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बीजेपी के लिए मैदान में माया

हिसाम सिद्दीकी

तीन बार राजस्थान कैबिनेट की सिफारिश टालने के बाद गवर्नर कलराज मिश्रा ने राजस्थान असम्बली का एजलास (सत्र) बुलाने की इजाजत दे दी। चौदह अगस्त को एजलास शुरू होगा। गवर्नर के रोल पर पूरे मुल्क में उंगलियां उठ रही थीं। तमाम सियासतदां गवर्नर पर इल्जाम लगा रहे थे कि अपनी पुरानी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली में बैठे लीडरान के इशारे पर काम करके गवर्नर कलराज मिश्रा न सिर्फ सियासी एखलाकियात (नैतिकता) भूल रहे हैं बल्कि बार-बार रियासती काबीना की सिफारिश ठुकरा कर संविधान की धज्जि’यां उड़ाने का भी काम कर रहे हैं। गवर्नर के इस फैसले के बाद वजीर-ए-आला अशोक गहलौत ने इत्मीनान की सांस ली, अब यह तय हो गया है कि फिलहाल उनकी सरकार लूटने वाले अपने मंसूबों में कामयाब नहीं होंगे।

राजस्थान की इस सियासी उठा-पटक ने इतना जरूर साफ कर दिया कि दलित मुस्लिम इत्तेहाद के बहाने मुसलमानों के वोट ठगने वाली मायावती अब पूरी तरह से भगवा रंग में डूब चुकी हैं। मर्जी से या गले-गले तक बेईमानी में डूबी होने की वजह से खुद को और दोनों हाथों से लूटे हुए कालेधन को इनकम टैक्स, इनफोर्समेंट डायरेक्ट्रेट (ईडी) और सीबीआई से बचाने के लिए वह पूरी तरह से वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी की बंधुआ मजदूर बनकर रह गई हैं।

2018 के असम्बली एलक्शन में मायावती की बहुजन समाज पार्टी के छः मेम्बरान जीत कर आए थे। यह सभी छः मेम्बरान असम्बली एक साल पहले कांग्रेस में शामिल हो गए थे। तभी से यह सभी बीएसपी के बजाए कांग्रेस के मेम्बर हो चुके हैं। अब एक साल बाद मायावती की आंखें खुलीं तो उन्होंने एलान कर दिया कि उनकी पार्टी के सभी छः मेम्बरान का कांग्रेस में शामिल होना गैर कानूनी था। उन्होंने अपने सभी छः मेम्बरान को नोटिस जारी करके हिदायत दे दी कि वह असम्बली में कांग्रेस के खिलाफ वोट दें।

राजस्थान में मायावती भारतीय जनता पार्टी के साथ हो चुकी हैं। अब यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है। हां उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में वह अभी पूरी तरह खुल कर बीजेपी के साथ तो नहीं आई हैं लेकिन कई महीनो से उनकी तमाम सरगर्मियां और बयानात इस बात की शहादत जरूर देते हैं कि वह बीजेपी के ही साथ हैं। उधर बीजेपी भी खुल कर मायावती के साथ खड़ी दिख रही है। राजस्थान बीजेपी के मेम्बर असम्बली मदन दिलावर राजस्थान हाई कोर्ट में बहुजन समाज पार्टी के कांग्रेस में शामिल होने वाले छः मेम्बरान असम्बली को वापस बीएसपी में लाने के लिए तीन बार पिटीशन दाखिल कर चुके हैं। उन्होने कोर्ट से दरख्वास्त की कि बीएसपी के छः मेम्बरान को कांग्रेस में शामिल किए जाने के असम्बली स्पीकर के फैसले को रद्द किया जाए।

अब मायावती ने भी कहा है कि अशोक गहलौत ने उनके सभी छः मेम्बरान असम्बली को कांग्रेस में गैर कानूनी (असंवैधानिक) तरीके से शामिल किया है। अब अगर जरूरत पड़ी तो वह सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगी। वह पहले भी अदालत जा सकती थीं लेकिन उन्हें मुनासिब वक्त का इंतजार था।

दिल्ली में बीजेपी आला कमान के नजदीकी जराए से जो खबरें मिली हैं वह राजस्थान के वजीर-ए-आला अशोक गहलौत और कांग्रेस के लिए काफी हौसलाबख्श हैं। खबर है कि इतनी मुद्दत में बीजेपी ने हर मुमकिन कोशिश कर ली लेकिन कांग्रेस से धोकेबाजी करने वाले सचिन पायलेट समेत उन्नीस से ज्यादा कांग्रेसी मेम्बरान असम्बली किसी भी कीमत पर टूटने के लिए तैयार नहीं हैं।

सचिन के साथ जो 18-19 मेम्बरान हैं उनमें भी अक्सरियत उनकी है जो किसी भी कीमत पर कांग्रेस छोड़ कर बीजेपी में शामिल होने के लिए तैयार नहीं हैं। असम्बली में बीजेपी के अपने मेम्बरान की तादाद बहत्तर (72) ही है। तीन आजाद मेम्बरान असम्बली बीजेपी के साथ हैं। उन्हें शामिल करके पचहत्तर (75) हो जाते हैं। 75 को एक सौ एक तक पहुंचा पाना पार्टी के लिए मुमकिन नहीं दिखा। इसीलिए पार्टी आला कमान ने गवर्नर को इस बात के लिए हरी झण्डी दे दी कि वह अशोक गहलौत को असम्बली का एजलास (सत्र) बुलाने की इजाजत दे देंं।

इस पूरे मामले में सियासी एतबार से अपनी पार्टी और हाई कमान से धोकेबाजी करने वाले सचिन पायलेट ही सबसे ज्यादा खसारे में रहने वाले हैं। अगर उनके साथ छुपे सभी उन्नीस मेम्बरान असम्बली से इस्तीफा दे देते हैं या डिसक्वालीफाई हो जाते हैं तो भी असम्बली में अक्सरियत के लिए नव्वे (90) मेम्बरान की जरूरत होगी और अशोक गहलौत के साथ उस हालत में भी बान्नवे (92) मेम्बरान रहेंगे। बीजेपी के लिए 75 से 93 तक पहुचना मुमकिन नहीं होगा।

इस तरह सचिन पायलेट के सामने एक ही रास्ता बचता है कि वह अपनी पार्टी सदर सोनिया गांधी, जनरल सेक्रेटरी प्रियंका गांधी और राहुल गांधी से मिल कर अकेले में उनसे अपनी गलती की माफी मांग लें और पार्टी व चीफ मिनिस्टर अशोक गहलौत की शरायत पर पार्टी मे रहकर खामोशी के साथ काम करते रहें और मुनासिब मौका मिलने का इंतजार करें।

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