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रमज़ान में भूखा AMU-सच या झूठः रश्मि सिंह

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से रश्मि सिंह की रिपोर्ट

बीते कुछ दिनों से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय फिर से विवादों में है। इस बार मामले ने तूल तब पकड़ा जब मात्र बाहरी तत्वों के कुछ ट्वीट्स और फेसबुक पोस्ट्स पर यह दावा किया कि विश्वविद्यालय में रमज़ान में रोज़ों के चलते खाना बंद कर दिया गया। यानी अमुवि के सभी होस्टल्स की मेस और केंटीन बंद हो गई हैं। इसके चलते गैर मुसलमानों को नाश्ता और दोपहर का खाना नहीं मिल पा रहा है।

उन्हें सिर्फ शाम का खाना दिया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर रोज़ों के लिए सेहरी और इफ्तार का पूरा प्रबंध है।इन बाहरी तत्वों का ये भी दावा है कि विश्वविद्यालय में गैर मुसलमान विद्यार्थियों के साथ भेदभाव किया जाता है और यही नहीं उन्हें ज़बरन रोज़ा रखवाया जा रहा है। ये धर्म परिवर्तन की कोई साज़िश है। तो चलिए जानते हैं कि इन दावो में कितनी सच्चाई है। गौरतलब है कि यह तो रमज़ान की बात है लेकिन अन्यथा भी छात्र मेस या हॉस्टल में खाना कम पसंद करते हैं। अब मैं यहां विश्वविद्यालय से जुड़े हुए कुछ अहम् पहलुओं को उजागर कर रही हूं :

अमुवि में बीते 143 सालों से रमज़ान का महीना मनाया जा रहा है। विश्वविद्यालय में गैर मुसलमान छात्र तब भी पढ़ने आते थे और
आज भी पढ़ने आते हैं। लेकिन इस वर्ष यह मुद्दा गरमा रहा है कि विश्वविद्यालय रमज़ान मैं गैर मुसलमान विद्यार्थियों को खाने को नहीं दिया जाता है। तो बताते चलें की विश्वविद्यालय में लड़कियों के कुल 5 हॉल्स हैं और लड़कों के लिए इन हॉल्स की संख्या 13 है जिनमें अगर निवासी छात्र छात्राओं की कुल संख्या को देखें तो यह संख्या अमुवि की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार 9060 है। जिनमें गैर मुसलमान छात्र छात्राओं की संख्या तकरीबन 945 है। नतीजन रमज़ान में खाना खाने वालो की संख्या गिर जाती है।

अगर लडकियों के हॉल्स की बात करें तो उन्हें किसी भी प्रकार की कोई असुविधा का सामना नहीं करना पड़ रहा है। आईजी हॉल से खुशबू कहती है,” हमें वो ही खाना मिल रहा है जो रोज़ के दिनों में मिलता है और हमें किसी भी प्रकार की कोई समस्या नहीं है।”वहीं अब्दुल्लाह हाल से पूजा का कहना है,” हमें रमज़ान में खाना ही नहीं वरन और बेहतर गुणवत्ता का खाना मिल रहा है।” वहीं अगर मैं अपने हॉल बेगम सुल्तान जहां की बात करूं तो समस्या हमारे हॉल में भी नही है।

रही बात लड़कों के हॉल की तो विश्वविद्यालय के छात्रों से जब खाना न मिलने के मसले पर बात की गई तो उन्होंने उपरोक्त आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया। विभिन्न रोचक तथ्य सामने आए। गैर मुसलमान छात्रों का कहना था कि वे रोज़ेदारों का एहतराम करते हैं। रोज़ों के चलते वे बाहर ही खाना पसंद करते हैं।इसलिए मेस में खाना बर्बाद न हो इसके चलते खाना नहीं बनता है। पर इनमे से कुछ विद्यार्थियों का कहना था की उन्हें उनके हॉल्स में नाश्ता व दोपहर का खाना नहीं मिल रहा है।

इस मसले पर जब विभिन्न हॉल्स के मेस इन्चार्ज्स से बात की गई तो उन्होंने ने कहा कि विश्वविद्यालय में नियम के अनुसार जब तक खाने वालों की संख्या 100 नहीं होती मेस नही खुलता। यह समस्या तब भी आती है जब शीत व ग्रीष्मावकाश के बाद विद्यार्थी धीरे धीरे हाल्स में आना शुरू होते हैं तब भी शुरुआत में विद्यार्थियों की संख्या कम होने के चलते मेस बंद रहते हैं और रोज़ों में खाने वालो की संख्या बहुत कम हो जाती है। जिसके कारण व्यव्स्था कुछ समय के लिए खराब हो जातीं है । पर फिर भी हॉल्स में सीनियर फ़ूड इन्चार्ज से कह कर आप अपने लिए भोजन का प्रबंध करवा सकते हैं। और रही बात कैंटीन की तो कैंटीन पर भी विद्यार्थियों के ना आने के चलते धंधा चौपट होने के चलते वे लोग कैंटीन बंद रखते है।

और अगर विश्वविद्यालय में रमज़ान के कारण खाद्य प्रबंधन में दिक्कतें आ रही है तो वो विश्वविद्यालय का निजी मामला है और ये समस्याएं कुप्रबंधन के चलते आ रही हैं जिनका आधार हिंदू मुसलमान नहीं है। दिक्कतों का सामना हिंदू विद्यार्थियों के साथ साथ उन मुसलमान विद्यार्थियों को भी करना पड़ रहा है जिनका रोज़ा नहीं है। उपरोक्त समस्याओं को मद्देनज़र रखते हुए अमुवि के पब्लिक रिलेशन आफिसर उमर पीरज़ादा ने सूचना जारी की कि “अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी प्रशासन ने यह फैसला किया है कि गर्मी की छुट्टियां शुरू होने तक विश्वविद्यालय के छात्रावासों में मांगने पर दोपहर का खाना उपलब्ध कराया जायेगा। छुट्टियां 5 जून से आरम्भ होंगी।”

( रश्मि सिंह, लॉ फेकेल्टी से हैं और छात्र एक्टिविस्ट हैं)