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शिकस्त से खौफजदा मोदी

हिसाम सिद्दीकी

नई दिल्ली: लोक सभा चुनाव सर पर आते ही बीजेपी के सर्वेसर्वा और वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी पर शिकस्त का खौफ साफ नजर आने लगा है। इसी खौफ का नतीजा है कि बिहार की लोक सभा सीटांं की तकसीम के मामले में मोदी और अमित शाह ने नितीश कुमार और रामविलास पासवान के सामने घुटने टेक दिए। चालीस लोक सभा सीटों में नितीश कुमार ने सत्रह और पासवाल ने छः सीटें ले लीं जबकि मौजूदा लोक सभा में नितीश के सिर्फ दो मेम्बर हैं। बीजेपी ने 2014 में बाइस सीटें जीती थीं अब वह सत्रह पर ही लड़ेगी।

राम विलास पासवान के लिए कहा जाता है कि आने वाले एलक्शन का नतीजा क्या होगा इसका अंदाजा लगाने में वह शातिर हो चुके हैं। इसीलिए उन्होने लोक सभा की छः सीटों के अलावा अपने लिए राज्य सभा की भी एक सीट पक्की कर ली बीजेपी ने अब उन्हें असम से या बिहार से राज्य सभा पहुंचाने का फैसला किया है।

खबर है आरएसएस के अपने नेटवर्क के अलावा मोदी सरकार की तकरीबन सभी खुफिया एजेंसियों ने रिपोर्टें दी हैं कि 2014 के मुकाबले नरेन्द्र मोदी की मकबूलियत (लोकप्रियता) तकरीबन आधी रह गई है। इसका जबरदस्त असर लोक सभा एलक्शन पर पड़ने वाला है और मोदी की कयादत में बीजेपी अब बमुश्किल सौ से डेढ सौ तक सीटेंं ही जीत पाएगी। इतनी सीटें जीतने पर मोदी की सत्ता में वापसी किसी भी तरह मुमकिन नहीं है।

इन खबरों से वैसे तो पूरा आरएसएस कुन्बा सख्त परेशान है लेकिन सबसे ज्यादा खौफ खुद मोदी पर तारी हो चुका है। क्योंकि वह हर हाल में इस साल अप्रैल-मई में होने वाले लोक सभा एलक्शन जीत कर सत्ता में अपनी वापसी चाहते हैं। वैसे तो 2018 में हुए नौ रियासतों के असम्बली इंतेखाबात में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह मिलकर अपनी पार्टी को सिर्फ एक छोटी सी रियासत त्रिपुरा में ही कामयाबी दिला पाए, लेकिन उन्हें सबसे गहरी चोट राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ असम्बली के एलक्शन हारने से लगी। छत्तीसगढ भी छोटी रियासत है असम्बली की नव्वे सीटें हैं। नरेन्द्र मोदी अमित शाह और उत्तर प्रदेश के वजीर-ए-आला योगी आदित्यनाथ ने मिलकर छत्तीसगढ में सौ से ज्यादा रैलियां कीं इसके बावजूद सिर्फ पन्द्रह सीटेंं ही जीत सके।

छत्तीसगढ में मुस्लिम वोटर भी तीन से चार फीसद के दरम्यान हैं। इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि मुस्लिम वोटरों के कांग्रेस के साथ चले जाने की वजह से वहां बीजेपी हार गई। छत्तीसगढ की शिकस्त इस बात का सुबूत है कि अब हिन्दुओं की अक्सरियत भी नरेन्द्र मोदी और उनकी बीजेपी के खिलाफ हो चुकी है। बारह नवम्बर से सात दिसम्बर तक जिन पांच प्रदेशों के असम्बली एलक्शन हुए उनमें वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने जितनी भी रैलियां कीं और रैलियों के जरिए जितनी असम्बली सीटों पर जाकर तकरीरें कीं उन सीटों में से सिर्फ साढे सात फीसद सीटें ही जीती हैं।

यही हाल उत्तरप्रदेश के वजीर-ए-आला योगी आदित्यनाथ का रहा। उन्होने राजस्थान की जिन पैंतीस सीटों पर जाकर हिन्दुत्व और मंदिर के नाम पर वोट मांगे उन पैंतीस सीटों में से भारतीय जनता पार्टी सिर्फ पांच सीटेंं ही जीत सकी। तेलंगाना और छत्तीसगढ में तो नतीजे इससे बहुत ज्यादा खराब साबित हुए हैं। मतलब साफ है कि अब हिन्दू भी मोदी के झांसे में फंसने के लिए तैयार नहीं हैं।

घबराहट में नरेन्द्र मोदी और उनकी पूरी पार्टी ने एक बार फिर हिन्दुत्व का सहारा लेने की कोशिश की है। लेकिन पार्टी के तमाम लीडरान कन्फ्यूज से दिखते हैं। आरएसएस चीफ मोहन भागवत समेत पूरा आरएसएस कुन्बा जल्द से जल्द मंदिर बनाने की बात कर रहा है साथ में कुछ लोग यह भी कह देते हैं कि अदालत जो फैसला करेगी उसपर अमल किया जाएगा।

इसी दरम्यान मोदी के वजीर कानून रविशंकर प्रसाद ने सुप्रीम कोर्ट को हिदायत देने के अंदाज में अयोध्या मामले की फौरन सुनवाई करने के लिए कहा। रविशंकर प्रसाद ने यह भी एलान कर दिया कि नेशनल लॉ कमीशन बनाकर वह और उनकी सरकार अदलिया (न्यायपालिका) में भी दलितों को रिजर्वेशन देना चाहती थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने लॉ कमीशन की तजवीज मंजूर नहीं की और दलितों को रिजर्वेशन देने का सरकार का इरादा पूरा नहीं हो सका।

भारतीय जनता पार्टी की शिकस्त की आवाजें हर तरफ से आती सुनाई दे रही हैं। ग्यारह दिसम्बर 2017 से ग्यारह दिसम्बर 2018 तक सिर्फ एक साल में कांग्रेस के सदर की हैसियत से राहुल गांधी ने न सिर्फ खुद को साबित किया है बल्कि पार्टी को मुस्लिम परस्त पार्टी के टैग से बाहर निकालने और बार-बार जीत दर्ज कराने का काम किया है। पहले गुजरात के एलक्शन में राहुल गांधी ने नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को दिन में तारे दिखाने का काम कर दिया था। अगर एलक्शन मुहिम के आखिरी दिनों में नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान, मुसलमान और अपने जाती मामलात में जज्बाती तकरीरें करने का काम न किया होता तो बीजेपी गुजरात की सत्ता से बाहर हो जाती। गुजरात एलक्शन के दौरान कांग्रेस के राज्य सभा मेम्बर मणिशंकर अय्यर ने नरेन्द्र मोदी के एक बयान पर बोलते हुए कह दिया था कि नरेन्द्र मोदी तो नीच इंसान हैं।

मोदी ने उनकी इस बात को पूरी तरह भुनाया। बार-बार अपनी तकरीरों में कहा कि कांग्रेस ने उन्हें नीच जात कहा है। उन्होने बार-बार पाकिस्तान का नाम लेकर कहा दिल्ली में मणिश्ांकर अय्यर के घर में बैठ कर पाकिस्तानी लीडरान ने गुजरात में बीजेपी को हराने की हिकमते अमली (रणनीति) बनाई उस मीटिंग में साबिक वजीर-ए-आजम डाक्टर मनमोहन सिंह भी शामिल थे। इस किस्म की जज्बाती बातें करके मोदी ने शहरों की सीटेंं जीत लीं थीं तब भी सौ सीटेंं जीत नहीं पाए थे और बडी मुश्किल से गुजरात सरकार बचा पाए थे।

पंजाब का एलक्शन हुआ तो राहुल गांधी की कयादत में ही कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने जीत कर सरकार बना ली। मई में कर्नाटक असम्बली का एलक्शन हुआ तो वहां कांग्रेस अपनी सरकार नहीं बचा पाई तो एक इंतेहाई होशियारी भरे कदम के जरिए उन्होने जनता दल सेक्युलर के साथ साझा सरकार बना कर वहां भी बीजेपी को सत्ता पर काबिज होने का मौका नहीं दिया। जिन राहुल गांधी को बीजेपी और मोदी ने पप्पू कह कर कम अक्ल साबित करने की कोशिश की तो उसी पप्पू ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ की सरकारें खुद को होशियार बताने वाले नरेन्द्र मोदी से छीन ली।

नरेन्द्र मोदी खौफजदा हैं इसका सबसे बड़ा सुबूत बिहार में ही देखने को मिला। राम विलास पासवान की पार्टी ने 2014 में मोदी के साथ मिलकर सात सीटों पर लोक सभा का एलक्शन लड़ कर छः सीटें जीती थी। अब पासवान इस बात पर अड़ गए कि वह सात से कम सीटें नहीं लेंगे लेकिन बीजेपी की जानिब से साफ कह दिया गया था कि पासवान की लोकजन शक्ति पार्टी को पांच से ज्यादा सीटेंं नहीं दी जा सकतीं। यह भी कहा गया कि जनता दल यूनाइटेड को सोलह सीटें दी जाएगी एक सीट राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को दी जाएगीं। बीजेपी की इसी जिद की वजह से राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के लीडर उपेन्द्र कुशवाहा ने मोदी का एनडीए और वजारत दोनों को ठुकरा दिया। इनके एनडीए छोडते ही पासवान के बेटे चिराग पासवान ने भी आंखें दिखानी शुरू कर दी। उन्होने फौरन एक खत फाइनेंस मिनिस्टर अरूण जेटली को लिखकर पूछा कि नोटबंदी से जो फायदे हुए हों वह बता दिए जाए। साथ ही चिराग पासवान ने यह भी इशारा किया कि वह भी यूपीए के साथ जा सकते हैं।

चिराग का बयान आते ही पूरे आरएसएस खेमे में हड़कम्प मच गया। चंद घंटों के अंदर अमित शाह और मोदी दोनों ही नितीश कुमार और रामविलास पासवान की तमाम शरायत तस्लीम करने के लिए तैयार हो गए। अपनी जीती हुई बाइस सीटों में से भी पांच सीटें भी छोड़ दी। इतना ही नहीं बीजेपी रामविलास पासवान को राज्य सभा की सीट भी देने के लिए तैयार हो गई।

रामविलास पासवान को अंदाजा है कि आने वाले लोक सभा में बिहार से एनडीए का पूरी तरह सफाया होने वाला है। इसीलिए वह अपने लिए राज्य सभा की सीट चाहते थे ताकि दिल्ली में वह जनपथ रोड का अपना बारह नम्बर का सरकारी मकान बचाए रख सकें। मोदी और अमित शाह ने पासवान को एनडीए में बरकरार रखने के लिए उनकी यह शर्त भी तस्लीम कर ली।

अब पासवान बीजेपी के वोटों की ताकत पर राज्य सभा जाएंगे और बिहार की पिछली बार जीती हुई अपनी सभी छः सीटां पर एलक्शन भी लडेगे। मोदी और अमित शाह ने एनडीए की कमान संभालने के बाद कभी भी इतना दब कर किसी के साथ कोई समझौता नहीं किया। इसीलिए कहा जा रहा है कि लोक सभा एलक्शन से छः महीने पहले ही नरेन्द्र मोदी अपनी होने वाली बडी सियासी शिकस्त से खौफजदा हैं।

मोदी और अमित शाह के एनडीए में अब ज्यादा पार्टनर भी नहीं बचे पंजाब के अकाली दल है जिसका सियासी जनाजा ऐसा निकल चुका है कि 2014 की मोदी लहर में भी सिर्फ दो सीटे ही जीत सका था।

महाराष्ट्र में शिवसेना है जो रोज आंखें दिखाती है। अब तो उद्धव ठाकरे ने भी मोदी के मुकाबले राहुल गांधी को ज्यादा बड़ा लीडर बता दिया है। बिहार में नितीश कुमार और रामविलास पासवान हैं तो नितीश कुमार सीटों की मनमानी तकसीम कराने के बाद भी भागने की फिराक में हैं अगर लालू यादव उन्हें दुबारा अपने साथ लेने को तैयार हो जाएं तो वह फौरन एनडीए छोड़ देगे।

बिहार के बाद महाराष्ट्र में भी नरेन्द्र मोदी अपनी कुछ सीटें बचाने की गरज से उद्धव ठाकरे की शर्तों पर ही शिवसेना से समझौता करके सीटां की तकसीम करने के लिए तैयार बताए जाते हैं। अगर दोनों मिलकर लडे तो शायद दस से पन्द्रह तक सीटें जीत लें वर्ना कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी मिलकर इस बार प्रदेश से इनका सफाया कर देगी।

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