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मोदी के बनारस में वैचारिक उग्रवाद, पर मन में आज भी बसे हैं गांधी

हिमांशु उपाध्याय

मोदी का बनारस बदल रहा है बेशक किंतु बदलाव की इसआंधी में मूल्य गुम हो रहे हैं। कल के बनारस में लालबहादुर शास्त्री थे तो आज का बनारस नरेंद्र मोदी का है। बुनियादी तौर पर दोनों की धाराएं भिन्न हैं। केंद्र में गांधी कहीं नहीं हैं। तब उसूलों की प्रधानता थी, जमीन छोड़ना लाजिमी नहीं था। अब हवा-हवाई और बातों की उड़ान है। जमीन से कोई वास्ता नहीं। रंग-रोगन के जरिये चेहरा बदलकर बदलाव का ढोल पीटने का शौक तारी है।

अपनी सनातन आभा और दूसरी कई खूबियों से दपदप करता बनारस बनावट की खोखली बयार में आ घिरा है। विचारों की शून्यता और भेड़ राग के वर्चस्व ने सोचने-समझने की क्षमता के सिरहाने कुंदता के गट्ठर रख दिए हैं। आम आदमी की अगुवाई करने वाला बौद्धिक तबका ठकुर सुहाती में इस कदर खो गया है कि लगता ही नहीं कि यह वही बनारस है जिसने विभिन्न माध्यमों से देश की अगुवाई की। अब न कोई बहस-बैठकी, न सवाल-जवाब, न तनी हुई मुट्ठियां, न विचारों की भिन्नता के बावजूद सच के पक्ष में खड़े होने का जज्बा और न दिखता है कुछ अलग करने का जुनून। फिर भी यही एक ऐसा शहर है जिसके आगे इतिहास भी सिर नवाता हुआ चलता है।

महात्मा गांधी और महामना मनमोहन मालवीय तो इस शहर के प्राण तत्व के रूप में बराबर यहां विराजमान रहते हैं। गांधी जी के हाथों स्थापित काशी विद्यापीठ और महामना मालवीय की अनुपम कृति काशी हिंदू विश्वविद्यालय इसके ज्वलंत गवाह हैं। व्यक्तित्व और विचारों के धनी इस शहर में मौजूदा दौर नरेंद्र मोदी का है।

महात्मा गांधी के नाम के पंख पर सवार होकर मोदी बनारस आए तो, किंतु उनके नाम से आरंभ की गई किसी भी योजना को धार नहीं दे पाए। वैसे, मोदी ने इसकी शुरुआत शाही अंदाज में की। गांधी जी की स्वच्छता नीति को आधार बनाकर प्रधानमंत्री ने बनारस से जिस स्वच्छता अभियान को आरंभ किया, उसका यहीं दम निकलता दिख रहा है। लोकसभा चुनाव तक तो फिर भी कुछ-कुछ होता रहा, मोदी के दोबारा लोकसभा सदस्य बनने के बाद से कूड़ा-करकट और चैतरफा गंदगी है। खासकर बनारस के पक्के महाल और मंदिर क्षेत्रों की दयनीय दशा आईना दिखाने के लिए पर्याप्त हैं।

रंगरोगन और बिजली की रंगबिरंगी झालरों से शहर को सजाने का सिलसिला ऊपरी तौर पर उल्लास का सबब हो सकता है। किंतु इसकी गलियों, मंदिर क्षेत्र और गंगा में गंदगी में कोई तब्दीली नहीं है। स्थिति उलटी हैः सफाई को लेकर लोगबाग सजग हैं, पर सरकारी मशीनरी बुरी तरह उदासीन है। झाड़ू उठाए सरकारी मशीनरी का टहलना देखा जा सकता है, पर सफाई नहीं दिखती। गंगा के साफ होने का दावा भी पुराना पड़ गया है। बाबतपुर एअरपोर्ट से शहर में दाखिल होने वाली सड़क बेशक नजीर के तौर पर सामने रखी जा सकती है, किंतु यह सोचना भी जरूरी है कि कतार के सबसे अंत में खड़े आदमी के लिए यह सड़क कितने काम की है जिनके लिए एअरपोर्ट आज भी किसी सपने जैसा है।

इसी तरह मोदी की महत्वाकांक्षी योजना में कमजोर वर्ग के कारीगरों, कुटीर उद्योग और हस्तकला से जुड़े लोगों की समृद्धि के लिए अवसर प्रदान करने के लिहाज से करोड़ों खर्च कर बनाया गया ट्रेड फैसिलेटेशन सेंटर भी पर्यटन अथवा देखने-सुनने का भवन बनकर रह गया है। यहां उन्हें प्रवेश ही नहीं मिल पाता जो उसके वाकई हकदार हैं। स्वच्छता की जिस इकाई को गांधी मलिन बस्तियों में पूर्णता और ईमानदारी के साथ लागू करने के पक्षधर थे, बनारस की इन बस्तियों में स्वच्छता, बस, एक पार्टी का पोस्टर बनकर रह गई है। शहर की जगतगंज और कोनिया की ऐसी बस्तियां कुछ ऐसा ही मंजर परोस रही हैं।

कुटीर-धंधे, छोटी और मंझोली आबादी की खुशहाली देखने का सपना पालने वाले गांधी को बनारस निराशा के एक हद तक ले जाता है। मूंगमाला, रुद्राक्ष की माला, मटर मोती, लकड़ी के खिलौने, आलता-बिंदी, भस्म, चूरण, अंचार- जैसे परंपरागत उद्यम तो औंधे मुंह जा गिरे हैं। जरदोरी और बनारसी साड़ी का कारोबार अपनी अंतिम सांसे गिन रहा है।

गांधी को बनारस में याद करते हुए खादी बहुत याद आती है। गांधी की सोच को जीने वाले कई ऐसे खादीधारी आज भी हैं जो दूसरा वस्त्र धारण ही नहीं करते। शहर के नामी चित्रकार बैजनाथ वर्मा उनमें से एक हैं। पचासी साल के वर्मा का मानना है कि आज की खादी में भी नफासत आ गई है। खादी का मजा तो मोटी खादी में है। उन्हें अंबर चरखा बहुत याद आता है। बनारस में करीब दर्जन भर ऐसी निजी इकाइयां हैं जो खादी के वस्त्र तैयार कर कुटीर उद्यम में लगी हैं। लेकिन उन्हें बराबर कब्जे में डूबा रहना पड़ता है।

बालकृष्ण की शहर के पांडेयपुर में खादी के कपड़े की दुकान है। उनका मानना है कि सरकार की ओर से खादी उद्यम के लिए निजी इकाइयों को प्रोत्साहित करना जरूरी है वरना आने वाले दिन बहुत अच्छे नहीं हैं। वह यह जरूर स्वीकार करते हैं कि नई पीढ़ी की रुचि खादी से इम्प्रेस है, पर हम धनाभाव में उसे पूरा नहीं कर पा रहे।

सत्य, अहिंसा और ईमानदारी- गांधी के ये हथियार भी बनारस में बासी-बासी से लगते हैं। सरकारी दफतर इनसे बेअसर हैं। कथित सदाचरण रूप बदलकर भ्रष्टाचार को शिद्दत से हवा दे रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, कोर्ट-कचहरी सभी जगह एक-जैसे हालात। आम आदमी को कोई राहत नहीं।

बनारस के नए पढ़े-लिखे तबके में वैचारिक उग्रवाद ने गांधी को हाशिये पर खड़ा कर दिया है। गांधी संस्थानों में भी अब सन्नाटा अधिक मिलता है। अपनी बात कहने में हिचक। राजघाट का गांधी केंद्र तो आधा विवादों में है। काशी विद्यापीठ में भी संख्या नाम भर की है।

बनारस को मजबूती से जीने वाले जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय, छपरा के कुलपति डॉ. हरिकेश सिंह की राय में, गांधी की नीतियां आज भी अनिवार्य हैं। बनारस में गांधी के सपने को पूरा करने की पूरी गुंजाइश है। पठन-पाठन में भी गांधी को ठीक तरह से लाना होगा। कुछ इसी तरह के विचार महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति डॉ. रजनीश शुक्ल के भी हैं। डॉ. शुक्ल बनारस में कुटीर उद्योग पर ध्यान देने को जरूरी मानते हैं। वह मानते हैं कि इस दिशा में जितना काम होना चाहिए, नहीं हो रहा। चंद्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया के कुलपति डॉ. योगेंद्र सिंह की मानें तो गांधी के चश्मे से बनारस को देखने की जरूरत है। विकास का असली चेहरा तब दिखेगा, जब यहां के कमजोर वर्ग का उत्थान हो।

किंतु गांधी अध्ययन केंद्र से जुड़े कुस्तुभ निर्मोक कुमुदलता के विचार उम्मीद की किरण से लगते हैं। इनका मानना है कि गांधी की सोच के रास्ते ही विकास की असली छवि हासिल की जा सकती है। आज नहीं तो कल, हमें उसी रास्ते पर चलना ही होगा। और सबसे अच्छी बात शहर के सेंट्रल स्कूल में नौवीं के छात्र आयुष चतुर्वेदी ने की। उसने स्कूल में अपनी स्पीच में गांधी को जरूरी बताते हुए चमत्कृत करने वाली बात कही- गांधी को हम समझ नहीं पाए। ठीक से पढ़ नहीं पाए। गांधी कभी नहीं मरते। उसके स्पीच की लोकप्रियता यह बताने के लिए काफी है कि बनारस में भी गांधी अब भी भीतर लोगों के मन में बसे हैं।

हिमांशु उपाध्याय के शुक्रिए के साथ नवजीवन से 

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