के कत्लेआम ने प्रकाश जावडेकर और उनके पूरे परिवार को मुसलमानों का कत्लेआम करने का लाइंसेस दे दिया। आप ही सिखों का कत्लेआम करें फिर उसके बहाने मुसलमानों को कत्ल करने का जवाज (औचित्य) तलाश कर लें कहां का इंसाफ और ईमानदारी है।

हमने 1984 में देखा था कि सिखों के कत्लेआम के बाद आरएसएस परिवार और उसके हामियों का एक-एक वोट उस वक्त राजीव गांधी की कांग्रेस को गया था। पंडित अटल बिहारी वाजपेयी तक एलक्शन हार गए थे, लोक सभा में बीजेपी के मेम्बरान की तादाद दो ही रह गई थी। यह हिमायत आरएसएस ने बिला वजह नहीं की थी। उस वक्त की आरएसएस कयादत को यह खुशफहमी थी कि राजीव गांधी सियासत में नए हैं इस तरह हिमायत करके उन्हे अपनी मुट्ठी में कर लेगें फिर उनके जरिए अपने एजेण्डे को पूरा कराएंगे। विश्वनाथ प्रताप सिंह, अरूण सिंह, बूटा सिंह और अरूण नेहरू की शक्ल में आरएसएस ने अपने मजबूत एजेण्ट राजीव गांधी के ईर्दगिर्द प्लाण्ट ही कर रखे थे। डाक्टर करण सिंह भी उस वक्त विश्व हिन्दू परिषद के जरिए आरएसएस के काफी नजदीक पहुच चुके थे। राजीव गांधी की नसों मे नेहरू और इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी जैसी सेक्युलर शख्सियतों का खून दौड़ रहा था इस लिए वह आरएसएस के एजेण्डे पर काम करने के लिए तैयार नहीं हुए तो संघ परिवार ने उनके खिलाफ तलवारें निकाल लीं अपने एजेण्टो के जरिए राजीव गांधी की चार सौ चैदह (414) मेम्बरान लोक सभा वाली सरकार को हिला दिया। पूरी तारीख दुनिया के सामने है। इसलिए प्रकाश जावडेकर हो या बीजेपी का कोई भी लीडर उन्हें सिख मुखालिफ दंगों से मुसलमानों को कत्ल कराने का लाइसेेंस नहीं हासिल करना चाहिए। दोनों मामलात बिल्कुल अलग-अलग हैं।

( लेखक जदीद मर्कज़ के सम्पादक हैं)