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एनआरसी पर गुमराह कर रही मोदी हुकूमत

हिसाम सिद्दीकी

शहरियत कानून, एनआरसी और एनपीआर यानि नेशनल सिटीजन्स रजिस्टर और नेशनल पापुलेशन रजिस्टर के मोदी सरकार के कामों की मुल्क भर में जबरदस्त मुखालिफत की वजह है, मोदी हुकूमत इन तीनों मामलात पर कन्फ्यूज्ड है। इन तीनों मामलात पर मुल्क को गुमराह किया जा रहा है या नोटबंदी की तरह शहरियत कानून, एनआरसी और एनपीआर को यह सरकार बगैर सोचे-समझे जल्दबाजी में लाई और अब इसे नाक का सवाल बनाकर इससे पीछे हटने को तैयार नहीं है।

शहरियत तरमीमी बिल पास कराने के वक्त होम मिनिस्टर अमित शाह ने बहुत ही सख्त लहजे में पार्लियामेंट के अंदर कम से कम छः बार कहा था कि शहरियत कानून के बाद पूरे देश में एनआरसी लाया जाएगा उससे पहले नेशनल पापुलेशन रजिस्टर बनेगा जो 2021 की मर्दुमशुमारी (जनगणना) से पहले मुकम्मल कर लिया जाएगा। अमित शाह ही नहीं तीस मई को मोदी के दोबारा वजीर-ए-आजम बनने के बाद पार्लियामेंट का जो मुश्तरका इजलास (संयुक्त अधिवेशन) हुआ था, उसमें सदर जम्हूरिया (राष्ट्रपति) ने भी अपने खुतबे (अभिभाषण) में साफ तौर पर कहा था कि उनकी सरकार देश में एनआरसी लाएगी। इस सिलसिले में पहला कन्फ्यूजन तब पैदा हुआ जब 22 दिसम्बर को रामलीला मैदान में एक रैली को खिताब करते हुए वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि एनआरसी आने का सवाल ही नहीं है।

एनआरसी लफ्ज पर हमारी सरकार में अब तक चर्चा भी नहीं हुई है। अब चार फरवरी को लोक सभा में अमित शाह के एक जूनियर वजीर नित्यानंद राय ने कांग्रेस के मनीष तिवारी, चंदन सिंह और नामा नागेश्वर राव के सवालात का तहरीरी जवाब देते हुए कहा कि उनकी सरकार ने अभी तक एनआरसी लाने का कोई फैसला नहीं किया है। उन्होने यह भी कहा कि नेशनल पापुलेशन रजिस्टर बनाने के दौरान शहरियों से कोई दस्तावेज नहीं मांगे जाएंगे।

होम मिनिस्टर अमित शाह ने दस दिसम्बर को लोक सभा में कहा था कि उनकी सरकार देश भर में एनआरसी लाएगी और घुसपैठियों को चुन-चुन कर देश से निकाला जाएगा। याद रहे कि इसी तरह जल्दबाजी में नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी का एलान कर दिया था बाद में उस फैसले में कम से कम सौ बार तरमीम (संशोधन) हुई होम मिनिस्ट्री में मिनिस्टर आफ स्टेट नित्यानंद राय ने यह तो कह दिया कि नेशनल पापुलेशन रजिस्टर बनाते वक्त किसी से कोई दस्तावेज नहीं मांगा जाएगा। लेकिन उन्होने यह भी नहीं बताया कि नेशनल पापुलेशन रजिस्टर का जो फार्म होगा उसमें कौन-कौन से कालम होंगे।

एक खबर यह है कि नेशनल पापुलेशन रजिस्टर में जो कालम बनाए गए हैं उसमें कई अहम मालूमात और दस्तावेज मांगे गए हैं, लेकिन फार्म के आखिर में एक नोट लिखा है कि अगर कोई शख्स दस्तावेज न देना चाहे तो उसकी उसे छूट होगी, यह उसकी मर्जी पर होगा कि वह दस्तावेज दिखाए या न दिखाए। सवाल यह है कि अगर दस्तावेज की जरूरत नहीं है तो फार्म में उसका जिक्र और कालम ही क्यों बनाए गए?

नित्यानंद राय ने यह कहा कि उनकी सरकार ने पूरे मुल्क में नेशनल सिटीजन्स रजिस्टर यानि एनआरसी लाने का कोई फैसला नहीं किया है। उन्होने यह नहीं बताया कि यह फैसला फिलहाल नहीं हुआ है या आगे कभी नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट के आर्डर पर असम में शहरियों का रजिस्टर (एनआरसी) तैयार किया गया।

उसपर तकरीबन सोलह सौ (1600) करोड का खर्च आया था, उसे तैयार करने में कई साल गुजर गए लेकिन रजिस्टर में पहले चालीस लाख और बाद में उन्नीस (19) लाख लोग शहरियत रजिस्टर से बाहर रह गए उनमें तेरह लाख से ज्यादा असम, बिहार और बंगाल के मजदूर तबके के लोग हैं। इतनी बडी तादाद में हिन्दू तबके के लोग शहरियत रजिस्टर से बाहर रह गए इस बात का इतना बुरा असर बीजेपी पर पड़ा कि उसकी समझ में यह नहीं आ रहा है कि  इस मसले से होने वाले सियासी नुक्सान की भरपाई कैसे की जाए?

असम में तेरह लाख से ज्यादा हिन्दुओं के एनआरसी से बाहर रह जाने की ही वजह है कि दिल्ली का शाहीन बाग हो, लखनऊ का घंटाघर या देश के दूसरे बड़े शहरों में हो रहे शहरियत कानून और एनआरसी मुखालिफ मुजाहिरों में मुसलमानों के साथ-साथ बड़ी तादाद में हिन्दू, सिख और ईसाई भी शामिल हो गए।

मोदी हुकूमत ने देश भर में चल रहे शहरियत कानून मुखालिफ मुजाहिरों को मुसलमानों के सर मढने की हर मुमकिन कोशिश कर डाली लेकिन देश के हिन्दुओं, सिखों और ईसाइयों ने सामने आकर सरकार की साजिश को नाकाम कर दिया। देश के हिन्दुओं को इस बात का पूरा एहसास है कि अगर देश भर में एनआरसी लागू हो गया तो उसकी जद में मुसलमानों के मुकाबले में कई गुना ज्यादा हिन्दू ही आ जाएगें। एक अंदाजे के मुताबिक अगर पूरे देश में एनआरसी लागू होगा तो देश के तकरीबन पैतालीस (45) फीसद लोग वह तमाम दस्तावेज पेश नहीं कर पाएंगे जो एनआरसी में शामिल होने के लिए जरूरी है।

शहरियत कानून आने के बाद भारतीय जनता पार्टी और पूरे आरएसएस कुन्बे ने देश भर में यह प्रोपगण्डा किया कि मोदी और अमित शाह इसी लिए शहरियत कानून लाए हैं कि इसके बाद जब एनआरसी हो तो उसमे छूटे हिन्दुओं को यह कह कर हिन्दुस्तान का शहरी मान लिया जाएगा कि वह लोग अपने मजहब की वजह से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए हैं।

यह प्रोपगण्डा इसलिए नहीं चल पाया कि शहरियत तरमीमी कानून में साफ तौर पर कहा गया है कि जो लोग 31 दिसम्बर 2014 तक हिन्दुस्तान में आ गए थे इस कानून के तहत उन्हें ही हिन्दुस्तान की शहरियत दी जाएगी। दूसरी एक अहम बात यह कि अगर एनआरसी से छूटे हिन्दुओं को बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से बताकर मुल्क की शहरियत देने की बात आएगी तो उन लोगों को इस बात का सबूत भी देना पडेगा कि वह बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए हैं यह सबूत वह लोग कहां से लाएंगे?

इसीलिए कहा जा रहा है कि शहरियत तरमीमी कानून एनआरसी तब्दील किए हुए नए फार्म के जरिए नेशनल पापुलेशन रजिस्टर तैयार किए जाने की कार्रवाई मुसलमानों से ज्यादा हिन्दुओं के खिलाफ है इसीलिए देश में एक अजीब किस्म की बेचैनी है। इस बेचैनी को नरेन्द्र मोदी और अमित शाह या तो समझ नहीं पा रहे हैं या सबकुछ समझते हुए अंजान बन रहे हैं।

मोदी का यही रवैय्या नोटबंदी के वक्त भी रहा था। नोटबंदी का एलान करते वक्त कहा था यह कदम उन्होने काला धन सामने लाने, दहशतगर्दी रोकने और फर्जी कम्पनियों का पता लगाने के लिए उठाया है। बाद में तीनों बातें गलत साबित हो गई तो वह मुसलसल अपना मौकुफ (स्टैण्ड) बदलते रहे नोटबंदी का फैसला गलत साबित हो चुका है लेकिन अब तक नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी के लोग किसी भी कीमत पर यह बात तस्लीम करने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसा ही कुछ हाल शहरियत कानून और एनआरसी का है।

नोटबंदी के बाद बीजेपी के लोग मुल्क के गरीब हिन्दुओं को यह समझाने में कामयाब हो गए थे कि नोटबंदी से गरीबों के मुकाबले अमीरों को परेशानी ज्यादा हुई है लेकिन एनआरसी के मामले में उनकी यह दलील आम हिन्दुओं के गले नहीं उतर रही हैं।

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