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मोदी सरकार में तबाह हुई मुल्क की अर्थव्यवस्था

हिसाम सिद्दीकी

नई दिल्ली: कई योरपियन मुल्कों से बेहतर मईशत (अर्थव्यवस्था) होने का दावा गलत निकला। हकीकत यह है कि वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी की साढे चार साल की सरकार के दौरान मुल्क की मईशत (अर्थव्यवस्था) तबाही के दहाने पर पहुच चुकी है। इसी लिए मोदी सरकार रिजर्व बैंक आफ इंडिया पर दबाव बना रही है कि आरबीआई के पास जो नौ लाख साठ हजार (9.60) करोड़ का रिजर्व फण्ड है उसमें से एक-तिहाई से ज्यादा तीन लाख साठ हजार (3.60) करोड़ का फण्ड वह फाइनेंस मिनिस्ट्री के हवाले कर दे। मोदी सरकार के अब आखिरी पांच-छः महीने ही बचे हैं इतनी बड़ी रकम रिजर्व बैंक से छीन कर सरकार उसका क्या इस्तेमाल करेगी और पैसा किसे दिया जाएगा? इन सवालात का जवाब न मिलने की वजह से रिजर्व बैंक कोई जोखिम मोल नहीं लेना चाहता। इसलिए आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल और डिप्टी गवर्नर विरल आचार्या ने यह रिजर्व फण्ड सरकार को देने से साफ इंकार कर दिया। रिजर्व बैंक के इंकार करने के बाद से सरकार और रिजर्व बैंक आफ इंडिया के दरम्यान तलवारें खिची हुई हैं। आरबीआई के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स की मीटिंग उन्नीस (19) नवम्बर को मुंबई में होने वाली है।

इसी मीटिंग पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। इस मीटिंग के बाद ही पता चल सकेगा कि रिजर्व बैंंक आफ इंडिया की खुदमुख्तारी (आटोनामी) बाकी रहेगी या मुल्क के बाकी तमाम संवैधानिक इदारों (संस्थाओं) की तरह आरबीआई की आटोनामी खत्म कर दी जाएगी। खबर है कि रिजर्व बैंक के बोर्ड में मोदी सरकार के जरिए नामजद डायरेक्टर्स सरकार की हिमायत में बोर्ड को फैसला लेने के लिए मजबूर करेंगे। मोदी सरकार की जानिब से नामजद डायरेक्टर व एडवाइजर एस गुरूमूर्ति के लिए कहा जाता है कि उन्होने एक मीटिंग के दौरान गुजिश्ता दिनों आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल और डिप्टी गवर्नर विरल आचार्या के साथ धमकी भरे अंदाज में बात की थी। फाइनेंस मिनिस्टर अरूण जेटली और वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी दोनों ने उर्जित पटेल और विरल आचार्या की बात सुनने के बजाए आरबीआई एक्ट की दफा सात (सेक्शन-7) का इस्तेमाल करके आरबीआई के कामकाज में दखल देने के लिए अरूण जेटली ने अपना इरादा जाहिर किया तो गवर्नर उर्जित पटेल ने इस्तीफा देने की पेशकश कर दी। उनके इस कदम से सरकार में हड़कम्प मच गया और अरूण जेटली को अपना प्रोग्राम मुल्तवी करना पड़ा।

मआशी (आर्थिक) मामलात के माहिरीन को एतमाद (विश्वास) में लिए बगैर मोदी ने पहले अचानक नोटबंदी की फिर उससे मुल्क पर पड़ने वाले उल्टे व बुरे असरात को छिपाने के लिए कई ऐसे काम और फैसले कर डाले कि उनकी वजह से न सिर्फ मुल्क की मईशत (अर्थव्यवस्था) तबाही के दहाने पर पहुच गई बल्कि कई बैंकों को जबरदस्त खसारा उठाना पड़ा है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर रहे अरूण शत्रुधन सिन्हा और मुल्क के फाइनेंस व खारजा (विदेश) मिनिस्टर रह चुके यशवंत सिन्हा तो खुलकर कह रहे हैं कि वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी और फाइनेंस मिनिस्टर अरूण जेटली दोनों को मआशी (आर्थिक) मामलात का कुछ भी इल्म नहीं है। इसलिए दोनों ने मिलकर मुल्क की मईशत (अर्थव्यवस्था) को तबाह व बर्बाद कर दिया है।

आरबीआई के रिजर्व फण्ड से तीन लाख साठ हजार करोड़ की रकम लेने की मोदी सरकार की कोशिशों पर सख्त हमला करते हुए कांग्रेस लीडरान ने कहा है कि यह तो आरबीआई पर सीधे-सीधे डाका डालने जैसी हरकत है। पार्टी तर्जुमान मनीष तिवारी ने कहा है कि यह आरबीआई का अख्तियार है कि वह सरमायाकारों (निवेशकों) का भरोसा कायम रखने और मुल्क की मईशत (अर्थव्यवस्था) को मजबूत बनाए रखने के लिए कितना रिजर्व फण्ड अपने पास रखती है। सरकार यह कैसे कह सकती है कि आरबीआई के पास रिजर्व फण्ड बहुत ज्यादा हो गया है इसलिए उस  फण्ड का एक बड़ा हिस्सा वह सरकार को दे दे और सरकार उसका मनमाना इस्तेमाल करती रहे। मनीष तिवारी ने इल्जाम लगाया है कि मोदी सरकार आरबीआई के फण्ड से तीन लाख साठ हजार करोड़ लेकर उसका इस्तेमाल अगले साल के लोक सभा एलक्शन में करना चाहती है।

नोटबंदी और उसी किस्म के मोदी के कई नुक्सानदेह फैसलों की वजह से रिजर्व बैंक आफ इंडिया के उस वक्त के गवर्नर रघुराम राजन से नरेन्द्र मोदी के ताल्लुकात बहुत ज्यादा खराब हो गए थे तो मोदी ने रघुराम राजन की जगह अपना करीबी समझ कर उर्जित पटेल को आरबीआई का गवर्नर बना दिया था। अब आरबीआई की आटोनामी खत्म कराने का दाग लेने के लिए उर्जित पटेल भी तैयार नहीं हैं। इसीलिए आरबीआई के गवर्नर की हैसियत से उर्जित पटेल और डिप्टी गवर्नर विरल आचार्या को अर्जेटीना की मिसाल देते हुए नरेन्द्र मोदी और अरूण जेटली दोनां को यह समझाने की कोशिश की है कि अर्जेटीना के मरकजी (केन्द्रीय) बैंक की आटोनामी खत्म करके बैंक को वहां की सरकार ने अपनी मातहती में रखने और रिजर्व फण्ड को सरकारी खातों में मुंतकिल करने की गलती की थी तो गवर्नर ने अपने ओहदे से इस्तीफा दे दिया था और चन्द महीनों के अंदर ही वहां की मईशत (अर्थव्यवस्था) पूरी तरह से तबाह व बर्बाद हो गई थी। आज कल कुछ ऐसी ही हालत वेनेजुवेला की हो रही है।

वजीर-ए-आजम बनने के बाद से वैसे तो नरेन्द्र मोदी मुल्क के पहले प्राइम मिनिस्टर और हिन्दुस्तान के मेमार (निर्माता) पंडित जवाहर लाल नेहरू का नाम तक देश की तारीख (इतिहास) से मिटा देना चाहते हैं लेकिन अब आरबीआई के साथ मोदी सरकार का टकराव मंजरेआम पर आने के साथ ही मोदी सरकार पंडित नेहरू का वह मुबय्यना (कथित) खत कहीं से निकाल लाई है जो खत पंडित नेहरू ने उस वक्त के आरबीआई गवर्नर बेनेगल रामाराव को लिखा था। नेहरू ने खत में लिखा था कि रिजर्व बैंक आफ इंडिया को आटोनामी बनाए रखने की वह हिमायत करते हैं। इसके बावजूद आरबीआई सरकार की पालीसियों के खिलाफ नहीं जा सकती। खबर है कि उन्नीस नवम्बर को होने वाली आरबीआई डायरेक्टर्स की मीटिंग में मोदी के हामी और उन्हीं के नामजद किए हुए डायरेक्टर्स इस खत को भी बोर्ड के सामने पेश करेंगे। खबर है कि बीजेपी कांग्रेस के हमलों का मुकाबला करने के लिए इस खत का इस्तेमाल करेगी।

रिजर्व बैंक आफ इंडिया और मोदी सरकार के टकराव के दौरान साबिक आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने एक खत लिखकर कहा है कि यह टकराव नुक्सानदेह है। अगर सरकार मुल्क में ड्राइवर का रोल अदा करती है तो रिजर्व बैंक कार की सीट और बेल्ट का काम करती है। अगर दोनां ने एक दूसरे को नजरअंदाज किया तो बड़े हादसे का खतरा पैदा हो जाएगा। उन्होने कहा कि अगर रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने अपने रिजर्व फण्ड से सरकार को पैसा देने से इंकार किया तो उसकी कोई वजह जरूर होगी बेवजह बैंक इंकार नहीं करती है। इसी दरम्यान चीफ इनफारमेशन कमिशनर ने भी आरबीआई को नोटिस जारी करके कहा है कि वह उन कर्जदारों के नामों की तफसील फराहम (उपलब्ध) कराए जिन लोगों ने पचास करोड़ से ज्यादा का कर्ज बैंकों से लिया। फिर वापस नहीं किया वह आदतन डिफाल्टर्स हैं। इनफारमेशन कमिशनर श्रीधर आचार्युलू ने कहा डूबे हुए कर्ज और कर्जदारों के नामों को अवाम के सामने लाने या न लाने के सिलसिले में साबिक गवर्नर रघुराम राजन और फाइनेंस मिनिस्ट्री के दरम्यान जो खत व किताब हुई थी उसे भी आम करे। इनफार्मेशन कमिशनर ने इस बात पर सख्त नाराजगी जाहिर की कि सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बावजूद पचास करोड़ से ज्यादा का कर्ज लेने वालों के नाम मुल्क के सामने लाने का काम क्यों नहीं किया गया। मोदी सरकार में अगर मुल्क के मआशी (आर्थिक) हालात योरप के कुछ मुल्कों से बेहतर बताए जा रहे है। तो फिर सरकार रिजर्व बैंक आफ इंडिया के रिजर्व फण्ड से तीन लाख साठ हजार करोड़ का फण्ड अपने अकाउण्ट में ट्रांसफर कराने की जिद पर क्यों अड़ी हुई है? आखिर सरकार इतनी बडी रकम का क्या इस्तेमाल करना चाहती है?

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