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एक नज़र ही तो है,जिसने साहिर को साहिर बनाया…

ऐलप्यू सिंह

ले दे के ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है, क्यूं देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम 

साहिर की ज़िंदगी इसी नज़र का आइना है। अपने ही लिखी इन लाइनों में साहिर ने खुद की ही ज़िंदगी का फलसफा जैसे लिख दिया हो। बॉलीवुड में शायर तो कई हुए लेकिन मुख्तलिफ नजर रख उसे जीने का हौसला शायद साहिर ही कर पाए।। पल दो पल के शायर वो नहीं थे, अपनी शर्तों पर जीने वाले । अपनी शर्तों पर लिखने वाले। इश्क और इंकलाब के शायर साहिर की ज़िंदगी को अगर कोई वक्त की इमारत मानकर भीतर झांकने की

कोशिश करे, तो झरोखों से छनती रोशनी उन कोनों में भी दिखेगी जहां अमूमन लोगों की नज़रें नहीं जाती । आम आदमी की जुबां में लिखने वाले इस शायर की खुद की नज़र वहां तक जाती थी,जहां आम नज़र की परिधि खत्म होती है।

ये बात है कि जब 60 के दशक में प्यासा फिल्म का गीत ‘जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं’ बजा, तब गाने के खत्म होने तक दर्शक सीटों से उठ तालियां बजाते रहे। इन तालियों के पीछे सबसे बड़ी वजह गीत के लफ्ज थे,जो साहिर की ही

कलम से निकले थे,लेकिन यही शायर जब इसी फिल्म के लिए लिखता है कि ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है,तो जैसे उसके लिखे और कहे दोनों पर ऐतबार होता है। ये दुनिया अगर मिल भी जाए के जरिए क्या उस नजरिये की झलक नहीं मिलती,जिसके सांचे में ही साहिर का बचपन,जवानी सब गुजरे।ये दौलत मिल भी जाए तो क्या है,ये इश्क मिल भी जाए तो क्या है।

साहिर को पढ़ने वाले अक्सर कहते हैं कि इश्क की दुयानवी मंजिलें उन्हें हासिल ना हो पाईं। अमृता प्रीतम, सुधा मल्होत्रा और इशर कौर। ज़िंदगी के कई पड़ावों पर मुहब्बत ने दस्तक दी,लेकिन कॉलेज के इंकलाबी दिनों से लेकर

ताउम्र तक मजलूमों और बेबसी के सवाल उन्हें इश्क की रुमानियत से शायद ज्यादा परेशान करते रहे । माना जाता है कि कॉलेज की दोस्त इशर कौर से रिश्ता टूटने के बाद साहिर ने ये नज्म ,’ किसी को उदास देखकर’ लिखी,जो इश्क से ज्यादा जिंदगी के इंकलाबी रंग को खुद के ज्यादा नजदीक पाती है।

ये करखानों मे लोहे क शोरो-गुल जिसमे,है दफ़्न लाखों गरीबो की रूह का नग्मा।

ये शाहराहों पे रंगीन साडियों की झलक, ये झोपडों मे गरीबों की बेकफ़न लाशें।

ये गम बहुत है मेरी ज़िन्दगी मिटाने को, उदास रह के मेरे दिल को और रंज न दो।

उनके और अमृता प्रीतम का प्रेम समझने के लिए भी दुनियावी नज़र को पार रख कर देखना होगा । दो साहित्यका्रों का प्रेम ऐसा ही था अव्यक्त और लेकिन अधूरा नहीं । सृजन के लिए जिस बौद्धिक ज़मीन की ज़रुरत होती है वो ऐसे ही रिश्तों में सामने आती है । दुनिया की नज़र में जो प्रेम अधूरा रह गया उसे साहित्य की शक्ल में एक प्रेरक ठंडी छांव नसीब हो गई थी । यूं कहा भी जाता है कि

असल में सृजन की राह ऐसे ही जज्बातों का सफर तय करती है। एक दफा एक पत्रकार ने साहिर से एक इंटरव्यू के दौरान पूछ डाला ” कि आपकी पैदाइश कहां और कब हुई तब उल्टा साहिर ने जवाब दिया, “ऐ जिद्दत पसंद नौजवान, ये तो बड़ा रवायती सवाल है.

इस रवायत को आगे बढ़ाते हुए इसमें इतना इज़ाफ़ा और कर लो- क्यों पैदा हुए?”।  यानि जमाने और खुद से सवाल करने वाला शायर,ज़िंदगी के मायने तलाशने वाला शायर । मजलूमों और बेबसों के सवाल जहन में रचनात्मकता की जमीन को हमेशा उर्वर करते रहे यही वजह है कि लुधियाना में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान रुमानियत की गलियों से गुजरने पर भी तलाश  मजदूरों  के घरों की ही होती थी, तभी लिखा करते थे ‘ कसम उन तंग गलियों की जहां मज़दूर रहते हैं’.

कांधों पर संगीन कुदालें होंठों पर बेबाक तराने, दहकानों के दल निकले हैं अपनी बिगड़ी आप बनाने।

आज पुरानी तदबीरों से आग के शोले थम न सकेंगे,उभरे जज्बे दब न सकेंगे, उखड़े परचम जम न सकेंगे।

ऑल इण्डिया रेडियो में गीतकार का नाम शामिल  शुरु कराने की परंपरा हो या संगीतकार से एक रुपये ज्यादा पारिश्रामिक लेने की जिद। ये उसूलों वाले साहिर थे। जिनका रुतबा बॉलीवुड में एक अलग किस्म

की अडियल शख्सियत का था, जो अपने ऊसूलों के लिए अपना नुकसान भी सह लेने को तैयार था । एक वाक्या उनके तीखे व्यंग वाली लेखनी से जुड़ा हुआ है। 1954 में एक फिल्म आई थी नास्तिक,जिसका

एक गीत बहुत मशहूर हुआ था ।

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान,कितना बदल गया इंसान सूरज ना बदला,चांद ना बदला, ना बदला आसमान कितना बदल गया इंसान ….

कवि प्रदीप के इस ज्वलंत लेखन को व्यंग के रुप में अगले ही साल फिल्म रेलवे प्लेटफॉर्म में साहिर ने कुछ ऐसे लिखा । लीक से हट कर सच्चाई को तीखे व्यंग की चाशनी में लपेट कर पेश करना उनकी कलम की खासियत थी।

देख तेरे भगवान की हालत क्या हो गई इंसान कितना बदल गया भगवान ,भूखों के घर पहरा ना डाले, सेठों का हो मेहमान,कितना बदल गया भगवान । 

ज़िंदगी को लेकर साहिर के नजरिए की एक और मिसाल। उन पर रिसर्च करने वाले लोगों का मानना है कि वो बड़े जमघटों और बिना मकसद तारीफों के पुल बनाने वाले लोगों से दूर रहते थे। हो सकता है कि यही वजह हो वो ज़िंदगी की क्रूर असमानताओं को दुनियावी चमक-दमक के आर पार देख पाते थे। साहिर की कलम से जो भी लिखा गया, वो देश और समाज के किसी भी कालखंड पर हूबहू फिट बैठता है। इसीलिए उनका लिखा कि वो पल दो पल के शायर हैं,सही नहीं लगता। वो तो हर दौर के शायर हैं।

तू हिंदू बनेगा,ना मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है

या फिर

औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया हर जज्बात,हर फलसफे को साहिर की कलम ने और चटकीला बनाया है। उनके गीतों में गहरे उतरने के बाद भी उनकी सोच में पूरा उतर कर देखना आज भी असंभव ही लगता है। उनके गीतों की खासियत ये है कि सूफी शायरी की तरह, इनमें जो आप देखना चाहते हैं,आपको वही दिखाई देगा। वो रूमानी शायर थे कि इंकलाबी,इसको लेकर कई तरह के तर्क दिए जाते हैं । एक से बढकर

एक रुमानी  नज्में  लिखने वाले साहिर जब प्रेमिका से कहते हैं कि “प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी, तू बता दे कि तुझे प्यार करूं या न करूं। तो उन्हें पढ़ने वालों को लगता है कि वो मूल रुप से

रूमानी शायर ही थे ,जो दुनियावी इश्क के अधूरे किस्सों को रूहानी तौर पर मुकम्मल करते रहे। लेकिन एक नजर अगर उनकी लहू में गर्मी दौड़ाने वाली नज्मों को कोई पढ़ ले तो फैसला करना मुश्किल हो जाए

शोर मचा है बाजारों में, टूट गए दर जिंदानों के वापस मांग रही है दुनिया ग़सबशुदा हक इंसानों के।

संजय लीला भंसाली साहिर पर फिल्म बना रहे हैं  । बहुत जरुरी है कि  साहिर  की कहानी पर्दे पर आए ।आज की नई पीढ़ी उस दौर को , उस शख्सियत को समझे । वो जाने एक शायर की कहानी । ये भी जानें कि ये शायर पल दो पल का नहीं था । अपने गीतों के ज़रिए समाज की जिस गंदगी की ओर ध्यान  दिलाना चाहता था वो आज ज्यादा बदबूदार है । आम आदमी की मजबूर सांसें आज भी सियासत के फंदे में कैद हैं । लेकिन रास्ता सिर्फ संघर्ष ही है । एक शायर की शक्ल

में साहिर का जीवन इन्हीं सवालों और जवाब पाने के संघर्ष से घिरा रहा । वो शायर जो अपने फन में माहिर था , जो सवाल उठाता था,जो जवाब मांगता था । आज की पीढ़ी के सामने  हीरोज़ की कमी है । वो प्रेम , करूणा , साहस से जीवन जीने वाले लोगों को नहीं जानते । ज़रुरी है कि वो साहिर को जानें । और जानें कि फकत वो नजर ही थी जिसने साहिर को साहिर बनाया।