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‘भारत को अंग्रेज़ों से नहीं मुसलमानों से आज़ादी चाहिए थी ?’

ज़ैन शम्सी

हम जिस से स्वतंत्र हुए, वह तो विदेशी थे और ग़ैर ज़िम्मेदार थे लेकिन सोचने की बात यह है कि हम आज जब अपनों की सरकार में हैं,वह अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह निभा रहा है या नहीं। क्या वह ज़िम्मेदार है, क्या वह किसी के प्रति जवाबदेह है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत के आखिरी वायसराय लार्ड माउन्ट बेटन सही थे, क्या वे इतने दूरगामी थे कि उन्हें इस बात का विश्वास था कि भारत स्वतंत्र तो हो रहा है, लेकिन यह अपनी स्वतंत्रता संभाल कर नहीं रख सकेगा? क्या उन्हें इस बात का एहसास था कि भारत ने जिस तरह से स्वतंत्रता ली है और जिस तरह धर्म के नाम पर दो टकड़ों में विभाजित हुआ, वह स्वतंत्रता का मतलब समझ ही नहीं सका। क्या वे जानते थे कि आजादी के बाद पाकिस्तान भी अपने आप को नहीं संभाल सकेगा और भारत भी कभी अपने इस चिंता से मुक्त नहीं हो पाएगा, जो हिंदू और मुसलमानों के बीच फूट का कारण बनी है।

आज भारत की स्वतंत्रता के दिन इस बात को लेकर इसलिए बैठा हूँ कि स्थिति यही बता रहे हैं कि 1947 में हम केवल अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुए थे, मानसिक गुलामी आज भी हमारी रगों में जानलेवा वायरस की तरह दौड़ रही है। विभाजन ने एक तरफ तो भारत का दाहिना हाथ काट लिया था, दूसरी ओर भारत के मुसलमानों का दिल और दिमाग भी दो भागों में बांटकर ले गई .. इसीलिए दाग दाग उजाला लेकर आई स्वतंत्रता की सुबह दो व्यक्ति की आंखों में नींद जागती रही थी। वे दो व्यक्ति थे गांधी और अबुल कलाम आज़ाद।

यह दोनों जानते थे कि स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए जो बलिदान दिए गए हैं, स्वतंत्रता के बाद भी इस से अधिक क़ुर्बानियों की ज़रुरत पड़ेगी। पाकिस्तान जाने वाले पाकिस्तान चले गए, लेकिन यहाँ भारत के मुसलमानों ने नेहरू और गांधी पर विश्वास किया और उन्हें अपना नेता स्वीकार कर लिया, यहाँ तक कि भारत में बचे मुसलमानों को नौकरी में आरक्षण की नेहरू की पेशकश मुस्लिम नेताओं ने इसलिए ठुकरा दी कि उन्हें विश्वास था कि जो व्यवहार यहाँ के हिन्दुओं के साथ किया जाएगा, वही मुसलमानों के साथ भी उचित रखा जाएगा।

मानो भारतीय मुसलमानों ने इस देश को अपना समझा और अपने भाइयों और रिश्तेदारों को बिछड़ते हुए देखकर भी हिंदू भाइयों को ही अपना भाई समझा कि जानते थे कि हम दोनों ने मिलकर आजादी की लड़ाई जीती है और अब इस स्वतंत्रता में किसी और की भागीदारी नहीं होनी चाहिए। नेहरू और गांधी पर उनका विश्वास पुख्ता था, और निस्संदेह नेहरू ने उनके विश्वास की मूर्ति को ध्वस्त होने नहीं दिया।

नेहरू जब तक जीवित रहे, उन्हों ने मुसलमानों में कोई भेदभाव नहीं होने दिया लेकिन उनकी मौत के बाद वह विध्वंसक शक्तियां जो खूफ़िआ तौर पर एक भी मुसलमान को भारत में सहन नहीं कर पा रही थीं, किसी न किसी रूप में सिर उठती चली गयी। ये वह शक्तियां थीं जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्त करने में कोई योगदान नहीं दिया था, यहाँ तक कि अंग्रेजों की चापलूसी और जासूसी में व्यस्त थे, लेकिन आजादी के बाद वह पूरे भारत को अपना स्वामित्व समझ बैठे थे।

वह अपना काम इस तरह कर रहे थे कि नेहरू को भी इस बात का एहसास नहीं हो सका कि आखिर उनका खेल क्या है। आरएसएस और हिंदू महासभा के ये लोग मुसलमानों के खिलाफ गुप्त सेना बना रहे थे, जब सरदार बल्लभ भाई पटेल ने इस संगठन पर प्रतिबंध लगाया तो संगठन ने तुरंत माफी मांग ली कि वह राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेगा बल्कि सांस्कृतिक गतिविधियाँ जारी रखेगा। उस की इस चाल को भी कांग्रेस नहीं समझ पायी ।

उस ने  संस्कृति के नाम पर भोले-भाले हिन्दुओं का मुसलमानों के खिलाफ मन बनाने काम जारी रखा  और अपने ही हम विचार लोगों की एक टीम एक दूसरे नाम से राजनीति में सक्रिय राखी । बरसों के प्रयासों और झूठ और फ़रेबकारियों के सहारे उसने अपनी जड़ें गहराई तक मजबूत कर लीं।फिर भारत की राजनीति में ऐसा कलजुग आया कि हंस दाना दुनका चुनता रह गया और कौआ मोती खाने लगा। संसद में पहले दो सीट, फिर 187 और अब 282गोया वह अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल हो गए।भारत की वर्तमान राजनीति पूरी तरह भगवा रंग में रंगी हुई है और स्वतंत्रता सेनानियों की पीढ़ी हाथ मल रही है।

अब हम एक ऐसी पार्टी के भारत में रह रहे हैं जिस की भारत के स्वतंत्रता संग्राम में किसी तरह की कोई हिस्सेदारी नहीं है, लेकिन अब उनकी राजनीति देखिए और माउन्ट बैटन को याद कीजिए कि जब उसने कहा था कि भारत स्वतंत्र तो हो रहा है, लेकिन स्वतंत्रता को बचा नहीं पाएगा।

स्वतंत्र भारत में पहली बार ऐसा हुआ कि गुजरात दंगों में सीबीआई का सामना करने वाले उस  समय के वहाँ के सीएम, पी एम बन गए। स्वतंत्र भारत में पहली बार ऐसा हुआ कि गुजरात फ़र्ज़ी एनकाउंटर के कई मामलों में शामिल, अदालत से तड़ी पार करार दिया गया व्यक्ति सत्ताधारी पार्टी का अध्यक्ष चुना गया। स्वतंत्र भारत में पहली बार ऐसा हुआ कि भाजपा के संरक्षक आरएसएस मुख्यालय में तिरंगा न लहराए जाने के बावजूद मदरसों में तिरंगा लहराने की वीडियोग्राफी का फरमान जारी हुआ।

स्वतंत्र भारत में पहली बार ऐसा हुआ कि मक्का मस्जिद बम विस्फोट में शामिल होने के आरोपी इंद्रेश कुमार भारत के एक ईमानदार उप राष्ट्रपति को भारत छोड़ने की सलाह दे बैठा। स्वतंत्र भारत में पहली बार ऐसा हुआ कि एक जानवर यानी गाय को मारने की सजा आदमी को मारने की सजा से अधिक रखी गई। स्वतंत्र भारत में पहली बार ऐसा हुआ कि जनता की ज़ुबान मानी जाने वाली मीडिया सरकार का भोपू   बन गया। स्वतंत्र भारत में पहली बार ऐसा हुआ कि कानून व प्रशासन को अंगूठा देखा कर भीड़ के आतंक की सराहना की गई।

और स्वतंत्र भारत में पहली बार ऐसा हुआ कि बच्चों को जीवन देने के लिए अपने खाता से  ऑक्सीजन लाने वाले मुस्लिम डॉक्टर को उन के ओहदे से हटा दिया गया।आज़ाद भारत में पहली बार ऐसा हुआ कि इतिहास की किताब के साथ साथ ऐतिहासिक इमारत और ऐतिहासिक शहर के नाम बिना किसी कारण तेजी के साथ बदले जाने लगे, और उन लोगों के नाम अकारण  जाने लगे जिस का स्वतंत्रता से कोई सरोकार ही नहीं था।

स्वतंत्र भारत में ऐसा माहौल पहली बार देखा गया कि आर्थिक बदहाली के बावजूद पीएम की जय-जयकार सुनी जा रही है और नोट बंदी और जीएसटी जैसे कड़े फैसले के बाद भी आरएसएस की वाह वाही हो रही है।

ऐसा क्यों हो रहा है, जाहिर है कि इसका जवाब मिलेगा तो बस एक ही बात निकल कर सामने आएगी कि भारत को दरअसल अंग्रेजों से स्वतंत्रता नहीं चाहिए थी, उसे मुसलमानों से स्वतंत्रता चाहिए थी । इस के तर्क में अगर यह बात कही जाए कि इस सरकार में हर वह व्यक्ति निशाने पर आया है जो धर्मनिरपेक्षता या राष्ट्रीय एकता की बात कर रहा है । राजनीतिक हो, बुद्धिजीवी हो,अकेडमीशन हो, कलाकार हो, संगीतकार हो, समाज सेवी हो, कवि हो, लेखक हो या फिर फिलॉस्फर हो, यह सब सरकार के निशाने पर हैं ।

ऐसा लगता है कि सरकार ऐसे किसी व्यक्ति को नहीं बक्शना चाहती जो देश के हित में काम करे या जो सरकार के  ग़लत कामों पर उंगली उठाए।

एक ऐसी सरकार जिसे अंग्रेजों से प्यार था वह अंग्रेजों से ली गई आज़ादी के अवसर पर तिरंगा लहरा कर खुद को स्वतंत्रता सेनानियों की श्रेणी में ले जाने की यथासंभव कोशिश कर रही है। कभी गांधी की प्रशंसा करके, कभी अंबेडकर की सराहना करके, कभी भगत सिंह और चंद्रशेखर की हिम्मत की दाद देकर , भारत की जनता को यह बावर कराने की कोशिश कर रही है कि हम ही हैं जो तुम्हारे अच्छे दिन ला सकते हैं, जबकि मामला बिल्कुल विपरीत है।

रेलवे का  निजीकरण, बिजली का  निजीकरण, बैंकों का निजीकरण, निर्माण कार्यों का निजीकरण और बुनियादी सुविधाओं का निजीकरण करके अपनी सभी परिसंपत्ति विदेशी कंपनियों को देने की योजना बना ली गयी है। मेक इन इंडिया का फार्मूला कारगर साबित होता तो इतिहास हमें उसी  मोड़ पर ले जाता जो ईस्ट इंडिया कंपनी ने हमारे साथ किया था।

स्वतंत्रता का जश्न हम ज़रूर मनाएंगे, क्योंकि उसे हम ने प्राप्त किया है। भारत हमारा है, हमें किसी सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं है। हम जश्न मनाएँगे क्योंकि हम ने अंग्रेजों के दांत खट्टे किए थे, लेकिन आप किस मुंह से मना रहे हो, कि आप तो चाहते ही नहीं थे कि भारत स्वतंत्र हो। आज जब आप को मुफ्त में स्वतंत्र भारत की सरकार मिल गई है तो उसे फिर से गुलाम बनाने की कोशिश बहुत दिनों तक काम नहीं आएगी।

भारत हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सब का है, आप जैसे मुट्ठी भर लोगों का नहीं है कि देश में अराजकता फैलाकर, गोआतंकवाद बांटकर, प्रतिबंध लगाकर चाहें की जनता आप का सदैव साथ देंगे, तो आप गलत फहमी है।बस समय का इंतजार करें कि जनता आप को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए उतावली हो रही है।

यह भी देखिये क़ि स्वतंत्र भारत में पहली बार ऐसा हुआ कि सारी शक्ति तीन आदमी के हाथ में सिमट कर रह गई और वह बेनकेल घोड़े की तरह सरपट भागने लगे। प्रधान सेवक, अरुण जेटली और अमित शाह सबसे जवाब मांग रहे हैं, लेकिन खुद किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, न ही संसद, न ही मीडिया, न ही जनता के। और स्वतंत्रता जश्न का  नाम नहीं जिम्मेदारी निभाने का नाम है।

और अंत में यही बात कहना चाहूंगा कि इतिहास उस पवित्र स्त्री की तरह होता है जो हैवानों के बीच भी सम्मानजनक जीवन जी लेती है , और राजनीति बहुपति महिला की तरह होती है जो जो जिस के बिस्तर में जाती है उसी क़ि हो जाती है , अभी वह आरएसएस के साथ हमबिस्तरी  में व्यस्त है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और सियासी-सामाजी विषयों के जानकार हैं)