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देश में अब पांच ट्रिलियन ईकोनोमी का जुमला

हिसाम सिद्दीकी
फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण ने मोदी सरकार के दूसरे दौर का अपना पहला बही-खाता पार्लियामेंट में पेश किया जिसे आम तौर पर बजट कहा गया। वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने इसकी तारीफ करते हुए ‘गरीब का बल, नौजवानों का बेहतर कल’ करार दिया था। वजीर-ए-आजम मोदी और उनके वजीरों के अलावा यह बही-खाता किसी की समझ में नहीं आया, शेयर मार्केट पर इसका बहुत उल्टा असर पड़ा। कई दिनों तक मुसलसल गिरावट जारी रही। तीन दिनों के अंदर ही सेंसेक्स और निफ्टी में इस साल की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। चूंकि वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने अगले पांच साल में मुल्क की मईशत (अर्थव्यवस्था) पांच ट्रिलियन डालर तक पहुंचाने का एलान कर रखा है। इसलिए निर्मला सीतारमण ने भी पांच ट्रिलियन पर ही ज्यादा जोर दिया। निर्मला सीतारमण ने भी मोदी की तरह कहा कि देश में 70 सालों में जो नहीं हो सका वह उनकी सरकार पांच साल में कर दिखाएगी। इस बयान को उनका झूट कहा जाना चाहिए क्योंकि मईशत (अर्थव्यवस्था) के मामले में 1964 में ही भारत दुनिया के मुल्कों में सातवें नम्बर पर था। दुनिया जानती है कि 1964 तक बल्कि 1991 तक सरकार के पास आमदनी के जराए नहीं थे जबकि आज इनकम टैक्स, एक्साइज, कस्टम, प्रापर्टी और फ्लैटों की रजिस्ट्रियों  तरह-तरह के सर्विस टैक्स के जरिए लाखों-करोड़ों की आमदनी होती है। निर्मला सीतारमण अगर दुनिया की तारीख (इतिहास) पढती तो उन्हें पता चल जाता कि 70 साल नहीं पिछले 55 साल पहले 1964 में पूरी दुनिया की मईशत (अर्थव्यवस्था) एक अशारिया आठ (1.8) ट्रिलियन डालर थी। 2014 में दुनिया की मईशत (अर्थव्यवस्था) उन्नासी अशारिया उन्तीस (79.29) थी जो इस वक्त 2019 में बढ कर सत्तासी ट्रिलियन हो गई है। मतलब यह कि पांच सालों में पूरी दुनिया मिलकर पौने आठ ट्रिलियन का इजाफा कर सकी, लेकिन मोदी अगले पांच सालों में अकेले ही सवा दो ट्रिलियन का इजाफा कर लेने की बात कर रहे हैं। मतलब यह कि उनका यह बयान भी जुमला ही साबित होगा।
नोटबंदी और जीएसटी से देश में जो तबाही आई उसे सरकार बड़ी खूबसूरती से छिपा रही है। अभी तक तो छोटी और घरेलू सनअतें (उद्योग) ही बंद हो रही थीं, अब तो देश का आटोमोबाइल सेक्टर भी गर्क होता नजर आ रहा है। पिछले छः महीनों में ही कारों और मोटर साइकिलों के बनने में एक-तिहाई से ज्यादा की कमी आई है। आटो मोबाइल कम्पनियां हर हफ्ते एक से तीन दिनों तक अपने कारखानें बंद करने पर मजबूर हैं। मुंबई, दिल्ली और गुड़गांव इन्हीं तीन शहरों में मोटर साइकिल और कारों के तकरीबन अस्सी डीलरों ने अपने शोरूम बंद कर दिए हैं। इलेक्ट्रानिक सामानों के शोरूम भी मुसलसल बंद ही हो रहे हैं। कांस्ट्रक्शन इंडस्ट्री पहले ही दम तोड़ चुकी है। काश्तकारी से कोई फायदा नहीं है, फिर भी मोदी पांच साल में पांच ट्रिलियन इकोनामी की बात कर रहे हैं। हैरत तो देश के लोगों पर है कि पांच साल में मोदी के तमाम वादे गलत साबित होने के बावजूद उन्होने सिर्फ धर्म के नशे में बहकर 2014 के मुकाबले 2019 मे ज्यादा अक्सरियत से जिता कर मोदी की दोबारा सरकार बनवा दी।
हमने निर्मला सीतारमण के बजट को बजट के बजाए बही-खाता कहा है क्योंकि अब मोदी सरकार हर मौके पर देश के लोगों को मजहब से मुताल्लिक मैसेज देने की कोशिश कर रही है। बजट की तकरीर कोई फाइनेंस मिनिस्टर ब्रीफकेस में रख कर लाए या ‘ओउम लाभ’ के लाल रंग के बस्ते में इसका एकनामी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। इसके बावजूद लाल रंग के बस्ते से देश को यह मैसेज देने की कोशिश की गई कि हम देश की हजारों साल की रिवायत को दोबारा जिंदा कर रहे हैं। वजीर-ए-आजम के चीफ एकनामिक एडवाइजर कृष्णा मूर्ति सुब्रामण्यम ने तो साफ तौर पर कह ही दिया कि ब्रीफ केस के बजाए लाल रंग के बस्ते में बजट लाकर साबित कर दिया गया है कि हम पच्छिमी मुल्कों के ख्यालात (विचारों) की गुलामी से बाहर निकल आए हैं। शायद जरूरत से कुछ ज्यादा ही अक्लमंदी और राष्ट्रवाद का मजाहिरा करते हुए सलाहकार यह भूल गए कि एक दिन पहले ही एकनामिक सर्वे पेश करते हुए वह खुद ही कह चुके थे कि इस बार का बजट शिकागो (अमरीका) युनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर के ख्यालात के मुताबिक है। पच्छिमी देशों की गुलामी के ख्यालात से बाहर निकल आने का एलान करने वाले कृष्ण मूर्ति सुब्रामण्यम यह भी भूल गए कि वह पच्छिमी देशों की ही पोशाक ‘सूट’ पहने खड़े हैं। अगर वह पच्छिमी देशों की सकाफत  (संस्कृतिक) गुलामी से निकल चुके हैं तो उन्हें तो पीले या केसरिया रंग की धोती और कुर्ता पहन कर आना चाहिए था। इसे ही ढोग कहा जाता है और इस किस्म के ख्यालात वाले चीफ एकनामिक एडवाइजर के सहारे ही अगर वजीर-ए-आजम मोदी अगले पांच सालों में पांच ट्रिलियन की एकनामी बनने का ख्वाब देख रहे हैं तो उनका भगवान ही मालिक है।
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में फौरन इजाफा कर दिया गया। रेलवे को प्राइवेट हाथों में सौंपने का साफ इशारा है। प्राइवेट ट्रेन बहुत जल्द लखनऊ और दिल्ली के आनन्द बिहार के दरम्यान चलने जा रही है। पब्लिक सेक्टर की जमीन जायदाद भी सरकार को पसंद नहीं आ रही है। इसलिए उन्हें भी बेचने की पूरी तैयारियां हैं। दिल्ली मेट्रो की मिसाल मौजूद है कि प्राइवेट हाथों में रेलें चलने वाली हैं। नई दिल्ली और एयरपोर्ट के दरम्यान का मेट्रो रूट अनिल अंबानी की कम्पनी ने लिया था। कुछ दिन चलाने के बाद वह भाग खड़े हुए क्योंकि प्रोजेक्ट में खसारा होने लगा था। पब्लिक सेक्टर कम्पनियों की जमीनों पर सस्ते मकान बनवा कर आम लोगों को दिए जाने की बात कही गई है। जाहिर है मकान बनाने का काम किसी न किसी प्राइवेट कांस्ट्रक्शन कम्पनी से ही कराया जाएगा। यानी सोने और हीरे से भी ज्यादा महंगी जमीनें मिट्टी की कीमत में बिल्डर्स के हाथों में चली जाएगी। वह बडे़-बडे़ आलीशान टावर खडे़ कर के हजारों करोड़ कमाएंगे। दस से बीस फीसद तक मकान कम कीमत पर भी दे देंगे।
निर्मला सीतारमण के इस बही-खाते में कहा गया है कि 2022 तक हम देश के हर घर में नल का पानी पहुंचा देंगे। नीति आयोग की रिपोर्ट बता चुकी है कि अगले साल यानि 2020 के आखिर तक दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद समेत देश के 27 बडे़ शहरों में जेरे जमीन पानी (भूगर्भ जल) खत्म हो जाएगा। सवाल यह है कि हर घर को नल का पानी पहुंचाने के लिए पानी आएगा कहां से? सरकारी चालाकी का आलम यह है कि चेन्नई में जहां पानी के लिए लोग तरस रहे हैं उसका तो जिक्र तक फाइनेंस मिनिस्टर ने नहीं किया लेकिन हर घर को पानी पहुंचाने की बात का नारा जरूर दे दिया। इस बही-खाते में यह भी कहा गया कि घरों से निकलने वाले गंदे पानी को साफ करके खेती के इस्तेमाल में लाया जाएगा। यह नामुमकिन है क्योंकि इसके लिए जितना बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर चाहिए उसे तैयार करने में दस साल से ज्यादा का वक्त लग सकता है जो सरकार अभी तक सर पर गंदगी ढोने का काम बंद नहीं कर सकी, सीवर लाइनों को साफ करने के लिए मशीनों के बजाए इंसानों को उतारा जाता हो और मेन होल में उतरने वाले नौजवान उसी में दम घुटने से मर जाते हों उस मुल्क की फाइनेंस मिनिस्टर अगर यह कहें कि घरों से निकलने वाले गंदे पानी को साफ करके खेती लायक बनाया जाएगा तो इससे बड़ा झूट और क्या हो सकता है।
सरकार के खुशामदी अखबारों और टीवी चैनलों पर इस बही-खाते के लिए प्रोपगण्डा कराया गया कि अब तिजोरी से माल निकल कर गरीबों तक पहुंचाया जाएगा। यानि बड़े लोगों पर ज्यादा टैक्स लगेगा। हकीकत यह है कि अमली तौर पर किया इसका उल्टा गया है। अब ढाई सौ करोड़ के बजाए चार सौ करोड़ तक के सालाना टर्न ओवर वाली कम्पनियों और कारपोरेट सेक्टर को 25 फीसद टैक्स ही देना पडे़गा। हालांकि अभी तक ढाई सौ करोड़ तक टर्न ओवर वाली कम्पनियों को 25 फीसद और उससे ज्यादा टर्न ओवर वाली कम्पनियों को चालीस फीसद टैक्स देना पड़ता था। सरकार के नए फैसले से मुल्क की 99 फीसद से ज्यादा कम्पनियां और कारपोरेट घराने 40 के बजाए 25 फीसद टैक्स के दायरे में आ गए हैं। लेकिन आम आदमियों और तंख्वाह दार सरकारी मुलाजमीन को इनकम टैक्स में कोई छूट नहीं दी गई है।
तालीम के लिए भी कोई खास बंदोबस्त नहीं दिखाया गया है। लेकिन निर्मला सीतारमण ने यह जरूर कहा कि ‘स्टडी इन इंडिया’ नाम से नई स्कीम शुरू की जाएगी ताकि गैर मुल्की तालिब इल्म भी आला तालीम हासिल करने के लिए हिन्दुस्तान आएं। वह यह भूल गईं कि उन्हीं की पिछली सरकार 2018 में ही यह स्कीम शुरू कर चुकी है। 18 अप्रैल 2018 को इस स्कीम का इफ्तेताह करते हुए उस वक्त की वजीर खारजा (विदेश मंत्री) सुषमा स्वराज ने कहा था कि इस स्कीम के तहत हर साल 15 हजार गैर मुल्की तलबा आला तालीम हासिल करने के लिए हिन्दुस्तान आएंगे। निर्मला सीतारमण यह बात गोल कर गईं इसलिए यह भी नहीं बताया कि अप्रैल 2018 से कितने गैरमुल्की तालिब इल्म हिन्दुस्तान में आला तालीम हासिल करने आए।
पहले लोक सभा एलक्शन की पूरी मुहिम और फिर बजट, वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी और उनका एक भी वजीर नोटबंदी का जिक्र नहीं करते, नोटबंदी करते वक्त तो मोदी ने उसके बहुत सारे फायदे गिनवाए थे। अगर उनका वह फैसला मुल्क के लिए फायदेमंद था तो अब नोटबंदी का नाम क्यों नहीं लेते। क्या यह समझा जाना चाहिए कि अब उनकी भी समझ में आ गया है कि नोटबंदी का उनका फैसला देश को तबाह करने वाला था। सिर्फ नोटबंदी ही नहीं 2014 से 2019 तक ‘स्वच्छता अभियान’, ‘स्टार्टअप इंडिया’, ‘स्टैण्ड अप इंडिया’, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’ समेत एक भी नारा या प्रोजेक्ट कामयाब नहीं हो पाया है। शायद इसीलिए उन्होने अपने तमाम पुराने नारों का जिक्र करना छोड़ दिया है। कुछ के तो नाम ही तब्दील कर दिए हैं ताकि नए नारे के साथ देश को अगले पांच साल तक और बेवकूफ बनाया जा सके। मसलन उन्होंने ‘स्वच्छ भारत’ के बजाए ‘सुन्दर भारत’ का नारा दे दिया। ‘बेटी बचाओ बेटी पढाओ’ की जगह ‘आपकी धन लक्ष्मी’ और ‘आपकी विजय लक्ष्मी’ ‘टैक्स चोरी’ को टैक्स अनुपालन’ एलपीजी सब्सिडी छोड़िए के बजाए एलपीजी सब्सिडी पर गौर कीजिए कर दिया गया है।
वजीर-ए-आजम मोदी अगले पांच सालों में देश की मईशत (अर्थ व्यवस्था) पौने तीन (2.75) ट्रिलियन डालर से बढा कर पांच ट्रिलियन डालर करने का दावा तो कर रहे हैं लेकिन यह कैसे होगा उसके लिए निर्मला सीतारमण के बही-खाते में कहा गया है कि निजी सरमायाकारी (निवेश) और बडे़ पैमाने पर गैर मुल्की सरमायाकारी की उन्हें उम्मीद है। सवाल यह है कि जब लोगों की आमदनी ही नहीं होगी तो निजी सरमायाकारी कहां से होगी? पांच साल की अपनी पिछली सरकार में नरेन्द्र मोदी दुनिया के छोटे-बडे़ तकरीबन तमाम मुल्क घूम आए लेकिन कोई सरमायाकारी नहीं आई तो अब उसकी उम्मीद कैसे की जाए?

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