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कश्मीरः मोदी-वाजपेयी और दो रमज़ानों की कहानी

शाहनवाज़ आलम

हिंसा के दुष्चक्र में फंसे कश्मीर में रमज़ान का महीना दोनों पक्षों की तरफ से अमन को एक और मौका देने का अच्छा बहाना हो सकता था लेकिन इसे संघर्षरत पक्षों ने गंवा दिया। जिससे यह पिछले करीब दो दशकों में सबसे खूनी रमज़ान बनता जा रहा है। अमन की आकांक्षा रखने वाले स्थानीय लोगों और कूटनीतिज्ञों के लिए यह स्थिति मोदी सरकार के उस दावे के विपरीत है कि भाजपा नीत राजग सरकार अपने पूर्ववर्ती वाजपेयी सरकार की कश्मीर नीति को ही आगे बढ़ा रही है। लिहाज़ा, अमन और मसले के राजनीतिक हल के समर्थकों के लिए मौजूदा रमज़ान 17 साल पहले के रमज़ान की याद दिला रहा हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यह तुलना बहुत वाजिब है।

दरअसल, सन 2000 के रमज़ान में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा एकतरफा संघर्ष विराम की घोषणा से आखिरी बार कश्मीरियों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री के प्रति उत्साह और उम्मीद जगी थी। वहीं मोदी अपनी कश्मीर नीति के कारण कष्मीरियों की नजर में सबसे नफरत किए जाने वाले प्रधानमंत्री की छवि रखते हैं। इसलिए दो रमज़ानों के बीच तुलना कश्मीर के सवाल को हल करने में दो प्रधानमंत्रियों के रणनीतिक कौशल,जनता के प्रति निष्ठा और इतिहास की समझ के फ़र्क के बतौर भी रेखांकित होगा।

हालांकि, इन दोनो रमज़ानों में काफी फर्क है और कश्मीर का मिजाज़ अब निश्चत तौर पर वैसा नहीं है। लेकिन बावजूद इसके अलगाववाद के स्थाई स्वर होने के कारण कोई क्वालिटेटिव फर्क उसे नहीं माना जाएगा। फर्क बस इतना है जैसा कि मीरवाईज़ उमर फारूक ने अपने एक हालिया इंटरव्यू में कहा कि ‘पहले कश्मीरी लोग दिल्ली से नाराज़ थे और अब वे दिल्ली से नफरत करते हैं’। ऐसे में अटल बिहारी वाजपेयी का वह साहसिक कदम जिसने न सिर्फ अलगाववादी राजनीति को भी बैकफुट पर कर दिया था बल्कि पाकिस्तान के सामने भी कश्मीरियों के लिए प्रासंगिक बने रहने का संकट खड़ा कर दिया था, आज भी नई दिल्ली को गाईड कर सकने की क्षमता रखता है। जिससे नफरत को कम से कम कम तो किया ही जा सकता है। बशर्ते की मोदी सीख लेना चाहें।

अलगाववादियों से बातचीत

दरअसल, 2000 के सितंबर में पड़े रमज़ान के महीने में इस घोषणा ने 2002 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए ज़मीन तैयार कर दी थी जिससे लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर कश्मीर में चुनावी प्रक्रिया पटरी पर आ पाई थी। जबकि आज हम सुन रहे हैं कि सरकार वहां विधान सभा चुनाव करा पाने की सफलता के बावजूद तीन साल में ही राष्ट्रपति शासन के विकल्प पर सोचने लगी है।

यानी जिस सफलता को पिछली एनडीए सरकार ने अपनी सलाहियत से प्राप्त कर लिया था उसे मोदी सरकार अपनी गलतियों से खोने की क़गार पर खड़ी है। इसी तरह अगर हम चरमपंथ के संदर्भ में देखें तो वाजपेयी सरकार की ट्रैक टू पॉलिसी की ये कामयाबी थी कि 24 जुलाई 2000 को हिजबुल मुजाहिद्दीन के नंबर 2 नेता अब्दुल मजीद डार न सिर्फ दिल्ली से बातचीत करने को तैयार हुए बल्कि उन्होंने अपने संगठन की तरफ से एक तरफा संघर्ष विराम की घोषणा भी की थी।

हिंसा ग्रस्त कश्मीर में यह अजूबा पहली बार हुआ था और वो भी उस चरमपंथी संगठन की तरफ से जो हिंसक कार्यवायियों का नेतृत्वकर्ता था। इस ऑफर को नई दिल्ली ने भी स्वीकार करते हुए अपनी तरफ से भी तीन महीने के संघर्ष विराम की घोषणा की थी। बातचीत के इस माहौल को इतना जनसमर्थन मिला था कि पाकिस्तान में रह रहे हिज्ब प्रमुख और 1987 के बदनाम चुनाव में ‘हराए’ गए सैयद सलाहुद्दीन ने भी संघर्ष विराम और बातचीत का समर्थन किया।

आशा भरे इस माहौल में 3 अगस्त 2000 को केंद्रिय गृह राज्य सचिव कमल पांडेय गृहमंत्रालय के दूसरे अधिकारियों के साथ माजिद डार द्वारा नियुक्त चार कमांडरों और उनके एक अन्य वार्ताकार फजल हक कुरैशी की श्रीनगर के नेहरू गेस्ट हाउस में बात-चीत हुई। जिससे लगा कि इस पेचीदा मसले को सुलझाने की अगर वास्तव में ईमानदार पहल हो तो सफलता मिल सकती है।

पाकिस्तान की कूटनीतिक हार

इस वार्ता को मिले समर्थन से पाकिस्तान और आईएसआई को लगा था कि अगर कश्मीर खुद अपनी समस्या को हल करने के लिए दिल्ली से बातचीत करने लगेंगे तो इससे कश्मीर मुद्दे के भारत के आंतरिक मामला होने की छवि जाएगी। जो भारत का औपचारिक पक्ष भी रहा है। इस तरह हिज्बुल मुजाहिद्दीन जो कि कश्मीर का देसी चरमपंथी संगठन है और जिसका नेतृत्व राजनीतिक लोगों के हाथ रहा है, का वार्ता में शामिल होना पाकिस्तान के इस मसले को तृपक्षीय ढंग से उठाने की रणनीति के खिलाफ जाता था। जिसके कारण पाकिस्तान ने तुरंत इस कूटनीतिक गलती को दुरूस्त करते हुए सैयद सलाहुद्दीन पर दबाव डाला कि वे पीछे हट जाएं। जिसके बाद 8 अगस्त यानी 5 दिन बाद ही हिज्ब ने युद्ध विराम की अपनी घोषणा वापस ले ली।

लेकिन शायद पहली बार कश्मीर की आवाम और चरमपंथी आंदोलन के नेताओं खास कर माजिद डार को यह एहसास हुआ था कि वे पाकिस्तान पर निर्भर हुए बिना भी खुद नई दिल्ली से दो पक्षीय बातचीत कर के हल निकाल सकते हैं। कश्मीरियों में बनी इस समझदारी को तत्कालीन वाजपेयी सरकार ने समझने में देर नहीं की और अपनी तरफ से सैयद सलाहुद्दीन की युद्ध विराम की घोषणा के वापस लेने के
बावजूद होई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी।

जिसका परिणाम यह हुआ कि माजिद डार और कश्मीरी आवाम को कष्मीर मसले को बातचीत से हल करने में पाकिस्तान के मुकाबले भारत ज्यादा इच्छाशक्ति दिखाता लगा। इस धारणा के कारण ही माजिद डार दिल्ली से वार्ता के लिए लगातार अलगाववादी नेताओं को तैयार करते रहे और लोगों के बीच भी इसके लिए जनमत बनाते रहे जिसका परिणाम जनवरी 2004 में उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और अलगाववादी हुरियत नेतृत्व के बीच बातचीत के बतौर दिखा। दरअसल भारत के उस कूटनीतिक दांव ने पाकिस्तान की प्रासंगिकता ही खत्म कर दी थी जिसके कारण न सिर्फ माजिद डार बल्कि उनके वार्ताकारों हामिद तांतरे और फारूक मिर्चा को अपनी जान गंवानी पड़ी।

वहीं फज़ल हक कुरैशी एक जानलेवा हमले में बस किसी तरह बच पाए। इस तरह एक इमानदारी भरी कूटनीतिक पहल ने काफी हद तक न सिर्फ कश्मीर और नई दिल्ली के बीच रिश्तों की जमी बर्फ पिछला दी थी बल्कि पाकिस्तान इस पूरी कवायद से कटाव में चला गया था।

रमजान 2000
हालांकि हिजबुल मुजाहिदीन के युद्ध विराम से पीछे हटने की स्थिति में स्वाभाविक भारतीय प्रतिक्रिया यही मानी जाती कि वो भी इससे हट जाए। लेकिन शायद यही वो समय भी था जब नई दिल्ली को अपना बड़प्पन साबित करना था और वाजपेयी ने इतिहास को निराष नहीं किया। लेकिन ये कैसे हुआ ये जानना भी  रोचक होगा।

 

पिछले साल आई पूर्व रॉ प्रमुख एएस दुलत ने अपनी किताब ‘कश्मीरः द वाजपेयी’ ईयर्स में जिक्र किया है कि एक दिन माकपा के विधायक यूसुफ तारीगामी उनसे मिलने पहुंचे और कहा कि ईद आने वाली है कुछ करवा दीजिए। जिस पर दुलत ने कहा था कि सीज़फायर तो हुआ था लेकिन हिज्ब पीछे हट गया है। ऐसे में हम क्या कर सकते हैं? जिस पर कश्मीर के एकमात्र वामपंथी विधायक ने उन्हें सुझाव दिया कि आप अपनी तरफ से एकतरफा सीज़फायर क्यों नहीं घोषित कर देते। जिसके बाद दुलत ने प्रधान मंत्री वाजपेयी को यह सुझाव दिया जो उन्हें पसंद आया और उन्होंने इसे एक अवसर की तरह देखा।

दरअसल, वाजपेयी के इस कदम को कश्मीरियों ने आश्चर्य से देखा क्योंकि वाजपेयी जिस संघ परिवार से आते थे वो भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की वकालत करता है। यहां यह हर वक्त याद रखने की जरूरत है कि भारत के साथ कश्मीर का समझौता एक सेक्यूलर देश के बतौर हुआ था। इस बुनियाद पर कश्मीरियों को वाजपेयी ने आष्वस्त किया था कि वे संघ परिवार से आने के बावजूद इस ‘करारनामे’ का सम्मान करेंगे।

वहीं एक साम्यवादी दल के विधायक जो संघ परिवार के सबसे तीखे वैचारिक विरोधी माने जाते हैं के सुझाव और उस पर अपने अधिकारियों की राय को माना और अमली जामा पहनाया वह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वाजपेयी इस मुद्दे पर न सिर्फ सबकी सुनते थे बल्कि सबको साथ ले चलने की क्षमता भी रखते थे।

रमजान 2017

वहीं अगर मोजूदा पीएम मोदी को देखें तो उनकी छवि एक ऐसे प्रधानमंत्री की है जो किसी भी मसले पर न तो अपनी कैबिनेट के मंत्रियों की राय लेते हैं और ना ही अफसरषाहों की। जबकि पूर्व राष्ट्रीय सलाहकार एमके नारायणन और पूर्व रॉ चीफ दुलत लगातार अपने लेखों और साक्षात्कारों में यह सुझाव दे रहे हैं कि मसले के राजनीतिक हल के बारे में नहीं सोच कर सरकार नुकसान में जा रही है।

दरअसल, ऐसी धारणा बनती जा रही है कि कश्मीर मसले पर मोदी के पास कोई सकारात्मक ब्लू प्रिंट नहीं है और वो पूरी तरह सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल पर निर्भर हैं। जिन्हें कश्मीरी उनके संघ परिवार के करीबी विवेकानंद फाउंडेषन से जुड़ाव के कारण नापसंद करते हैं। किसी ठोस ब्लू प्रिंट की कमी इससे भी पुष्ट होती है कि पिछले दिनों मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने आनन-फानन में मोदी से मुलाकात तो की लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला।

वे सिर्फ यही कहती चली गईं कि प्रधानमंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया है कि जैसे ही शांति बहाल होगी सरकार कुछ सोचेगी। ज़ाहिर है, किसी भी सरकार और उसके नेतृत्व की सलाहियत इससे आंकी जाती है कि वो खुद प्रतिकूल स्थितियों में सूझबूझ और रचनात्मक हस्तक्षेप से शांति बहाल करेगी। वो नियती के भरोसे नहीं रहेगी।

दो मुख्तलिफ ज़मीर के कैदियों की तुलना
पिछले दिनों एक इंटरनव्यू में जब जेकेएलएफ नेता यासीन मलिक ने वाजपेयी और मोदी में फर्क बताते हुए कहा कि वाजपेयी जहां चाहते थे कि कश्मीरी उन्हें प्यार से याद करें वहीं मोदी चाहते हैं कि कश्मीरी उनसे डरें, तब वो इन दो रमजानों के बीच नई दिल्ली के एप्रोच में आए बदलाव की तरफ इशारा कर रहे थे। लेकिन सवाल है कि क्या मोदी सिर्फ चाहने भर से वाजपेयी हो जाएंगे?

दरअसल, हर इंसान की तरह वाजपेयी और मोदी भी एक ही विचारधारा के वाहक होते हुए भी अपने अलग-अलग ज़मीर के कैदी हैं। वाजपेयी का यह ज़मीर जहां उन्हें मुस्लिम टोपी पहनने से नहीं रोकता था तो वहीं रमज़ान में मुस्लिम बहुल कश्मीर की धार्मिक भावानाओं को सम्मान करते हुए एकतरफा सीज़फायर के लिए भी प्रेरित करता था। लेकिन मोदी का जमीर वाजपेयी के ठीक विपरीत प्रवृत्तियों पर टिका है।
दोनों अपने ज़मीर की कैद से आजाद हो कर वे नहीं रह जाएंगे जो वो हैं। इसीलिए कश्मीर 2017 के रमजान को सिर्फ राजनीतिक संकट के बतौर नहीं देख पाएंगे वे बहुत हद तक उसे एक व्यक्तित्व की समस्या के बतौर भी रेखांकित करेंगे। जिसने एक त्रासदी को प्रहसन में तब्दील कर दिया है।

(लेखक रिहाई मंच के नेता हैं)

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