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डोनाल्ड ट्रम्प और इस्लामिक दह’शतगर्दी

हिसाम सिद्दीक़ी

अमरीकी सदर डोनाल्ड ट्रम्प ने 24 फरवरी को अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में तकरीर करते हुए दुनिया में फैली दहशतगर्दी को इस्लामिक दहशतगर्दी करार देकर यह जाहिर कर दिया कि वह झूट बोलने और अपना गुनाह दूसरों के सर मढने में माहिर हैं।

जाहिर है गुजरात में इस्लामिक टेररिज्म लफ्ज का इस्तेमाल करने के पीछे उनकी मंशा वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी और उनके आरएसएस परिवार को खुश करने की रही होगी, लेकिन ऐसा करके उन्होने यह भी साबित कर दिया कि अपने मकासिद हल करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकते हैं। बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि किसी भी हद तक गिर सकते हैं।

यूनाइटेड नेशन्स समेत दुनिया के हर फोरम पर बार-बार कहा जा चुका है कि दह’शतगर्दी का ताल्लुक किसी मजहब से नहीं होता, दह’शतगर्दी के रास्ते पर किसी भी मजहब के मानने वाले लोग उतर सकते हैं। लेकिन गुजरात आकर ट्रम्प ने कहा कि कट्टरपंथी इस्लामिक दह’शतगर्दी से हमे मिलकर मुकाबला करना और हराना है।

उन्होने यह तो बताया कि उन्होने इराक और सीरिया से दह’शतगर्द तंजीम आईएसआईएस को खत्म कर दिया है। लेकिन यह कहने की हिम्मत नहीं कर सके कि आईएसआईएस को पैदा करने वाला भी अमरीका ही है। उन्हें यह भी बताना चाहिए था कि आईएसआईएस ने जिन खतरनाक असलहों का इस्तेमाल किया था वह कहां के बने हुए थे और उस खतरनाक गरोह तक वह असलहे कैसे पहुंचाए गए।

दह’शतगर्दी की हिमायत कोई नहीं कर सकता है लेकिन वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी समेत दुनिया का कोई भी हुक्मरां ट्रम्प या अमरीका के किसी भी सदर को आइना दिखाने और यह बताने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है कि आज पूरी दुनिया में जो दह’शतगर्दी फैली हुई है उसका मूजिद (जनक) अमरीका ही है। दुनिया जानती है कि अफगानिस्तान से सोवियत यूनियन की फौजों को खदेड़ने के लिए अमरीका ने अपनी फौजें भेजने से पहले मकामी तौर पर पाकिस्तान की मदद से तालिबान पैदा किए।

इस्लामाबाद में लाल मस्जिद नाम से बाकायदा एक बड़ा इदारा (संस्था) कायम किया गया जिसमें दह’शतगर्दों को ट्रेनिंग दी जाती थी। अमरीका ने पूरे-पूरे समन्दरी जहाज भर कर रायफले और दूसरे खतरनाक असलहे पाकिस्तान पहुचाए। पाकिस्तानियों ने जितनी रायफलें और असलहे दह’शतगर्दों को दिए उससे ज्यादा अपने यहां रख लिए जिसके नतीजे में साउथ एशियाई मुल्कों खुसूसन हिन्दुस्तान को भयानक दह’शतगर्दी झेलनी पड़ी।

हमें अच्छी तरह याद है कि मुल्ला उमर और उसके कुछ दूसरे तालिबान साथी जब अमरीका गए थे तो उन्हें अमरीकी कांग्रेस (पार्लियामेंट) भी ले जाया गया था। उस वक्त पार्लियामेंट के स्पीकर समेत बेश्तर (अधिकांश) मेम्बरान तालिबान से हाथ मिलाने के लिए ऐसे उतावले दिख रहे थे जैसे उनके दरम्यान कोई इंसान नहीं पैगम्बर आ गए हों।

आईएसआईएस भी अमरीका की देन थी, क्योंकि अमरीका ने सालों तक उनसे वह तेल चौथाई से भी कम दामों पर लिया जिन तेल कुओं पर आईएसआईएस ने कब्जा कर रखा था। तेल के बदले उन्हें पैसा कम असलहा ज्यादा दिया गया। यह बात तो डोनाल्ड ट्रम्प दुनिया को बताते नहीं और न दुनिया के किसी हुक्मरां में इतनी हिम्मत है कि वह यह बात से पूछ सके।

यूनाइटेड स्टेट जनरल काउंसिल के इजलास में पिछले सितम्बर को पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम इमरान खान ने दुनिया के सामने कुबूल किया था कि पाकिस्तान ने तालिबान और दूसरे किस्म के दह’शतगर्द पैदा किए लेकिन अमरीका के कहने पर और अमरीका के पैसे पर ही पैदा किए गए। अब जब वही दहशतगर्द हमारे और साउथ एशिया के लिए मुसीबत बन गए तो आप (अमरीका) ने यह कह कर हाथ खींच लिए कि यह तालिबान नहीं दह’शतगर्द हैं।

इमरान के इस बयान पर अमरीका ने मुजरिमाना खामोशी अख्तियार कर ली, छः-सात महीने गुजर गए लेकिन आज तक अमरीका ने अपनी इस हरकत के लिए न अफसोस जाहिर किया न ही दुनिया से माफी मांगी। दुनिया भी खामोश, कोई यह नहीं कह रहा है कि अमरीका ने जो दहशतगर्दी फैलाई वह कट्टरपंथी ईसाई दह’शतगर्दी है।

अमरीका ने झूट बोलकर इराक पर ह’मला किया पूरे मुल्क को तबाह कर दिया, उसके हुक्मरां सद्दाम हुसैन को फां’सी पर चढा दिया। लाखों लोग मा’रे गए अमरीका के साथ इराक को तबाह करने में ब्रिटेन भी था, हम’ला करने से पहले इल्जाम यह लगाया गया था कि इराक ने इंसानी तबा’ही के हथियार बनाए हैं। इराक को तबाह करने के बाद खुद ब्रिटेन ने जंग की वजूह की तहकीकात करवाई तो पता चला कि इराक ने इंसानी तबाही का कोई हथियार नहीं बनाया था अमरीका ने सिर्फ तेल पर कब्जा करने के लिए पूरी दुनिया के सामने झूट बोला और इराक पर हम’ला किया।

रिपोर्ट में ब्रिटेन के उस वक्त के वजीर-ए-आजम टोनी ब्लेयर को सजा देने की सिफारिश की। यह शायद दुनिया का पहला ऐसा मामला था जिसमें किसी मुल्क की तहकीकाती कमेटी ने अपने ही वजीर-ए-आजम को इस तरह बेगुना’हों पर ब’म’बारी करवाने के इल्जाम में सजा देने की सिफारिश की हो। सालों गुजर गए टोनी ब्लेयर के बाद ब्रिटेन में चार-पांच वजीर-ए-आजम तब्दील हो गए इराक के सिलसिले में झूट फैलाने वाले अमरीका के उस वक्त के खूनी सदर जार्ज बुश के बाद चार सदर बदल गए लेकिन इराक के गुनाहगारों को आज तक सजा नहीं मिली।

ऐसे हालात में अगर इराक का कोई गरोह दह’शतगर्दी के रास्ते से अमरीका से इंतकाम लेने पर उतर आए तो क्या उस ग्रुप को भी दह’शतगर्द कहा जाएगा?

साउथ एशिया में दह’शतगर्दी की शुरूआत श्रीलंका में लिब्रेशन टाइगर्स आफ तमिल इलम (लिट्टे) के जरिए कराई गई थी, उन्हें भी दहश’तगर्दी की ट्रेनिंग अमरीका ने ही दी थी। लेकिन तब अमरीका ने उन्हें अपने यहां ट्रेनिंग देने के बजाए अपने गुलाम बने ब्रिटेन के कैम्पों में ट्रेनिंग देने का इंतजाम किया था, इसीलिए शुरू में कई सालों तक एलटीटीई का हेडक्वार्टर लंदन में रहा था।

एलटीटीई ने ही खुद’कुश (आ’त्मघा’ती) बम बनाने का सिलसिला शुरू किया था जो बाद में अफगानिस्तान के तालिबान तक पहुंचा और अब पूरे साउथ एशिया के लिए नासूर बन चुका है। इराक ही नहीं तेल पर कब्जे के लिए दुनिया के शैतान अमरीका ने पहले तो लीबिया के उस वक्त के हुक्मरां कर्नल मोअम्मर कज्जाफी से दोस्ती की फिर उन्हें म’रवा कर लीबिया को भी तबा’ही के दहाने पर पहुंचा दिया।

आज दुनिया में जो लोग दह’शतगर्दी के बहाने लम्बी-लम्बी डींगे मारते फिर रहे हैं और दह’शतगर्दी के लिए मुसलमानों व इस्लाम को बदनाम करने की साजिशें कर रहे हैं वह जरा यह भी बताएं कि दुनिया के सबसे बड़े द’हशतगर्द अमरीका की आंख में आंख डालकर उसे वह द’हशतगर्दी से बाज आने के लिए कब कहेंगे। ऐसे लोगों को यह भी बताना चाहिए कि अमरीका के हाथों हर तरह से तबाह किए गए इराक और लीबिया जैसे मुल्कों के लोगों के पास अमरीका को सबक सिखाने के लिए आखिर कौन सा रास्ता और जरिया है जिस पर वह अमल करें।

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