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राम मंदिर पर अध्यादेश न लाना आपकी संवैधानिक और राजनैतिक मजबूरी है मोदी जी

उबैद उल्लाह नासिर

विगत दिनों अपने साक्षात्कार में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने यह साफ़ कर दिया की वह अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए कोई अध्यादेश लाने नहीं जा रहे उन्होंने कहा की उनकी सरकार जो भी करेगी वह सुप्रीम कोर्ट से फैसला आ जाने के बाद करेगी इसके साथ ही उन्होंने बड़ी चतुराई से गेंद कांग्रेस के पाले में फेंकते हुए कहा की कांग्रेस अपने वकीलों को रोके की वह इस मुकदमे में अड़ंगे बाज़ी न करें मोदी जी समेत बीजेपी और संघ परिवार के सभी नेता पत्रकार और आम आदमी अच्छी तरह जानता है की जो भी वकील होता है उसका पहला फ़र्ज़ अपने मोवक्किल के पक्ष में अदालत का फैसला कराना होता है यह उसकी दलीय प्रतिबधता नहीं बल्कि पेशेवराना ज़िम्मेदारी है इस लिए इस मामलें में कांग्रेस को अकारण घसीट कर मोदी जी यह बताने की कोशिश कर रहे हैं की कांग्रेस के कारण इस मुकदमे का फैसला जल्दी नहीं हो रहा है यह सही है कि कपिल सिब्बल ने अदालत से यह प्रार्थना की थी की इसका फैसला २०१९ के आम चुनाव बाद किया जाए ताकि कोई भी पक्ष इसका राजनैतिक इस्तेमाल न कर सके लेकिन सिब्बल जी ने यह अपील अपने मोवक्किल यु पी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की तरफ से की थी न अपनी निजी हैसियत में और न ही कांग्रेस पार्टी की ओर से I

राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश न लाने का फैसला मोदी जी ने मजबूरी वश किया है संविधान और न्याय व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबधता के कारण नहीं,मोदी जी को पता है की इस मामले पर लाया गया अध्यादेश असंवैधानिक और न्याय व्यवस्था के विरुद्ध होगा क्योंकि अदालत में चल रहे मुकदमें में फैसले से पहले अध्यादेश लाने का न कोई अब तक का रिकॉर्ड है और न ही यह सम्भव है यदि मंत्रीमंडल अपनी जिद और हठधर्मी के चलते यह अध्यादेश जारी भी कर दे तो संविधान के संरक्षक के तौर पर राष्ट्रपति इसे अपनी मंज़ूरी नहीं देंगे और अगर मंत्रीमंडल दोबारा या तिबारा भी यह अध्यादेश उनके पास भेजे तो वह इस पर कानूनी राय लेने के नाम पर अनिश्चित समय तक रोक सकते हैं और यदि राष्ट्रपति भी संवैधानिक प्रतिबद्धता के बजाए दलीय प्रतिबद्धता के कारण इस अध्यादेश को मंजूरी दे भी देते हैं तो सुप्रीम कोर्ट में यह अध्यादेश पहली पेशी में ही खारिज हो जायेगा क्योंकि स्नाविधान विशेषकर बुनियादी अधिकारों के विरुद्ध है जिसे सुप्रीम कोर्ट अक्षुण कह चुका है दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है की NDA का कोई घटक इस मामले में बीजेपी के साथ नहीं खड़ा होगा और यह अध्यादेश NDA का कुम्बा बिखरा भी सकता है जनता दल यू,लोकजन शक्ति पार्टी बीजू जनता दल ऐ आई डी एम के ही नहीं अकाली दल तक इस अध्यादेश का विरोध करेंगी पिछले दिनों एक टी वी डिबेट में अकाली दल के सांसद नरेश गुजराल ने अल्पसंख्यकों विशेष कर मुसलमानों को ले कर बीजेपी और मोदी योगी सरकार के रवय्ये पर गहरी नाराजगी जताई थी ज़ाहिर है की मोदी योगी की मुस्लिम दुश्मनी अब उसके साथियों को भी बर्दाश्त नहीं हो रही है I

जहां तक राम मंदिर को ले कर आस्था की बात है सुप्रीम कोर्ट साफ़ कर चुका है की उसके सामने यह मुक़दमा आस्था आदि को ले कर नहीं है अदालत को किसी व्यक्ति या समूह की आस्था से कोई मतलब नहीं होता यह मुकदमा उसके सामने ज़मीन के विवाद का है और वह उसी हिसाब से उसका फैसला करेगी सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 10जनवरी को होगी और तब वह तय करेगा की कैसी बेंच बनाई जाए और यह मुकदमा किस महत्त्व के अनुसार सुना जाय I

मोदी जी ने अपने इंटरव्यू में एक पांसा और फेंका है और इशारा दिया है की वह राम मंदिर के सिलसिले में फैसले के बाद कानून बना सकते हैं अर्थात राम मंदिर के नाम पर पहले जनता उन्हें २०१९ में फिर प्रधान मंत्री बनवाये उसके बाद वह कानून बनायेंगे यहाँ भी वह तमाम समस्याएं उनके सामने आएँगी जो राम मंदिर पर अध्यादेश लाने में आ रही है अव्वल तो उन्हें ज़मीन एक्वायर करने में समस्या आयेगी क्योंकि एक वर्ग की इबादतगाह की जमीन एक्वायर कर के दुसरे वर्ग का पूजास्थल बनाने के लिए देना संविधान के खिलाफ है दुसरे ज़मीन केवल जन हित के कार्यों के लिए एक्वायर की जा सकती है और पूजा स्थल का निर्माण जनहित की श्रेणी में नहीं आता

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