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बाल मृत्युदर के मामले में भारत पहले नंबर पर

पूरी दुनिया में भारत पांच साल से कम उम्र के बच्चों के मौत की संख्या में सबसे आगे है. मेडिकल जर्नल ‘लैंसेट’ की एक रिपोर्ट, ‘ग्लोबल डिसीज़ बर्डन स्टडी’ में इस बात की जानकारी दी गई है.

हाल ही में हुए गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में कथित रूप से ऑक्सीजन की कमी के कारण हुई तमाम बच्चों की मौत के बाद मेडिकल जर्नल ‘लैंसेट’ की रिपोर्ट बताती है कि 2016 में पांच वर्ष से कम आयु के 9 लाख बच्चों की मृत्यु भारत में हुई थी, जो कि विश्व में सबसे ज्यादा है.

इस मामले में भारत के बाद नाइजीरिया है जहां 7 लाख बच्चों की मौत हुई और तीसरे स्थान पर कांगो है जहां तीन लाख बच्चों की मौतें दर्ज हुई हैं.

दि टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस रिपोर्ट के हवाले से कहा है कि पूरे विश्व में साल 1970 के मुकाबले साल 2016 में पांच साल से कम बच्चों की मृत्यु दर 1 करोड़ 64 लाख से गिरकर 50 लाख दर्ज की गई. पूरे विश्व में मृत्यु दर घटने से औसत जीवन आयु में बढ़ोतरी हुई है और अब महिलाओं की औसत आयु दर 75.3 साल है और वहीं पुरुषों की 69.8 साल है. जापान में औसत आयु 83.9 साल है जोकि सबसे अधिक है वहीं सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक में सबसे कम है जोकि 50.2 है.

द इंडियन एक्सप्रेस ने इस रिपोर्ट के हवाले से कहा कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के अनुसार 2015-2016 में पांच साल से कम बच्चों की मृत्यु दर दस साल पहले 74 से गिरकर 50 प्रति 1000 जीवित जन्म हो गई थी. वैसे देश में यह आंकड़ा भी अलग-अलग है. जैसे यह उत्तर प्रदेश में यह संख्या 78 है. वहीं, केरल में यह संख्या सात है.

लैंसेट में छपी इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पूरे विश्व में बीते पांच दशक में सभी उम्र के लोगों के मृत्युदर में गिरावट आयी है. खासकर पांच साल से कम उम्र वालों की मृत्यु दर में गिरावट दर्ज की गई है. हालंकि भारत में दोनों स्तरों पर भिन्नता बनी हुई है. उम्र विशिष्ट मृत्यु के दर में परिवर्तन का दर भी काफी अलग है जैसे कुछ स्थानों पर कुछ आयु वर्गों के लिए मृत्यु दर में बढ़ोतरी हुई है.

टाइम्स आॅफ इंडिया के मुताबिक, आयु बढ़ने के साथ एक बात और देखने को मिली कि लोगों की बीमारी में बीतने वाले सालों की संख्या भी बढ़ी है. वहीं कम आय वाले देशों के लिए खराब स्वास्थ्य के साथ बिताए गए कुल जीवन का अनुपात अधिक है. साल 2016 में देखा गया कि कुल होने वाली 3 करोड़ 95 लाख मौतों में से 72.3% मौतें गैर संक्रामक रोग से होती हैं. कम आय वाले देशों में समयपूर्व मृत्यु का प्रमुख कारण श्वसन संक्रमण था वहीं बाकी सारी जगहों में इस्केमिक हृदय रोग था जिसमें दिल की मांसपेशियों में रक्त प्रवाह और ऑक्सीजन में कमी से समयपूर्व मृत्यु होती है.

पूरे विश्व में इस्केमिक हृदय रोग से होने वाली मौतों में 2006 से 9% बढ़ोतरी देखी गई और इससे साल 2016 में 94 लाख 80 हजार की मौतें हुई हैं. मधुमेह से होने वाली मृत्यु साल 2006 से 31.1% बढ़कर अब 2016 में 1.43 लाख लोगों की मृत्यु हुई. कुल मिलाकर, संक्रामक रोगों से होने वाली मौतों में कमी आई है. हालंकि डेंगू से होने वाली मौतों में बढ़ोतरी हुई है. 2006 से 81.8% बढ़कर 2016 में 37,800 मौतें हुई हैं. साथ ही टीबी से साल 2006 से 67.6% बढ़कर 2016 में 10,900 मौतें हुई हैं.

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्वाचन क्षेत्र गोरखपुर में बीआरडी अस्पताल में कई बच्चों की मौत की खबरें सुर्खियों में हैं. वहां हाल ही में 60 से अधिक बच्चों की एक सप्ताह के भीतर मौत हो गई. इनमें से ज्यादातर नवजात थे. वहीं,महाराष्ट्र के नासिक सिविल अस्पताल के विशेष शिशु देखभाल खंड में पिछले महीने 55 शिशुओं की मौत हो गई थी.उत्तर प्रदेश के ही फरूरखाबाद में जिला अस्पताल में पिछले एक महीने के दौरान ऑक्सीजन की कमी से 49 नवजात बच्चों की मौत के मामला सामने आया था. झारखंड के जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल में पिछले 30 दिनों में 64 बच्चों की और 2 महीनों में 100 से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है.

गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में अगस्त महीने में कुल 296 बच्चों की मौत हो चुकी है. मेडिकल कालेज में जनवरी से अब तक 1,256 बच्चों की मौत हुई है. अपर स्वास्थ्य निदेशक कार्यालय से प्राप्त आंकड़े बताते हैं इस वर्ष जनवरी में एनआईसीयू तथा जनरल चिल्ड्रेन वार्ड में 143 और इंसेफलाइटिस वार्ड में नौ बच्चों की मृत्यु हुई. इसी प्रकार फरवरी में क्रमश: 117 तथा पांच, मार्च में 141 तथा 18, अप्रैल में 114 तथा नौ, मई में 127 तथा 12, जून में 125 तथा 12, जुलाई में 95 एवं 33 और अगस्त माह में 28 तारीख तक एनआईसीयू में 213 तथा इंसेफलाइटिस वार्ड में 83 बच्चों की मौत हुई है.

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