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नज़रिया: ढाई सैनिकों से हारी मोदी फौज

हिसाम सिद्दीकी
एक उद्धव ठाकरे, दूसरे संजय राउत और सियासी मैदान में अभी आधे आदित्य ठाकरे इन ढाई श्वि सैनिकों ने बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह, पार्टी के वर्किंग सदर जे पी नड्डा और महाराष्ट्र के इंचार्ज भूपेन्द्र यादव और ऐसे ही मोदी फौज व आरएसएस की भारी भरकम फौज को महाराष्ट्र की सियासत में धूल चटा दी। चौबीस अक्टूबर को असम्बली एलक्शन के नतीजे आए थे लेकिन खबर लिखे जाने तक दो हफ्ते गुजर जाने के बावजूद शिवसेना के ढाई सैनिको ने मोदी की मर्जी के मुताबिक देवेन्द्र फण्डनवीस को दोबारा वजीर-ए-आला का हलफ नहीं लेने दिया।

शिवसेना का मौकुफ (दृष्टिकोण) बिल्कुल साफ रहा कि असम्बली में उनकी सीटें भले ही बीजेपी से कम हैं लेकिन प्रदेश के अगले वजीर-ए-आला शिवसेना के आदित्य ठाकरे ही होंगे, उन्हीं की कयादत में सरकार बनेगी। शिवसेना के संजय राउत ने नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को सीधे-सीधे धमकी देते हुए यह तक कह दिया कि वह लोग महाराष्ट्र में न तो सदर राज (राष्ट्रपति शासन) लगाने की कोशिश करें और न ही दूसरे प्रदेशों की तरह ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स मोहकमों का इस्तेमाल करके हिमायत हासिल करने की कोशिश करें। महाराष्ट्र में हरियाणा की तरह कोई दुष्यंत नहीं है जिसका बाप जेल में हो और बीजेपी उसके धमकाकर उसकी मदद से सरकार बना ले। इस दरम्यान शिवसेना ने एनसीपी चीफ और सीनियर मराठा लीडर शरद पवार के जरिए कांग्रेस से भी राब्ता (सम्पर्क) कायम कर लिया और यह दावा किया कि शिवसेना को 175 मेम्बरान असम्बली की हिमायत हासिल है।

महाराष्ट्र में चल रही सियासी उठा-पटख का नतीजा कुछ भी हो लेकिन दोनों तरफ से तनातनी जिस हद तक पहुंच गई उससे इतना तो साफ है कि देवेन्द्र फण्डनवीस को दोबारा वजीर-ए-आला बनाने का ख्वाब पूरा नहीं होने वाला है। अब या तो कांग्रेस और एनसीपी की मदद से पहली बार मुंतखब होकर असम्बली पहुंचे बाला साहब ठाकरे के पोते आदित्य ठाकरे वजीर-ए-आला बनेंगे या बीजेपी-शिवसेना फिर इकट्ठा होकर सरकार बनाएगी तो भी वजीर-ए-आला आदित्य ठाकरे ही होंगे।

याद रहे कि इस बार बीजेपी और शिवसेना ने मिलकर असम्बली का एलक्शन लड़ा था तो बीजेपी महज 105 सीटें जीत सकी, शिवसेना ने 56 सीटें जीती, हालांकि 2014 में जब दोनों अलग-अलग चुनाव लड़े थे तो बीजेपी ने 122 और शिवसेना ने 63 सीटें जीती थीं। शिवसेना का दावा है कि महाराष्ट्र में बीजेपी के पैर उखड़ चुके हैं। अगर वह शिवसेना के साथ मिलकर एलक्शन न लड़ती और शिवसेना के वोट उसे न मिलते तो वह इस बार पचास सीटें भी नहीं जीत पाती। ऐसी सूरत में वजीर-ए-आला का ओहदा बीजेपी को देने का कोई जवाज (औचित्य) नहीं है।

दरअस्ल सारी गड़बड़ 24 अक्टूबर को उसी वक्त से शुरू हो गई थी जब पहली बार के मुकाबले सत्रह सीटें कम जीतने के बावजूद वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने दिल्ली में अपनी पार्टी के सदर दफ्तर में बुलाए गए जीत के जश्न के जलसे में तकरीर करते हुए यह कहा कि हरियाणा और महाराष्ट्र में उनकी पार्टी को बेमिसाल (अभूपूर्व) कामयाबी मिली है। इस कामयाबी का सारा क्रेडिट महाराष्ट्र के वजीर-ए-आला देवेन्द्र फण्डनवीस और हरियाणा के वजीर-ए-आला मनोहर लाल खट्टर को जाता है, इसीलिए यह दोनों दोबारा अपने-अपने प्रदेशों के वजीर-ए-आला बनेंगे। शिवसेना मोदी के इसी बयान से भड़क गई उसका कहना था कि दोनों पार्टियों के जीते हुए मेमबरान असम्बली और पार्टी लीडरान की मीटिंग बुलाए बगैर नरेन्द्र मोदी ने अपनी तरफ से देवेन्द्र फण्डनवीस को वजीर-ए-आला बनाने का एलान कैसे कर दिया। वजीर-ए-आजम मोदी को शायद यह अदाजा नहीं था कि उनकी बात शिवसेना को इतनी बुरी लग लाएगी और शिवसेना उनके फैसले के खिलाफ भी जा सकती है।

जहां तक एनसीपी चीफ शरद पवार का सवाल है अगर वह शिवसेना के साथ खड़े हो गए तो कांग्रेस भी उनके साथ ही दिखाई देगी। शिवसेना को पूरा यकीन है कि शरद पवार बीजेपी को सबक सिखाने और महाराष्ट्र को मुस्तहक हुकूमत फराहम करने के लिए शिवसेना की सरकार जरूर बनवाएंगे। सोनिया गांधी से मुलाकात करने के अगले दिन छः नवम्बर को शरद पवार ने कहा था कि उन्हें अवाम ने अपोजीशन में बैठने का मैनडेट दिया है सरकार बनाने का मैनडेट शिवसेना और बीजेपी को मिला है इसलिए वह दोनों मिलकर सरकार बनाएं।

शरद पवार के लिए कहा जाता है कि वह जो कहते हैं वह कभी नहीं करते, बल्कि जो करते हैं वह कभी नहीं कहते। इसलिए आम लोगों को यही उम्मीद है कि वह शिवसेना की ही सरकार बनवाएंगे। खबर यह भी है कि कांग्रेस ने शिवसेना की सरकार बनाने के एवज में स्पीकर का ओहदा अपनी पार्टी के किसी मेम्बर के लिए मांगा है एनसीपी अगर शिवसेना की सरकार बनवाती है तो खुद भी उसमें शामिल होगी या बाहर रहकर उसकी हिमायत करेगी, यह कोई नहीं बता सकता। यह बात सिर्फ और सिर्फ शरद पवार ही जानते हैं।

बीजेपी शायद इतनी लम्बी मुद्दत तक शिवसेना का इंतजार नहीं करती और दूसरी तमाम रियासतों की तरह मेम्बरान असम्बली की तोड़-फोड़ करके अपनी सरकार बना लेती। लेकिन यहां मामला चूंकि शिवसेना के साथ है जिसके मेम्बरान को तोड़ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

अव्वल तो शिवसेना के मेम्बरान असम्बली खुद ही अपनी पार्टी से अलग नहीं होते, दूसरे अगर किसी ने अलग होने की गलती की तो शिवसेना के बाकी लोग उसे अपने तरीके से सबक सिखाने का काम करते हैं और शिवसेना का अपना तरीका बहुत ही खतरनाक होता है। इसलिए बीजेपी महाराष्ट्र में मजबूरन शिवसेना के फैसले के इंतजार में दिखी नतीजा जो भी होगा शिकस्त बीजेपी की ही होनी है।

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