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नरकट की क़लम से……

डाॅ. शारिक अहमद खान 

आज नरकट की क़लम हाथ से गही. दो क़लमें गहीं,एक चौड़ी ख़त की और दूसरी पतली ख़त वाली.इन्हें ब्लेड से गहा मतलब गढ़ा,बीच में चीरा लगाया और रोशनाई से काग़ज़ पर लिखा.तस्वीर में देखा जा सकता है.नरकट की कलम से लिखने का चलन अब ख़त्म हो गया.

पहले काली पटरी पर सफ़ेद दूधिया से और सफ़ेद पटरी पर काली स्याही से इसी नरकट की कलम से लिखा जाता.क्योंकि हमारे स्कूल में इसका चलन नहीं था,पेंसिल वाला माडर्न स्कूल था तो उर्दू-अरबी-फ़ारसी पढ़ाने आने वाले उस्ताद घर पर ही नरकट की कलम से काग़ज़ और पटरी पर इमला बोलकर लिखवाते,नरकट से नकल लिखी जाती और हिंदी की लिखावट सुधारने के लिए सुलेख भी लिखे जाते.नरकट के बाद किरिच की कलम से बारीक लिखना सिखाया जाता.

किरिच की कलम बाज़ार से मोल ख़रीदकर आती.नरकट अगल-बगल से उखाड़कर गह लेते.काग़ज़ पर स्याही ज़्यादा हो जाने पर दुद्धी मतलब चाक के चूरे या सूखी मिट्टी से सुखाया जाता.सोख़्ता भी इस्तेमाल होता.रौशनाई रेडीमेड भी आती और पुड़िया वाली भी,पुड़िया को पानी में डालकर रोशनाई बनाना ख़ूब चलन में था.ये सस्ती पड़ती.पटरी को काला करने के लिए बेकार बैटरी या कोयले का इस्तेमाल होता,सफ़ेद करने के लिए मुल्तानी मिट्टी और आम मिट्टी का भी चलन था.

मुल्तानी मिट्टी से पटरी सफ़ेद करने वाले बच्चे को दूसरे बच्चे इज़्ज़त की नज़र से देखते.वजह कि मुल्तानी मिट्टी ख़रीदनी पड़ती और इसमें कुछ आने गला करते.आजकल के नए बच्चे तो नरकट और किरिच की कलम जानते ही नहीं हैं.कितनों ने तो देखी भी नहीं होगी.ख़ैर.

कबीर ने कहा है कि ‘ मसि कागद छुयो नहिं,कलम गही नहिं हाथ ‘.इसमें गही शब्द का अर्थ आजकल लोग पकड़ना बताते हैं और कॉलेज तक में भी गही मतलब पकड़ना सिखाया जाता है.जबकि ये ग़लत है.कबीर ने जो गही,गह्यों या गहूँ कहा है,उसमें इनका अर्थ है कलम हाथ में लेकर गहना,मतलब गढ़ना.ख़ैर.क़लम का मतलब ही है जो कलम की गई हो,कलम पंख की हो या नरकट की या फिर किरिच की,सबका सिरा कलम होने पर ही क़लम कहलाती थी.जो आजकल बाज़ार में फाउंटेनपेन या बॉलपेन वग़ैरह मिलती है वो कलम नहीं है.वो पेन है.

आज के दौर में कलम के सिपाही ख़त्म हो चुके हैं.पेन के सिपाही थोड़े-बहुत बचे हैं.बाकी सब कीबोर्ड या कीपैड के सिपाही हैं.कलम के सिपाही बचे ही नहीं तो ज़ुल्म के खिलाफ़ क्या ख़ाक कलम से लड़ेंगे.

(सोशल मीडिया से)

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