Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content
Search in posts
Search in pages
Filter by Categories
home
margin
slider
top three
top-four
travel
Uncategorized
viral
young india
कल्चर
दुनिया
देश
लीक से हटकर
विशेष
वीडियो
सटीक
सियासत
हाशिया
हेल्थ

माँ गूलर का दूध है, माँ निमिया की डार

प्रभात रंजन

कल वरिष्ठ लेखक दिविक रमेश जी ने ध्यान दिलाया कि कोलकाता से  बींजराज रांका के संपादन में 2017 में​ प्रकाशित भारत ही नहीं बल्कि विश्व के अनेक देशों की मां पर केन्द्रित ग्रंथ “मां मेरी मां” एक भव्य, जरूरी और महत्त्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है। इसमें मां को लेखों, कहानियों और कविताओं के माध्यम से महसूस किया गया है। कवियों में सितांशु यश्शचंन्द्र, निदा फ़ाज़ली, चन्द्रकांत देवताले, सुनीता जैन, दिविक रमेश, गुलजार, माया मृग, कविता वाचक्नवी, दिव्या माथुर, डाक्टर शाहीना तबस्सुम, बींजराज रांका, प्रो कृष्ण कुमार (बर्मिंघम), पुष्पिता अवस्थी, आदि लगभग 60 की उपस्थिति है। कहानीकारों में संजीव, ममता कालिया, मन्नू भंडारी,, कुसुम खेमानी, श्यामा कुमारी आदि हैं।  लेखों के रचयिताओं में आर शौरिराजन, (अमेरिकन मां) कमला दत्त, प्रोफेसर बी.व. ललिताम्बा, प्रोफेसर एस. शेषारत्नम, रविप्रकाश टेकचंदानी, (कोरियाई मां) दिविक रमेश, सुषम बेदी, (ओड़िया साहित्य में मां) प्रोफेसर रवीन्द्र नाथ मिश्र, परवेज़ अहमद आदि लगभग 70 लेखक सम्मिलित हैं। कुछ रचनाएँ उसी किताब से आज मदर्स डे पर- मॉडरेटर

माँ

 
-चन्द्रकांत देवताले
 
माँ के लिए संभव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिउंटियों का एक दस्ता मेरे मस्तिस्क में रेंगता रहता है.
माँ वहां हर रोज चुटकी-दो-चुटकी आता दाल देती है
 
 मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ
यह किस तरह होता होगा
घट्टी पीसने की आवाज़ मुझे घेरने लगती है
और मैं बैठे-बैठे दूसरी दुनिया में ऊंघने लगता हूँ.
 
जब कोई भी माँ छिलके उतार कर
चने, मूंगफली या मटर के दाने नन्हीं हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर थरथराने लगते हैं
माँ ने हर चीज के छिलके उतारे मेरे लिए
देह, आत्मा. आग और पानी तक के छिलके उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया
 
 मैंने धरती पर कविता लिखी है
चन्द्रमा को गिटार में बदला है
समुन्द्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूंगा
माँ पर नहीं लिख सकता कविता.
 
 तू है न मेरे पास
दिविक रमेश
 
सोचता हूँ क्या था कारण –
माँ को ही नहीं लेना आया सपना
या सपने की ही नहीं थी पहुँच माँ तक.
 
 माँ गा सकती थी
सुना सकती थी कहानियाँ
रख सकती थी व्रत
मांग सकती थी मन्नतें
पर ले नहीं सकती थी सपने.
चाह जरूर थी माँ के पास
जैसे होती है जीने के लिये जीती हुई
किसी भी औरत के पास.
 
माँ हंस लेती थी
पूरी होने पर चाह
और रो लेती थी
न होने पर पूरी.
 
 सोचता हूँ
क्यों नहीं था मान के पास सपना
क्यों माँ बैठकर मुझे गोद में
कहती थी आहे बगाहे
तू तो है ना मेरे पास
और क्या चाहिये मुझे?
 
 पर आजतक नहीं समझ पाया
कैसे करूँ बंद इस वाक्य को – तू तो है न मेरे पास
लगाऊं पूर्ण विराम
या थोक दूँ चिन्ह प्रश्नवाचक.
 
 सोचता हूँ
न हुआ होता मैं
तो शायद खोज पाती माँ
अपना कोई सपना.
थमी न रहती सिर्फ चाह पर.
 
 या मेरा ही होना
न हुआ होता
लीक पर घिसटती बैलगाड़ी सा
जिसका कोई सपना ही नहीं होता.
 
 माँ
 
बुद्धिनाथ मिश्र
 
माँ केसर की पाँखुरी, माँ कुमकुम सिंदूर.
माँ मंदिर की प्रार्थना, माँ आरती कपूर.
माँ गूलर का दूध है, माँ निमिया की डार
धरती माता की बनी माँ सोलहो सिंगार.
माँ हिमगिरी की कन्दरा, गंगा तट की भोर
धन्य हुआ ईश्वर स्वयं धर कर माँ का रूप.
माँ करूणा की चांदनी, चुगे अंगार चकोर
माँ ममता की छांह है, भिनसारे की धूप.
माँ असीसती रात – दिन, माँ ही पकडे कान.
धरा गगन के बीच में, माँ ही हर सिवान.
Democracia एक गैर-लाभकारी मीडिया संस्था हैं। जो पत्रकारिता को सरकार-कॉरपोरेट दबाव से आज़ाद रखने के लिए वचनबद्ध है। इसे जनमीडिया बनाने के लिए आर्थिक सहयोग करें।