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सुप्रीम कोर्ट की बेबसी

हिसाम सिद्दीक़ी

एक सौ तीस करोड़ के मुल्क के लोगां का भरोसा जिस एक इदारे पर बचा था मोदी हुकूमत के बेलगाम अफसरान ने उसे भी बेबस कर दिया है। वह इदारा है मुल्क का सुप्रीम कोर्ट। यह कोई इल्जाम नहीं है बल्कि चौदह फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच के जरिए कही गई बात है। मुल्क में काम कर रही टेलीकाम कम्पनियों ने सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बावजूद उनपर बाकी तकरीबन डेढ लाख करोड़ का भुगतान नहीं किया।

भुगतान इसलिए नहीं हो पाया कि टेलीकम्युनिकेशन मोहकमे में बैठे एक बेलगाम अफसर ने सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बावजूद टेलीकाम कम्पनियों को भुगतान न करने की छूट दे दी। जस्टिस अरूण मिश्रा, जस्टिस अब्दुल नजीर और जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की बेंच ने चौदह फरवरी को अदालत में जो कुछ कहा वह मुल्क और मुल्क की सरकार के लिए न सिर्फ शर्मनाक है बल्कि काबिले सजा जुर्म है। अदालत ने पूछा कि क्या इस देश में कानून नाम की कोई चीज नहीं बची है। क्या हम सुप्रीम कोर्ट को बंद कर दें, जहां हमारे आर्डर की कोई इज्जत नहीं होती।

बेंच में वैसे तो तीन जज थे लेकिन जस्टिस अरूण मिश्रा सबसे ज्यादा नाराज दिखे। उन्होने कहा कि मैं कभी इस तरह गुस्सा नहीं करता लेकिन अब सोचने पर मजबूर हो गया हूं कि क्या ऐसे सिस्टम में यह देश रहने लायक बचा है। आखिर हम इस सिस्टम में कैसे काम करें। बेहतर है अब इस देश में रहा ही न जाए और देश छोड़ दिया जाए।

उन्होने कहा हमें नहीं पता कि इस तरह बेकार की बातें कौन कर रहा है। लेकिन खुद मैं यह महसूस कर रहा हूं कि मुझे इन हालात में इस किस्म के सिस्टम में सुप्रीम कोर्ट में काम नहीं करना चाहिए। याद रहे कि ठीक इसी तरह की बात कुछ साल पहले मुल्क के मशहूर अदाकार आमिर खान ने अपनी बीवी किरण राव के हवाले से कही थी।

उन्होने कहा था कि किरण राव घर में उनसे कहती हैं कि अब तो मुल्क में निकलने-बैठने में भी खौफ महसूस होता है। चंद माह कब्ल नसीरउद्दीन शाह ने भी कहा था कि उन्हें यह खौफ है कि अगर रास्ते में कुछ लोगों ने उनके बच्चों को रोक कर पूछा कि वह हिन्दू हैं या मुसलमान तो उनके बच्चे क्या जवाब देंगे? क्योंकि उन्होने तो हिन्दू-मुसलमान बनाकर अपने बच्चों की परवरिश ही नहीं की है।

आमिर खान और नसीर उद्दीन शाह के बयानात पर पूरा आरएसएस कुन्बा और नरेन्द्र मोदी का मीडिया सेल उनपर टूट पड़ा था। कोई पाकिस्तान जाने के टिकट दिला रहा था तो कोई कह रहा था कि उन्हें दुनिया में जो मुल्क महफूज दिखे वहीं चले जाएं। इन जैसे लोगों को भारत में रहने का कोई हक हासिल नहीं है। यह लोग भारत की खाते हैं और भारत को बदनाम भी करते हैं। आमिर और नसीर पर हमला करने वालों के बाद जस्टिस अरूण मिश्रा ने अब सुप्रीम कोर्ट में बैठकर कह दिया कि यह देश अब रहने लायक नहीं है। वह सोचते हैं कि अपना देश छोड़कर कहीं और चले जाएं। इतना सख्त बयान आने के बाद मोदी के मीडिया सेल में काम करने वाले और पूरे आरएसएस कुन्बे को जैसे सांप सूघ गया, कोई एक लफ्ज नहीं बोला है। अगर उनमें हिम्मत है तो आमिर और नसीर की तरह जस्टिस मिश्रा के खिलाफ भी अपनी नफरत की जंग छेड़ दें। यह लोग ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि इन्हें पता है कि अगर जस्टिस मिश्रा के खिलाफ इन्होने कोई मोर्चाबंदी की तो एक ही दिन में ठीक कर दिए जाएंगे।

जस्टिस मिश्रा और उनके साथ बेंच में शामिल बाकी दो जज साहबान की बातें भी समझ में आने वाली नहीं है। यह जज साहबान मुल्क की सबसे बडी अदालत में बैठे हैं। यह किसी भी मामले में इस तरह बेबसी का इजहार कैसे कर सकते हैं। इन्हें तो सख्त से सख्त आर्डर देना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट के सख्त आर्डर के बावजूद टेलीकाम मोहकमे के जिस अफसर ने टेलीफोन कम्पनियों से वसूली न करने का आर्डर जारी कर दिया था उसे अदालत में तलब करके तौहीने अदालत के जुर्म में जेल भेजा जाना चाहिए था।

जस्टिस अरूण मिश्रा और उनके साथ बेंच में बैठे दोनों जज साहबान के सामने आखिर क्या मजबूरी थी कि उन्होने मुताल्लिका अफसर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जस्टिस मिश्रा सिस्टम को चाहे जितना कोसें हकीकत यह है कि पिछले कुछ सालों में अदलिया (न्यायपालिका) का सिस्टम भी बहुत खराब हुआ है या जानबूझ कर किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज मार्कंडे काटजू ने ही कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में जो कुछ हो रहा है वह इंसाफ नहीं है बल्कि सरकार की गुलामी है।

जस्टिस मारकण्डेय काटजू ने कहा कि वैसे तो सुप्रीम कोर्ट काफी दिनों से खुद ही अपना वकार (सम्मान) गिराने का काम कर रहा है। लेकिन साबिक चीफ जस्टिस रंजन गोगोई का दौर तो सुप्रीम कोर्ट का सबसे ज्यादा स्याह बाब (काला अध्याय) कहा जाएगा। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट का वकार गिराने की जिम्मेदारी अकेले चीफ जस्टिस रंजन गोगोई पर ही नहीं डाली जा सकती वह तमाम जज इसके लिए जिम्मेदार हैं जो खामोश रहकर सबकुछ देखते रहे और किसी ने आवाज नहीं उठाई।

जस्टिस गोगोई तो रिटायर होकर चले गए नए चीफ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे के दौर में भी सुप्रीम कोर्ट में कुछ सुधार होता नजर नहीं आ रहा। कश्मीर के मामलात हों, शहरियत तरमीमी कानून हो, एनपीआर और एनआरसी हो या ऐसा कोई मामला जिसका ताल्लुक सीधे तौर पर मोदी हुकूमत से हो सुप्रीम कोर्ट का रवैय्या टाल-मटोल वाला ही नजर आता है। इन जज साहबान की समझ में यह नहीं आ रहा है कि अगर देश के लोगों का भरोसा सरकार की तरह सुप्रीम कोर्ट से भी उठ गया तो मुल्क में अफरा-तफरी और खानाजंगी (अराजकता और गृहयुद्ध) जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। चूंकि सुप्रीम कोर्ट का रवैय्या साफ नहीं है इसलिए कई प्रदेशों के हाई कोर्टों में बैठे जज साहबान अपनी जिम्मेदारी पूरी करते नजर नहीं आते। निचली अदालतें तो जैसे प्रदेश सरकारों की बंधुआ मजदूर बन कर रह गई हैं।

पुलिस किसी पर भी देशद्रो’ह जैसा मामला दर्ज करके अदालतों में पेश करती है तो पुलिस से कोई सवाल किए बगैर गिरफ्तार शख्स को कम से कम चौदह दिन की ज्यूडीशियल रिमाण्ड पर जेल भेज देती है। यह सूरतेहाल ठीक होनी चाहिए वर्ना मुल्क की तबाही के लिए मोदी जैसी हुकूमत कम सुप्रीम कोर्ट और दीगर अदालतें ज्यादा जिम्मेदार ठहराई जाएंगी। तारीख में इन्हें कभी माफी नहीं मिलेगी।

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