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नफरत का जहर चढता कैसे है?

हिसाम सिद्दीक़ी 

पन्द्रह से पच्चीस साल के दरम्यान के बच्चों का सबसे बड़ा मसला यह हुआ करता था कि किस तरह वह अपना कैरियर बनाएं और तालीम के मैदान में अपने साथियों के मुकाबले में आगे निकल कर अपना और अपने खानदान का नाम रौशन करें। गुजिश्ता कुछ सालों से इस सूरतेहाल मे एक बहुत बड़ी तब्दीली आई है। इस उम्र के नौजवान ख्वाह वह हिन्दू हों, मुसलमान हों या सिख तकरीबन सभी को धर्म या मजहब की खतरनाक अफीम चटाई जा चुकी है। आज नौजवानों की एक बड़ी तादाद ऐसी है जो धर्म और मजहब के नाम पर अपने कैरियर की परवा किए बगैर कुछ भी कर गुजरने को तैयार दिखती है। इस की एक बहुत बड़ी वजह बेरोजगारी और मुनासिब तालीम का न होना भी है।

यह भी एक तल्ख हकीकत है कि मई 2014 में नरेन्द्र मोदी के मुल्क की सत्ता में आने के बाद से हिन्दू और मुसलमानों के दरम्यान नफरत में न सिर्फ इजाफा हुआ है बल्कि अब लोग अवामी तौर पर फिरकापरस्ती की बातें करने में फख्र महसूस करने लगे हैं। समाज के हर तबके में हमेशा से फिरकापरस्त जेहन के लोग होते थे लेकिन अवामी तौर पर फिरकावाराना नफरत की बातें करने में लोग एहतियात रखते थे उन्हें ख्याल रहता था कि अगर वह हिन्दू मुस्लिम नफरत की बात करेंगे तो सुनने वाले क्या सोचेंगे। अब ऐसा नहीं है अब तो बड़ी तादाद में नौजवान ऐसे दिखते हैं जिनके गले में भगवा रंग का पटका पड़ते ही जैसे उनके अंदर नफरत का करेण्ट सा दौड़ जाता है। वह कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार हो जाते हैं।

मुस्लिम नौजवानों को नफरत और मजहब की गलत तशरीह (व्याख्या) के जरिए गुमराह किए जाने की बुराई अभी कश्मीर तक ही महदूद है मुल्क के दूसरे हिस्सों तक यह जहर अभी तक पहुंचा नहीं है अगर पहुंचा भी है तो ऐसे गुमराह लोगों की तादाद बहुत ही कम है। लेकिन दूसरी तरफ ऐसा नहीं है। गुजिश्ता चार-पांच सालों में हिन्दू नौजवानों को बहुत बड़े पैमाने पर मजहबी तौर पर भड़का कर गुमराह किया जा चुका है। नौजवानों को गुमराह करने वाले अपने मंसूबों में इसलिए कामयाब हो गए कि मोदी सरकार आने के बाद भड़कीली तकरीरें करने वाले एक भी शख्स के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।

हिन्दू युवा वाहिनी के बानी (संस्थापक) गोरखपुर से कई बार लोक सभा मेम्बर रहने वाले आदित्यनाथ योगी की डायस पर मौजूदगी में उनकी वाहिनी के लोगों के जरिए इंतेहाई भड़कीली तकरीरें हुआ करती थीं एक वीडियो तो ऐसा भी वायरल है जिसमें डायस पर योगी बैठे होते हैं तो उस वक्त के उनकी वाहिनी के प्रदेश सदर कह रहे थे कि हम कब्र से निकाल कर मुस्लिम लड़कियों को रेप करेंगे। वह योगी उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर है। हमें यह भी बखूबी अंदाजा है कि हमारे इस एडिटोरियल से हमारी ही बिरादरी के कई सहाफियों को सख्त एतराज होगा लेकिन हम भी क्या करें बुलंदशहर के हालिया वाक्यात के बाद ही यह हकीकत लिखना हमारी मजबूरी बन गई।

वैसे तो नफरत और मजहबी जुनून के नजारे अक्सर उस वक्त देखने को मिलते हैं जब गौरक्षा के नाम पर कुछ गुण्डे किसी बेसहारा और अकेले मजबूर मुसलमान को गाय, बछड़ों या बैलां के साथ पाकर उन्हें नफरत की लिंचिंग का शिकार बनाते हैं। बुलंदशहर के स्याना इलाके में गुजिश्ता तीन दिसम्बर को जो कुछ दिखा वह मुल्क और समाज के लिए इंतेहाई खतरनाक और बदशगुनी की अलामत है। मामला गाय और गौवंश का ही बनाया गया लेकिन यह क्या वहां लिंचिंग के लिए कोई मुसलमान नहीं था दोनों तरफ यानी हमला करने और हमले का शिकार होने वाले दोनों ही हिन्दू थे।

एक इंसाफ पसंद, होनहार और फर्जशनास पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह गौ गुण्डों की नफरत की भेंट चढ गया प्रदेश के वजीर-ए-आला ने सुबोध कुमार के बच्चों को पचास लाख की माली मदद दे दी उनके तीस लाख के कर्ज की अदाएगी भी करा दी लेकिन क्या पचास लाख या एक करोड़ रूपयों से किसी की जान की कीमत लगाई जा सकती है? सुबोध चाहते तो भीड़ में घिरने पर कम से कम अपने रिवाल्वर से छः साल लोगों को मौत की नींद सुला सकते थे। अपनी जान बचाने के लिए उन्हें इसका कानूनी हक भी हासिल था लेकिन उन्होने ऐसा नहीं किया। इसके बावजूद नफरत और धर्म की अफीम के सौदागर बीजेपी के कम से कम दो लोक सभा और दो असम्बली मेम्बरान ने शहादत के बाद उनके किरदार और उनकी फर्जशनासी पर बड़ी बेशर्मी के साथ उंगलियां उठाई हैं।

इस हंगामे के एक अहम मुल्जिम शिखर अग्रवाल ने भी फरारी के बावजूद वीडियो वायरल करके सुबोध कुमार सिंह की ईमानदारी पर उंगली उठाने का गुनाह किया है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर आदित्यनाथ योगी ने शहीद सुबोध कुमार की किरदारकुशी (चरित्र हनन) करने वाले बीजेपी के लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई करना मुनासिब नहीं समझा। ठोक दो और इनकाउण्टर कर दो जैसी हिदायतें पुलिस को देने वाले योगी आदित्यनाथ ने एक बार भी नहीं कहा कि बुलंदशहर हंगामे के मास्टर माइण्ड योगेश राज और शिखर अग्रवाल को भी ठोक दो इन लोगों ने तो पुलिस पर हमला करके प्रदेश सरकार की अथारिटी पर हमला किया है। इससे बड़ा जुर्म और क्या हो सकता है?

योगी ऐसा करेंगे भी नहीं क्योंकि यही तो पुर्जे हैं जिनके जरिए नफरत की मशीन को ताकतवर बनाया जाता है। योगी ने तो पुलिस पर हमले के वक्त भीड़ को उकसाने और पथराव करने वाले सुमित के घर वालों को दस लाख का इनाम दे दिया। जिस सुमित को उसी के साथियों में से किसी ने गोली मार दी थी।

धर्म या मजहब और नफरत की अफीम चटाने वालों की साजिश कितनी गहरी है इसका अंदाजा इस बात से भी लगता है कि तीन दिसम्बर को स्याना थाने और पुलिस चौकी पर जमा होने वाले गुण्डों में तकरीबन सभी अट्ठारह से पच्चीस साल की उम्र के नौजवान थे। उन्हें रोकने या कानून अपने हाथों में लेने से रोकने वाला एक भी उम्रदराज शख्स मौके पर मौजूद नहीं था। भीड़ में शामिल जितेन्द्र उर्फ जीतू मलिक को फौज की अपनी नौकरी की कोई फिक्र नहीं थी पुलिस में भर्ती होने की तैयारी कर रहे सुमित को अपने मुस्तकबिल की तो बाकी नौजवानों को अपने कैरियर की कोई फिक्र नहीं थी। क्योंकि वह तो धर्म की अफीम चाट कर अपने होश व हवास खो चुके थे।

भीड़ में शामिल इन बेहिस नौजवानों का एहसास और जमीर इतना मुर्दा हो चुका था कि इस्पेक्टर सुबोध कुमार की जीप से लटकी लाश देख कर लड़के हंसते हुए कहते हैं कि ‘यो तो वही स्याना वाला एसओ है।’ यह आवाज एक वायरल वीडियो में पूरी तरह साफ-साफ सुनाई देती है। उन नौजवानों की जिस किस्म की बातें वीडयो में सुनी गई उनसे ऐसा महसूस हुआ कि उन्हें इतना बड़ा और भयानक गुनाह करने पर न कोई शर्मिदगी थी और न पछतावा था। आखिर यह कौन सा समाज बनाया गया और बनाया जा रहा है। आखिर इसका नतीजा क्या होगा क्या हम और हमारा मुल्क अफरा-तफरी (अराजकता) की जानिब तेज रफ्तारी से बढ रहे हैं।

इस किस्म की गुण्डई करने वालों को कहीं न कहीं से पैसा भी मिलता है। पूरे मामले के मास्टर माइण्ड बजरंग दल कनवीनर योगेश राज प्रवीण की कीमती मोटर साइकिल और महंगे कपड़े देख कर इस बात का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि उसकी मां और बहन के रहन-सहन को देख कर लगता है कि वह बहुत ही मामूली घर से आता है।

जो ताकतें बुलंदशहर जैसे वाक्यात पर फख्र महसूस करती हैं और एक खास जेहनियत की जीत मानती हैं उन्हें हम याद दिलाना चाहते हैं कि गुनाह और कानूनशिकनी वह जहर है जो आखिर में उसी पर चढता दिखता है जो इस जहर की खेती करता है। अलीगढ में फसाद के दौरान 1978 में वहां के मुसलमानों ने पीएसी की ज्यादतियो की शिकायतें की थीं मामला तूल पकड़ गया प्रदेश असम्बली में दिन भर इस मसले पर चर्चा और हंगामा हुआ था।

उस वक्त कल्याण सिंह प्रदेश के हेल्थ मिनिस्टर थे तो असम्बली के सामने यह कह कर धरने पर बैठ गए थे कि पीएसी के खिलाफ किसी किस्म की कार्रवाई वह बर्दाश्त नहीं करेंगे। पीएसी को गैरजरूरी तरीके से सर चढाने का नतीजा यह हुआ कि उत्तराखण्ड आंदोलन के दौरान मजाहिरा करने दिल्ली जा रही उत्तराखण्ड की हिन्दू ख्वातीन और जवान लड़कियों को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा में न सिर्फ रोका गया बल्कि उसी पीएसी के हाथ उन लड़कियों और ख्वातीन की आबरू तक पहुंच गए थे। कई ख्वातीन को रेप किए जाने की खबर आई तो वही कल्याण सिंह पीएसी को बुरा-भला कहते फिर रहे थे। जो लोग नौजवानों की बेरोजगारी का फायदा उठा कर आज उन्हें धर्म की अफीम चटा कर हर तरह का गुनाह करा रहे हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि वह अपनी ही आने वाली नस्लों को तबाह करने का खेल खेल रहे है।

धर्म के ठेकेदारों के हाथों का खिलौना बने नौजवानों को भी गौर करना चाहिए कि आखिर वह अपने मुस्तकबिल (भविष्य) को इस तरह दांव पर लगा कर क्या हासिल करना चाहते हैं। भोपाल के नजदीक सुवाखेड़ा नाम का एक कस्बा है वहां रहने वाले अंचल सिंह मीणा 1992 में तीस साल के थे बाबर के नाम की मस्जिद की शक्ल में देश के लिए कलंक कही जाने वाली मस्जिद तोड़ने अयोध्या गए थे धर्म के जुनून में मस्जिद के गुम्बद पर चढ गए गुम्बद गिरा तो कई दूसरे लोगों के साथ वह भी गिर कर मलबे में दब गए। उन्हें पहले मकामी अस्पताल पहुंचाया गया जहां से लखनऊ मेडिकल कालेज रेफर कर दिए गए। अगले दिन लखनऊ मेडिकल कालेज में होश आया तो पता चला कि मलबे की चोट से रीढ की हड्डी टूट गई इसलिए कमर के नीचे के हिस्से से अपाहिज हो चुके हैं। 26 सालों से अंचल सिंह मीणा अपाहिज होकर बिस्तर पर पड़े हैं।

मस्जिद के मलबे पर चढकर कितने ही लोग प्रदेशों और मरकजी सरकारों में वजीर और चीफ मिनिस्टर के ओहदे तक पहुंच गए लेकिन अंचल सिंह मीणा की तरफ किसी ने देखा तक नहीं। बुलंदशहर का मामला हो या दूसरे वाक्यात धर्म की अफीम के नशे में जो नौजवान मुकदमों में फंसे हैं उनकी पूरी उम्र कचेहरी के चक्कर लगाते ही गुजरने वाली है। इसका भी उन्हें ख्याल रखना चाहिए।

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