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नज़रिया: मोदी सरकार के गले की हड्डी बन गया कश्मीर

हिसाम सिद्दीकी

पूरे कश्मीर को जेल में तब्दील करके वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने पांच अगस्त को कश्मीर को खुसूसी दर्जा देने वाली आईन (संविधान) की दफा-370 को खत्म तो कर दिया लेकिन कश्मीर में 87 दिनों से बंद रहने वाले अवाम के बड़े पैमाने पर हो रही इंसानी हुकूक की पामाली (मानवाधिकारों का हनन) की वजह से दुनिया भर में हो रही बदनामी से निपटने के लिए सरकार के पास कोई ठोस हिकमते अमली (रणनीति) नहीं है।

पच्छिमी मुल्कों के मीडिया में भारत के खिलाफ चल रही जबरदस्त मुहिम, 22 अक्टूबर को पूरा दिन अमरीकी कांग्रेस (पार्लियामेंट) में हुई जबरदस्त बहस से दबाव में आई मोदी सरकार ने बीजेपी के हामी दिल्ली के एक एनजीओ की मादी शर्मा के जरिए सत्ताइस (27) यूरोपीय पार्लियामेंट मेम्बरान को बुलाकर कश्मीर दौरा कराने का काम किया जो सरकार के लिए उल्टा पड़ा क्योकि जिन पार्लियामेट मेम्बरान को बुलाया गया उनमें तकरीबन आधे इटली के थे। पांच के अलावा बाकी सभी ऐसे थे जो न सिर्फ इस्लाम और मुस्लिम मुखालिफ रहे हैं बल्कि हिटलर, नाजी और मुसोलोनी के ख्यालात पर अमल करने वाले हैं।

मोदी सरकार को इस सिलसिले में एक बड़ा झटका यूरोपियन वफ्द (प्रतिनिधि मण्डल) के कश्मीर दौरा शुरू होने से पहले उस वक्त लग गया। जब उत्तर-पच्छिम इंग्लैण्ड के मेम्बर पार्लियामेट क्रिस डेविस ने इस वफ्द में शामिल होने से यह कह कर इंकार कर दिया कि वह कश्मीर में हो रही इंसानी हुकूक की पामाली को छुपाने के भारत सरकार के झूटे प्रोपगण्डे में शामिल नहीं होना चाहते। जो सत्ताइस मेम्बरान पार्लियामेंट दिल्ली पहुंचे उनमें से भी चार ने क्रिस डेविस की तरह यह कह कर कश्मीर जाने से इंकार कर दिया कि सख्त सिक्योरिटी पहरे मे कैदी बनकर कश्मीर नहीं देखना चाहते। अगर उन्हें आजादी के साथ अपनी मर्जी मुताबिक घूमने और लोगों से मिलकर उनका हाल-चाल मालूम करने की इजाजत होती तो वह जरूर जाते। यह कहकर वह चारों दिल्ली से ही अपने वतन वापस चले गए।

देश के तमाम अपोजीशन लीडरान को एयरपोर्ट से वापस करके और कश्मीर के तमाम सियासतदानों को जेलों में डालकर यूरोपीय यूनियन के 23 मेम्बरान पार्लियामेंट को कश्मीर में सैर और वहां का वाजवान और बिरयानी खिलाकर वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने खुद ही यह बात वाजेह कर दी कि उनका राष्ट्रवाद कितना नकली है। सत्तर सालों से भारत ने इस बात पर सख्ती से अमल किया कि कश्मीर हमारा अंदरूनी मामला है। पाकिस्तान के साथ तनाजा (विवाद) की वजह से इसे हम दोनों मुल्कों का बाहमी मामला मानते हैं लेकिन मोदी ने यूरोपीय यूनियन के एक खास जेहनियत के मेम्बरान पार्लियामेंट को बुलाकर इसे इंटरनेशनल बनाने का ‘पाप’ किया है।

इन मेम्बरान पार्लियामेंट का दौरा एक ऐसे एनजीओ ने कराया है जिसके आरएसएस से नजदीकी रिश्ते बताए जाते हैं। डेलीगेशन में आने वाले तमाम यूरोपीयन पार्लियामेंटेरियन नाजी और हिटलर के मानने वाले और मुस्लिम मुखालिफ जेहन के रहे हैं। भारत सरकार ने इस डेलीगेशन की मुलाकात महबूबा मुफ्ती की पीडीपी से निकाले हुए एक ऐसे शख्स से भी कराई जो दहशतगर्दों को फाइनेस करने का मुल्जिम रहा है। यूरोपियन यूनियन के पार्लियामेंटेरियन के इस दौरे पर कांग्रेस लीडरान राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, एमआईएम चीफ असद उद्दीन ओवैसी, बीएसपी चीफ मायावती समेत अपोजीशन लीडरों ने तो सख्त मुखालिफत की ही, बीजेपी के सुब्रमण्यम स्वामी ने भी इसे मुल्की मफाद के खिलाफ बताया।

कश्मीर का मामला चूंकि इंतहाई गैर जिम्मेदारी व आरएसएस और उसी जेहन के लोगों को खुश करने के लिए हड़बड़ी में दफा-370 हटा कर नए सिरे से पैदा किया गया है। इसलिए अब यह मामला नरेन्द्र मोदी सरकार के गले की हड्डी बन गया है। दुनिया की आंखां में धूल झोंकने की नाकाम कोशिश के तहत यूरोपीय यूनियन के मेम्बरान पार्लियामेंट को एक एनजीओ के जरिए बुलाया गया। इस कोशिश पर दौरा शुरू होने से पहले उस वक्त पानी फिर गया जब शुमाल मगरिब (उत्तर-पच्छिम) इंग्लैण्ड के मेम्बर पार्लियामेंट क्रिस डेविस ने दुनिया को यह बताया कि उन्हें भी इस डेलीगेशन में शामिल होने की दावत मिली थी तो उन्होने सवाल किया कि क्या हमें कश्मीर में सिक्योरिटी के बगैर अपनी मर्जी मुताबिक कहीं भी जाने और किसी से भी मिलने की इजाजत होगी। इसके लिए भारत सरकार तैयार नहीं हुई तो मैंने डेलीगेशन में शामिल होने से यह कहकर इंकार कर दिया कि मैं भारत सरकार के इंटरनेशनल पबि्ीलक रिलेशन प्रोग्राम मे शामिल होने के लिए तैयार नहीं हूं।

देश और दुनिया की आंखों में कश्मीर के सिलसिले में धूल झोंकने की कोशिश और मोदी मैनेजमेट को उस वक्त भी एक जबरदस्त झटका लगा जब यूरोपीयन यूनियन के मेम्बरान पार्लियामेंट का वफ्द (प्रतिनिधि मंण्डल) डल झील मे सख्त सिक्योरिटी के दरम्यान शिकारों पर सैर करते हुए कश्मीरी खाने का लुत्फ उठा रहा था, ठीक उसी दिन यूनाइटेड नेशन्स ने भारत सरकार को एडवाइजरी जारी करके कहा कि आम कश्मीरियों के इंसानी हुकूक (मानवाधिकार) को बहाल करने का काम फौरन किया जाए। दूसरी तरफ सरकार और इंटेलीजेंस एजेसियों की सारी पोल पट्टी भी खुल गई जब उसी दिन श्रीनगर के नजदीक पुलवामा में दहशतगर्द एक बार फिर हमला करने में कामयाब हो गए। इससे पहले बाइस अक्टूबर को पूरा दिन अमरीकी कांग्र्रेस (पार्लियामेट) में कश्मीर के मामले पर सख्त बहस होती रही, उसी अमरीकन पार्लियामेंट मे जिस अमरीका के सदर डोनाल्ड ट्रम्प की खुशामद में सिर्फ एक महीना पहले बाइस सितम्बर को वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ह्यूस्टन के एनआरजी स्टेडियम में ट्रम्प की शान में कसीदे पढ रहे थे और यह तक नारा लगा आए थे कि ‘अगली बार ट्रम्प सरकार’। यह तमाम वाक्यात इस बात का सुबूत हैं कि मोदी और उनकी हुकूमत कश्मीर मामले में पूरी तरह नाकाम हो गई है।

यूरोपीय यूनियन के मेम्बरान पार्लियामेंट का कश्मीर दौरा इसलिए भी महज एक स्पासर्ड (प्रायोजित) ड्रामा साबित हुआ कि इन मेम्बरान को वजीर-ए-आजम जैसी सिक्योरिटी के दायरे में घुमाया गया। वह अपनी मर्जी से कहीं जा नहीं सके किसी कश्मीरी से मिलकर उसका हाल नहीं मालूम कर सके। इंतेहा यह कि इस वफ्द ने न तो नजरबंद फारूक अब्दुल्लाह से मुलाकात की न महबूबा मुफ्ती न ही वह स्कूल कालेज जाकर यह देख सके कि बच्चे पढने भी आते हैं या नही? और न ही आम आदमियों से मिल कर उनका दुख-दर्द मालूम कर सके। यह मेम्बरान पार्लियामेंट जिस दिन कश्मीर की सैर कर रहे थे उस वक्त तक कश्मीरियों के घरों में बंद रहने के सत्तासी दिन गुजर चुके थे। घरों में बंद रहने की वजह से आम लोगों की जिंदगी अजाब हो चुकी है। कश्मीर के व्यापारियों और दीगर लोगों मे से चुनिंदा लोगों को लाकर यूरोपीय यूनियन के लोगों से मुलाकात जरूर कराई गई है लेकिन उसका कोई मुसबत (सकारात्मक) नतीजा नहीं निकला।

मोदी सरकार ने हडबडी में गैर संवैधानिक तरीके से दफा-370 खत्म करके रियासत को दो हिस्सों में तकसीम करके दोनो को यूनियन टेरिटरी तो बना दिया लेकिन इससे आम लोगों पर कोई असर नहीं डाल सकी। इंतेहा यह है कि अब कश्मीर वादी से ज्यादा जम्मू के वह लोग भी खुद को मोदी के जरिए ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं जिन्होने जम्मू रीजन की दो-तिहाई से ज्यादा असम्बली सीटें बीजेपी को जिता दी थी। अब जम्मू के आम हिन्दुओं में यह खौफ पैदा हो गया है कि दफा-370 खत्म होने के बाद मुल्क के बाकी हिस्सों से बडी तादाद में आकर लोग जम्मू की जमीनों और जायदाद पर कब्जा कर लेंगे, उनके रहन-सहन का तौर तरीका और उनकी अपनी सकाफत (संस्कृति) भी तबाह हो जाएगी। आम कश्मीरी चूंकि बीजेपी का एतबार नहीं कर रहा है यही वजह है कि बीजेपी ने बीडीसी कौसिल के जो एलक्शन करवाए उसमें 310 सीटों में से बीजेपी सिर्फ 81 सीटें जीत सकी है। बाकी सब आजाद उम्मीदवार जीते है। कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेस, पीडीपी और सीपीएम समेत सभी गैर बीजेपी सियासी पार्टियों ने इन इंतखाबात का बायकाट किया था।

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