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कुंदन शाह होने का मतलब….. 

 

प्रकाश के रे

 

सिनेमा और टेलीविज़न के बेहद मक़बूल नाम कुंदन शाह के काम का मूल्यांकन आसान नहीं है. उन्हें एक ऐसे फ़िल्मकार के तौर पर भी देखा जा सकता है जिसने बहुत थोड़े से काम के बूते हमारी सिनेमाई तारीख़ में अपनी जगह पक्की कर ली. ‘जाने भी दो यारो’, ‘कभी हाँ कभी ना’ और ‘क्या कहना’ जैसी फ़िल्में तथा ‘ये जो है ज़िंदगी’, ‘सर्कस’, ‘नुक्कड़’ और ‘वागले की दुनिया’ जैसे धारावाहिकों की चर्चा के बिना बीती सदी के हिंदुस्तानी सिनेमा के आख़िरी दशकों की दास्तान मुक्कमल ही नहीं हो सकती है.

फ़िर यह सवाल भी उठता है कि वो कौन-सी वज़हें रही होंगी कि अपने दौर के कई मशहूर कलाकारों को तराशनेवाले कुंदन शाह की फ़िल्मों की फ़ेहरिश्त बड़ी क्यों नहीं है. इस सवाल का जवाब हमें सिनेमा उद्योग के ताने-बाने में मिल सकता है जहाँ मुनाफ़ा, होड़ और कुछ अलग से आम तौर पर एलर्जी है. कुंदन शाह को नज़दीक से जाननेवाले लोग बताते हैं कि उनकी आलमारी में पड़े अनेक स्क्रिप्ट परदे पर उकेरे जाने का इंतज़ार करते रहे.

वो तो भला हो नेशनल फ़िल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन का जो उसने शाह को सात लाख रुपये दे दिये थे और जिनके एवज़ में उन्होंने हमें ‘जाने भी दो यारो’ जैसी फ़िल्म दी जो आज क़रीब तीन दशकों के बाद भी दर्शकों को पसंद आती है. ‘कल्ट’ का शक़्ल अख़्तियार कर चुकी इस फ़िल्म का उल्लेख करते हुए यह भी ज़ेहन में रखना चाहिए कि इसके बनने के वक़्त से अब तक मनोरंजन के हिसाब-किताब बहुत बदल चुके हैं.

दूरदर्शन के उन एकाधिकार के दिनों में उन्होंने कामयाब धारावाहिक बनाये, पर जैसे ही टेलीविज़न का विस्तार हुआ और धारावाहिकों के रंग-ढंग बदले, ‘वागले की दुनिया’ के दिन लद चुके थे. इस कोने से जब हम कुंदन शाह को देखते हैं, तो मनोरंजन और टीवी-सिनेमा का एक वैकल्पिक इतिहास की रूप-रेखा उभरती है. हाल के अपने साक्षात्कारों में वे कहते भी थे कि आज न तो फ़िल्म कॉरपोरेशन ‘जाने भी दो यारो’ के लिए धन देगा और न ही फ़िल्मों को प्रदर्शन का सर्टिफ़िकेट देनेवाला बोर्ड ऐसी फ़िल्म को पास करेगा.

सात लाख रुपये उस समय के हिसाब से भी मामूली रक़म होते थे. शाह ने पुणे फ़िल्म संस्थान के अपने साथियों को जुटाया, जिन्हें शूटिंग के लिए कपड़े-लत्ते और सामान अपने घर से लाना होता था. चूँकि उन सबमें जवानी का ज़ोश और कुछ करने का हौसला था तथा कुंदन शाह का अपने प्रोजेक्ट को लेकर प्रतिबद्धता थी, और फ़िर फ़िल्म कॉरपोरेशन का दबाव भी था- फ़िल्म बन गयी. पर, व्यावसायिक रूप से वह असफल रही.

बहरहाल, फ़िल्म को समीक्षकों ने सराहा और उसे राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला. बाद में फ़िल्म ने चाहे ‘कल्ट’ का रुतबा हासिल कर लिया या नये-नवेले कलाकारों-सहकर्मियों के लिए फ़िल्मी दुनिया में जगह बनाने का रास्ता खोल दिया, परंतु कुंदन शाह को अगली फ़िल्म के लिए सालों इंतज़ार करना पड़ा. हास्य-व्यंग्य के अलहदा स्टाइल के ज़रिये जीवन के अलग-अलग पहलुओं को टटोलने की उनकी समझ हमारे निर्माताओं को रास नहीं आयी. ऐसे में शाह को टेलीविज़न की ओर देखना पड़ा.

आम आदमी की रोज़ाना की ज़द्दोज़हद को केंद्र में रख कर बनाये गये उनके धारावाहिक दर्शकों को गुदगुदाते हुए भीतर तक भिगोने लगे. अस्सी के दशक का दर्शक आज भी उनके धारावाहिकों को याद कर मुस्करा देता है. ‘टाइमलेस’ और ‘क्लासिक’ जैसे टर्म जिन कुछेक समकालीन सिनेमाई शख़्सियतों पर लागू हो सकते हैं, तो उनमें कुंदन शाह का नाम ज़रूर शुमार है. कुंदन शाह की फ़िल्मों और धारावाहिकों में आम नागरिक और उसकी मुश्किलों के पेश करने का जो सादा ढंग है, वही ढंग उनके अपने जीवन का रहा.

कमीज़-पतलून में लिपटी उनकी सादगी कहीं से यह संकेत नहीं देती थी कि यह आदमी ग्लैमर की उसी दुनिया का वासी है जहाँ मेक-अप और दिखावा टिक पाने की ज़रूरी शर्तें हैं. अपरिचितों से भी सरलता से संवाद करना और संवाद के लिए समय निकालना उनकी ख़ासियत थी. मेरी दो मुलाक़ातें इस दावे की गवाह हैं.

पुणे फ़िल्म संस्थान में जब छात्रों का आंदोलन हुआ, तो शाह उनके साथ खड़े हुए. विरोध में उन्होंने अन्य कुछ फ़िल्मकारों के साथ उन्होंने अपना राष्ट्रीय पुरस्कार भी लौटाया. सेंसर बोर्ड के बेमानी रोक-टोक पर भी वे सवाल उठाते रहे. नयी प्रतिभाओं के हौसले को दम देने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे. उनके व्यक्तित्व के ये पहलू उन्हें ख़ास बना देते हैं. उनका कहना था कि वे हास्य में सिर्फ़ इसलिए दिलचस्पी नहीं रखते कि इससे लोगों को हँसाया जा सकता है, बल्कि वे इसे एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर जीवन और समाज की विसंगतियों को रेखांकित करने की कोशिश करते थे.

वे हास्य-व्यंग्य की विधा को कई तरह से परदे पर उकेर सकने की क़ाबिलियत रखते थे. ‘जाने भी दो यारो’ में जहाँ ब्लैक कॉमेडी, फार्स, एब्सर्ड के आयाम हैं, वहीं ‘नुक्कड़’ या ‘वागले की दुनिया’ में रोज़ाना की घिच-पिच ही हास्य पैदा करने के लिए काफ़ी थी. ‘कभी हाँ कभी ना’ में हास्य का अलग रंग है, तो ‘क्या कहना’ में वह अनुपस्थित ही है. बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह पीट चुकीं उनकी कुछ फ़िल्में कई मायनों में ख़ारिज़ की जा सकती हैं. पर, उनमें भी कुंदन शाह की प्रतिभा की चमक देखी जा सकती है.

आज उनकी अनुपस्थिति में सिर्फ़ उन्हें और उनके काम को याद करना काफ़ी नहीं होगा. उनकी सलाहियत का पूरा फ़ायदा न उठा पाने का अफ़सोस भी किया जाना चाहिए. फ़िल्म और टेलीविज़न की ख़ामियों पर भी नज़र डालना चाहिए और उन्हें दूर करने की कोशिश होनी चाहिए ताकि कुंदन शाह जैसे जीनियस को हम यूँ ही ज़ाया न होने दें.

(लेखक सिनेमा,सामाजी और सियासी मुद्दों के जानकार हैं।)