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एलाज, पानी और एक इलेक्शन

हिसाम सिद्दीकी

बिहार के मुजफ्फरपुर में तकरीबन दो सौ बच्चों की जानें चली गईं, पुराने मद्रास और अब चेन्नई जैसा खूबसूरत तारीखी शहर एक-एक बूंद पानी को तरसता रहा, भारत सरकार के ‘नीति आयोग’ ने अपनी रिपोर्ट जारी करके वार्निंग दे दी कि अगले साल यानी 2020 के आखिर तक दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद समेत मुल्क के सत्ताइस (27) बडे़ शहरों मे जमीन के अंदर का पानी (अण्डर ग्राउण्ड वाटर) खत्म हो जाएगा यानी उन सत्ताइस शहरों के हालात भी चेन्नई जैसे हो जाएंगे जहां अस्पतालों में पानी नहीं, घरों-मोहल्लों में पानी नहीं, होटलों में पानी नहीं, दफ्तरों में पानी नहीं।

मुजफ्फरपुर में बच्चों को मरने से रोकने के लिए उनके इलाज का बंदोबस्त और चेन्नई शहर को पानी फराहम कराने के लिए रियासती और मरकजी सरकारों ने कोई इमरजेंसी प्रोग्राम बनाने के बजाए बहाने तलाशने का ही काम किया। मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत की जिम्मेदारी इस मौसम की मशहूर और बडे पैमाने पर इस्तेमाल की जाने वाली ‘लीची’ पर डाल दी गई। अब लीची बेचारी तो फसल ठहरी, वह बोल भी नहीं सकती वह सफाई भी नहीं दे सकती कि साहब बच्चों की जान लेने का काम हमने नहीं किया है। लीची पर इल्जाम डाल कर बीजेपी के कुछ लीडरान ने उन बागबानों को भी बच्चों की तरह मरने की कगार तक पहुंचा दिया जो लीची की बागबानी करते हैं जिनकी जिंदगी और कुन्बों को पालने का सारा दारोमदार लीची की फसल पर रहता है। इन तमाम हंगामों के दरम्यान हमारे मुल्क के सबसे बडे़ साहब यानी वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी मुजफ्फरपुर और चेन्नई की आफतों के लिए फिक्रमंद दिखने के बजाए वन नेशन-वन एलक्शन के लिए इतने परेशान दिखे कि तकरीबन पांच घंटों तक मीटिंग करते रहे।

एक देश एक एलक्शन के लिए वह फिक्रमंद दिखे जिसपर पांच साल बाद 2024 में अमल होना है वह भी तब जब देश की तमाम सियासी पार्टियांं को यह मंजूर हो और संविधान के मुताबिक एलक्शन कमीशन इसके लिए तैयार हो। मतलब यह कि जो काम पांच साल बाद होना है उसके लिए तो ‘बडे़ साहब’ चार-पांच घंटों तक मीटिंग कर सकते हैं लेकिन बच्चों की जानें बचाने और प्यासी चेन्नई को पानी फराहम करने जैसे इंतेहाई अर्जेंट मसायल के लिए उनके पास चार-पांच मिनट का भी वक्त नहीं है। इक्कीस जून को वह इण्टरनेशनल योग दिवस के लिए झारखण्ड जा सकते हैं लेकिन मुजफ्फरपुर जाने का वक्त उन्हें नहीं मिला। योग अच्छी बात है सेहत के लिए बहुत मुफीद है लेकिन योग तो तभी होगा जब लोग जिंदा रहेंगे अगर पैदाइश के दो-चार या दस साल के अंदर ही बच्चों की जानें चली जाएंगी या आम लोग प्यासे होंगे तो योगा कौन करेगा?

पार्लियामेंट के मुश्तरका एजलास (संयुक्त अधिवेशन) को खिताब करते हुए देश के राष्ट्रपति ने देश से वादा किया है कि 2022 तक सबको सड़क, पानी और बिजली फराहम (उपलब्ध) करा दिए जाएंगे। जाहिर है राष्ट्रपति की जो तकरीर होती है वह सरकार तैयार करती है कैबिनेट में उसे पास करके राष्ट्रपति को भेजा जाता है आम तौर पर राष्ट्रपति उसे ही पार्लियामेंट के मुश्तरका एजलास के सामने पढ देते हैं।

बहुत कम मौके ऐसे होते हैं जब राष्ट्रपति सरकार और कैबिनेट के जरिए भेजी गई तकरीर में कोई रद्दोबदल या कमीबेशी करते हों। इसीलिए हम यह मान कर चलते हैं कि राष्ट्रपति ने पार्लियामेंट के मुश्तरका एजलास के जरिए देश से जो वादे किए हैं वह दरअस्ल सरकार और वजीर-ए-आजम मोदी के वादे हैं। हम अगर चाहें भी तो इन वादों पर यकीन नहीं कर सकते क्योंकि देश के एक सौ तीस करोड़ लोगों तक पहुंचाने के लिए पानी आएगा कहां से? इस बार मोदी ने पानी के लिए अलग वजारत कायम कर दी है। अब यह वजारत इस बात पर गौर करेगी कि आखिर देश में पानी की किल्लत दूर करने के लिए क्या किया जाए?

वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी ने तीस मई से अपनी सरकार की दूसरी पारी शुरू की है। इससे पहले वह पांच साल तक देश की सत्ता संभाल चुके हैं उससे पहले 2001 से मई 2014 तक तकरीबन तेरह सालों तक गुजरात के चीफ मिनिस्टर रहे हैं। गुजरात माडल का प्रोपगण्डा खूब कराया था, लेकिन पीने के पानी का बंदोबस्त कभी उनकी तरजीहात (प्राथमिकताआें) में रहा ऐसा कभी सुना नहीं गया। अगर पानी भी उनकी तरजीहात में रहा होता तो आज कम से कम गुजरात में पानी की किल्लत न होती।

आज सऊदी अरब और यूनाइटेड अरब अमीरात जैसे कई मुल्क हैं जहां समन्दर का खारा पानी साफ करके पीने लायक मीठा बनाने के बड़े-बडे़ प्लाण्ट लग चुके हैं क्योकि उन मुल्कों में जमीन के नीचे पानी नहीं है। सऊदी अरब के बड़े तिजारती शहर जेद्दाह में पीने के पानी की शदीद किल्लत थी। समन्दर में प्लाण्ट लगाकर सऊदी सरकार ने लोगों को इतना पानी फराहम (उपलब्ध) करा दिया कि आज लोग उसी पानी की मदद से खेती भी करते हैं। खालिस रेगिस्तान होने के बावजूद किस्म-किस्म की सब्जियां पैदा कर रहे हैं। हमारा मुल्क तो तीन तरफ से समन्दर से घिरा हुआ है अगर उस तरह के ‘वाटर ट्रीटमेंट प्लाण्ट’ लगाए जाएं तो पानी की किल्लत दूर हो सकती है। चेन्नई तक में पानी की किल्लत हो जाए इससे ज्यादा शर्मनाक सूरते हाल क्या हो सकती है।

हमारे वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी की गुजरात से ही तरजीहात (प्राथमिकताएं) ऐसी रही हैं जिनमें पानी की बर्बादी तो हो सकती है पानी की फराहमी (उपलब्धता) नहीं हो सकती। अब जो लोग आंख बंद करके वजीर-ए-आजम मोदी के कामों और प्रोग्रामों की हिमायत करते हैं उन्हें शायद ऐसा लगता है कि चन्द्रयान पर बेशुमार दौलत खर्च करके हमारी सरकार चांद से पानी ले आएगी बुलेट ट्रेन चलने से माहौल (वातावरण) में जो गर्मी पैदा होगी उससे बच्चों को आने वाले बुखार और दीगर अमराज (बीमारियों) के जरासीम मर जाएंगे फिर न चेन्नई की तरह किसी शहर में पीने के पानी की किल्लत होगी न मुजफ्फरपुर की तरह कोई कातिल बुखार हमारे मासूम बच्चों की जान ले पाएगा।

मुजफ्फरपुर में बच्चों की जाने बचाने की दवाएं भी शायद रफेल फाइटर के साथ आने लगेंगी। सरकार के इस दस्तावेज में राष्ट्रपति ने कहा कि पचास करोड़ गरीबों के लिए ‘आयुष्मान भारत स्कीम’ लागू की गई है इस स्कीम के जरिए अब तक 26 लाख गरीब मरीजों का इलाज कराया जा चुका है। क्या आयुष्मान भारत स्कीम के फण्ड से मुजफ्फरपुर और गोरखपुर में हर साल बच्चों को मौत के मुंह में ढकेलने वाले बुखार का वैक्सीन तैयार नहीं हो सकता था? मुजफ्फरपुर में कह दिया गया कि बच्चों को कौन सा बुखार हो रहा है इसका पता ही नहीं चल पाया है। इसीलिए सारा इल्जाम लीची के सर मढ दिया गया अब यह कहा गया है कि बारिश होने पर ही इस बुखार का वायरस कण्ट्रोल में आएगा बारिश के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। मतलब यह कि लीचियों के साथ-साथ अब बुखार की सारी जिम्मेदारी भगवान या खुदा पर डाल दी गई है कि भगवान का दिया हुआ बुखार का वायरस है तो अब बारिश करके भगवान ही वायरस को कण्ट्रोल करें सरकारें तो सिर्फ बयानबाजी करेंगी।

‘एक देश एक एलक्शन’ जिसे दूसरी बार सत्ता में आते ही नरेन्द्र मोदी ने अपनी पहली तरजीह (प्राथमिकता) बना दिया यह कोई नई बात नहीं है। एक देश एक एलक्शन और ‘अमरीकी र्फाम आफ डिमाक्रेसी’ की बात देश में पहले भी कम से कम दो बार उठ चुकी है। जो भी लीडर नरेन्द्र मोदी की तरह अवाम के दरम्यान मकबूलियत (लोकप्रियता) हासिल कर लेता है वही इस किस्म की बातें करने लगता है। सत्तर की दहाई में इंदिरा गांधी ने मकबूलियत हासिल कर ली थी तो वह भी अमरीका की तर्ज पर एलक्शन कराने की बातें करने लगी थीं। दूसरी बार सोमनाथ से अयोध्या तक रथ यात्रा निकाल कर दंगे कराने के बाद लाल कृष्ण आडवानी की मकबूलियत आसमान छूने लगी थी।

तब आडवानी ने भी कहना शुरू कर दिया था कि मुल्क में मौजूदा पार्लियामानी डिमाक्रेसी के बजाए अमरीका की तरह प्रेसिडेंंशियल फार्म आफ डिमाक्रेसी होनी चाहिए। जिसमें सबसे ज्यादा वोट पाने वाला लीडर मुल्क का सदर या वजीर-ए-आजम बन जाए फिर वह अपनी मर्जी से बाकी तमाम वजीरों की तकर्रूरी (नियुक्ति) करे। अब मोदी ने मकबूलियत हासिल कर ली है तो उन्होने एक देश एक एलक्शन की बात शुरू कर दी है। उनके जेहन में शायद यह है कि एक साथ एलक्शन होने से उनके जैसे मकबूल लीडर की पार्टी ही लोक सभा और रियासती असम्बलियों के लिए जीत जाएगी। उनका यह ख्याल पूरी तरह से दुरूस्त नहीं है। क्योंकि 2014 के बाद 2019 में उनकी मकबूलियत देश के किसी भी दूसरे लीडर से कहीं ज्यादा रही है। इसके बावजूद उड़ीसा और आन्ध्र प्रदेश असम्बलियों के एलक्शन लोक सभा एलक्शन के साथ हुए दोनों प्रदेश असम्बलियों में बीजेपी कहीं टिक नहीं पाई है।

उड़ीसा में तो बीजेपी को लोक सभा के लिए कामयाबी भी मिली असम्बली में कुछ नहीं हुआ लेकिन आध्र प्रदेश में तो असम्बली और लोक सभा दोनां चुनावों में मोदी की पार्टी को कुछ नहीं मिला है।

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