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RSS के ज़हर की खेती, ज़हर ही उगलेगी

हिसाम सिद्दीक़ी 

एक बहुत पुरानी कहावत है कि आप अगर ज़हर बोएंगे तो ज़हर ही पैदा होगा या दूसरों के लिए गड्ढा खोदने वाला खुद ही उसमें गिरता है। ज़हर की खेती तो बहुत ही खतरनाक होती है उसकी फसल को अगर ज़मीन में दफ्न किया जाए तो वह जमीन के अंदर पानी को जहरीला कर देेती है, अगर फसल जलाई जाए तो माहौलियात (पर्यावरण) ज़हरीला हो जाता है। कुछ न किया जाए तो इंसानों और जानवरों सबके लिए जानलेवा साबित होती है।

मतलब यह कि जहर की खेती हर हाल में नुक्सान ही करती है। आरएसएस परिवार ने भी गुजिश्ता तीन सालों में जहर की खेती की है। यह नफरत का ज़हर है। नफरत के जहर से भरे बजरंग दल, गौरक्षक दल और धर्म रक्षा दल जैसी तंजीमों ने नफरत की जो खेती की उसका जहर अब आरएसएस और बेगुनाह हिन्दुओं तक पहुचने लगा है। यह जहर है लिंचिंग या किसी को पीट-पीटकर उसके जिस्म के हिस्सों को काटकर मार डालने का।

ऐसा भी नहीं है कि मुल्क में लिंचिंग के वाक्यात पहले नहीं होते थे होते तो पहले भी थे लेकिन पहले लिंचिंग को ‘पुण्य’ कमाने और बहादुरी दिखाने का जरिया नहीं माना जाता था। जबसे मरकज में नरेन्द्र मोदी की सरकार आई है उसी वक्त से बेगुनाहों, निहत्थों और कमजोरों को मारने का तरीका बहुत ही बेरहमी भरा हो गया है। इसे ही गुजरात मॉडल कहा जाता है।

गुजरात में भी 28 फरवरी 2002 को गोधरा स्टेशन पर पहले साबरमती एक्सप्रेस के दो डिब्बों में अयोध्या से वापस आने वाले यात्रियों को बड़ी बेरहमी से मारा गया उसके बाद गुजरात भर में खुसूसन अहमदाबाद, बड़ौदा और सूरत में इंसानियत का जो कत्लेआम हुआ था। वह भी इंतेहाई वहशीपन का और बेरहमी के साथ किया गया।

एक नहीं सैकड़ों मर्दों, औरतों और बच्चों को इस अंदाज में कत्ल किया गया कि उसकी तफसील बताने में भी वहशत होती है और शर्म भी आती है। हां उन दरिंदों को आज तक शर्म नहीं आई जिन्होनेे बच्चों, बूढों और औरतों के जिस्म के हिस्से काटे और मरने से पहले ही उन्हें आग में डाल कर जिंदा जला दिया। हामिला (गर्भवती) खातून को रेप किया गया उसका पेट फाड़ कर बच्चे को निकाल कर तलवार की नोक पर टांग कर लोगों को दिखाया गया फिर दोनों को जला दिया गया।

केरल में श्रीकार्याम में आरएसएस प्रचारक राजेश को जिस बेरहमी से हाथ काट कर कत्ल किया गया वह इंतेहाई वहशीपन और शर्मिदगी भरा है। इस किस्म के वाक्यात की जितनी भी मजम्मत की जाए वह कम है। माक्र्सवादी कातिलों, गौरक्षकों, धर्मरक्षकों और हिन्दू युवा वाहिनी व बजरंग दल के लोगों के हाथों जब भी किसी बेगुनाह को इस तरह की बेरहमी से कत्ल किया जाता है तो सभी का खून खौलता है। राजेश के कत्ल पर फाइनेंस मिनिस्टर अरूण जेटली, इनफारमेशन मिनिस्टर स्मृति ईरानी, मिनिस्टर आफ स्टेट मुख्तार अब्बास नकवी, बीजेपी मेम्बरान पार्लियामेंट मीनाक्षी लेखी, भूपेन्द्र यादव, प्रहलाद जोशी, आरएसएस लीडर कृष्ण गोपाल, भैय्या जी जोशी और दत्तात्रेय होसबोले समेत आरएसएस परिवार के दर्जनों लोगों ने जिस गुस्से का इजहार किया वह फितरी (स्वाभाविक) है।

इन सभी ने राजेश के कत्ल पर जबरदस्त हंगामा  और सख्त बयानबाजी करते हुए कहा कि केरल में आरएसएस वर्कर्स के लिए जिंदा रहना मुश्किल हो गया है। सीपीएम के गुण्डों के हाथों आए दिन आरएसएस वर्कर्स को कत्ल किया जा रहा है लेकिन सरकार कातिलों के खिलाफ कोई कार्रवाई करने के बजाए उनकी पुश्तपनाही कर रही है। होसबोले ने कहा कि गुजिश्ता तेरह महीनों में आरएसएस के चैदह वर्कर्स को कत्ल किया जा चुका है। इससे एक दिन कब्ल बीजेपी लीडर प्रहलाद जोशी ने कहा था कि केरल में सत्रह महीनों में सत्रह आरएसएस वर्कर्स को कत्ल किया जा चुका है। मीनाक्षी जोशी ने कहा कि केरल सरकार प्रदेश को भगवान का अपना मुल्क बताती है लेकिन अब तो वह प्रदेश भगवान का फरामोश किया हुआ प्रदेश बन चुका है। अरूण जेटली ने केरल दौरे का प्रोग्राम बना दिया कौमी ह्यूमन राइट्स कमीशन भी सरगर्म हो गया।

आज राजेश के कत्ल पर इतना शोर क्यों मचाया जा रहा है। उसके बेरहमी से कत्ल करने का जो तरीका कातिलों  ने अख्तियार किया वह तरीका कातिलों को बताया किसने जवाब जरा तल्ख लेकिन  सच्चा है वह यह कि इस तरह बेरहमी के साथ निहत्थों को कत्ल करने का माडल तो आरएसएस परिवार का ही ईजाद किया हुआ है। जो तरीका आरएसएस परिवार ने मुसलमानों की लिंचिंग के लिए अख्तियार किया यह वही तरीका है यह इन्हीं का बोया हुआ जहर है जिसकी फसल अब पूरी तरह उग चुकी है। केरल मे तो एक राजेश को इस बेरहमी से कत्ल किया गया चंद रोज पहले ही उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से महज 80-85 किलोमीटर के फासले पर रायबरेली के ऊंचाहार में पांच निहत्थों को इसी बेरहमी से मारा गया था।

कातिलों ने पहले उनके पैर काटे कि वह भाग न सके फिर हाथ काटे ताकि वह खुद पर हो रहे हमलों केा रोक न सके उसके बाद पांचों को उन्हीं की कार में डालकर जिंदा जला दिया गया। वह पांचों हिन्दू थे, ब्राहमण थे उन्होने गौकुशी भी नहीं की थी हिन्दू धर्म के लिए कोई खतरा भी नहीं थे। इस शर्मनाक हादसे की जगह से अस्सी किलोमीटर के फासले पर प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ बैठे रहे थे उन्होने रायबरेली तक जाना भी मुनासिब नहीं समझा था। तब स्मृति ईरानी का भी ड्रामाई दिल नहीं रोया था और अरूण जेटली या आरएसएस लीडरान को भी कोई तकलीफ नहीं हुई थी। दो अगस्त को जब दिल्ली मे पूरा आरएसएस परिवार केरल के राजेश की लिंचिंग का रोना रो रहे थे दिल्ली से महज दो सौ किलोमीटर के फासले पर आगरा में मानदेवी नाम की एक पैंसठ (65) साल की बुजुर्ग दलित खातून को उसी गांव के स्वर्णों ने पीट-पीटकर मार डाला अगले दिन चोटी काटने की अफवाह पर एक मुसलमान को पकड़ कर दिल्ली के बाहर पीट-पीट कर अधमरा कर दिया गया लेकिन आरएसएस के किसी लीडर ने इन वाक्यात पर अफसोस तक जाहिर करने की जरूरत नहीं समझी।

हम किसी के भी कत्ल के खिलाफ हैं लेकिन कहना पड़ रहा है कि झारखण्ड में दर्जनों मुसलमानों की लिंचिंग, राजस्थान और हरियाणा में हुए लिंचिंग के वाक्यात, रायबरेली मे पंाच ब्राहमणों की लिंचिंग और बेरहमी से कत्ल आगरा में पैंसठ साल की बूढी दलित खातून की लिंचिंग और झारखण्ड सिंहभूमि जिले में गुजिश्ता 22 मई को विकास और गौतम वर्मा दो भाइयों के साथ गणेश गुप्ता की लिंचिंग पर खामोश रहने वाले अरूण जेटली, स्मृति ईरानी, मीनाक्षी लेखी, प्रहलाद जोशी, भैय्या जी जोशी और दत्तात्रेय होसबोले वगैरह को एक राजेश की लिंचिंग और बेरहमाना कत्ल की इतनी फिक्र क्यों है?

क्या इसलिए कि केरल में इस तरह शोर-शराबा करके यह लोग सिर्फ वोटों की अपनी खेती को खाद-पानी देना ज्यादा जरूरी समझते हैं? जान तो हर शख्स की अहम है एक जैसी है फिर यह सेलेक्टिव ‘मातम’ और ‘विधवा विलाप’ क्यों?

वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी उनके पूरे आरएसएस कुन्बे और इन दोनों के जरिए चटाई जा रही मजहब की अफीम चाट कर इनकी हिमायत मे सबकुछ भुलाने को तैयार मुल्क के हिन्दुओं के एक खास तबके को इंतेहाई संजीदगी से गौर करना होगा कि मुस्लिम दुश्मनी में इन लोगों ने मुल्क मे जो जहर बोया है वह अब इनके अपनों तक पहुच चुका है। यह सिलसिला रूकने वाला भी नहीं है आखिर इस जहर को खत्म करके कैसे रोका जाए। इस जहर के खिलाफ सेलेक्टिव तरीके से जो शोर मचाया जा रहा है उस शोर को सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है। अगर इस जहर की फसल को जड़ से ही न उखाड़ फेंका गया तो यह मुल्क में इंसानियत की तबाही का बाइस बनेगा जिसकी तमामतर जिम्मेदारी उन्हीं लोगों की होगी जिन लोगों ने इस जहर की फसल उगाने का काम किया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक उर्दू जदीद मरकज़ के संपादक हैं।)